Monday, October 31, 2011

क्लर्क से मुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री से करोड़पति बने




भ्रष्टाचार से बुरी तरह घिर चुके कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा की संपत्ति महज तीन साल में ही १.८२ करोड़ से २० करोड़ से ऊपर हो गयी| ४६ साल पहले, येदियुरप्पा ने समाज कल्याण विभाग में साधारण से क्लर्क की नौकरी छोड़कर राजनीति में कदम रखा|

वे शुरू से ही आर.एस.एस. के कार्यकर्ता के रूप में कार्यरत थे| येदियुरप्पा का संघ के प्रति निष्ठा और समर्पण ने उन्हें २००८ में कर्नाटक के शीर्ष कुर्सी पर बैठा दिया और बहुत कम समय में ही इन्होंने बी.जे.पी. के मजबूत नेता के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर ली| आखिर ऐसा कौन सा चमत्कार दो साल में हो गया कि येदियुरप्पा करोड़ों के मालिक हो गए? उनकी करोड़ों के जायदाद में ५० लाख रुपये का ढाई किलो सोना और हीरा, १७ लाख के ७६ किलो चांदी, उनके खाते में लगभग ५० लाख रुपये हैं, इसके अलावे अचल संपत्ति में २७ एकड़ कृषि भूमि के साथ, बैंगलोर के राजमहल विलास क्षेत्र धवलगिरी में लगभग एक करोड़ का मकान है, इस तरह इन्होंने ६०० फीसदी संपत्ति बहुत कम समय में बढ़ा लिया| येदियुरप्पा की संपत्ति जो आम लोगों के सामने है ये सिर्फ हाथी के दिखने वाले दांत के जैसे हैं, बेनामी संपत्ति का कोई थाह ही नही है|

येदियुरप्पा ने प्रदेश में अवैध खनन और भूमि घोटालों से २ - ४ सौ करोड़ से भी अधिक संपत्ति अर्जित किया है| लोकायुत संतोष हेगड़े ने तो स्पष्ट रूप से कहा है, “येदियुरप्पा के कार्यकाल में कर्नाटका में अब तक सैकड़ों – करोड़ों भूमि घोटाले सामने आये| मुख्यमंत्री पर आरोप है कि इन्होंने राज्य सरकार की भूमि को अपने बेटों और सहयोगियों में आवंटित किया| उन पर प्रदेश में लोह अयस्क के खनन  को बढ़ावा देने का सीधा आरोप लगा| मात्र दक्षिण – पश्चिम के क्षेत्र को लीज़ पर देने के लिए येदिय्राप्पा ने २० करोड़ घूस लिए और दान के रूप में १० करोड़ रुपये लिए, इसके बाद तमाम विरोध के वाबजूद, बेल्लारी जिले में अवैध खनन को मज़रंदाज़ किया| लगातार आरोप के वाबजूद भी कैबिनेट में सामिल रेड्डी बंधुओं पर कोई करवाई नहीं की|”

वैसे मैं यह समझता हूँ कि हमाम में सब नंगे हैं| आज राजनीति की स्तिथि समाज में यह है कि जनता - नेता दोनों मस्त| हर डाल पर उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा? वैसे राजनीति की इस मकड़जाल में से ईमानदार और संत को ढूंड पाना बहुत मुश्किल है|

एक कहावत है, एक संत प्रति दिन एक बूढी बीमार वैश्या की सेवा करने जाता था क्योंकि उसे देखने वाला कोई नही था| उसके दर्द में हिस्सेदार बनने वाला कोई नहीं था| आम आदमी नहीं समझ पाया कि वो संत वहाँ क्यों जाते हैं| समाज को लगा कि ये संत भी उसी रंग में रंग चुके हैं| कुछ देर के लिए उन्हें भी आलोचना के दौर से गुजरना पड़ा, परन्तु बाद में सच्चाई सामने आई कि वो किसी बीमार, नि:सहाय, अबला की सेवा करने जाते थे| समाज में उस संत का स्थान और ऊँचा हो गया| वर्त्तमान भारत की राजनीति में यही स्तिथि कुछ बचे-खुचे ईमानदारों और संतों का है|

डरी-सहमी संसद लोकतंत्र की रक्षा नहीं कर सकती




भारत, दुनियाँ का सबसे बड़ा, स्थाई और जीवंत लोकतंत्र, आज ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ लोकतंत्र की मर्यादा और लोक-हक सब कुछ दाँव पर लगा है| किसी भी लोकतंत्र के लिए अब इससे बुरा और क्या होगा कि मुट्ठी भर लोगों के द्वारा ‘एक व्यक्ति’ को गाँधी, अम्बेडकर, सुभाष से भी बड़ा बनाकर मीडिया और पूजीपतियों द्वारा आयोजित भीड़ से संसदीय और लोकतान्त्रिक व्यवस्था को खत्म करने की साजिश रची गयी| आज़ादी के लिए गाँधी, सुभाष, नेहरु, भगत, चंद्रशेखर जैसे कई महापुरुषों ने इसी भारत के लिए बलिदान दिया था| परन्तु आज जिस तरह टीम अन्ना के लोग, एक साथ गाँधी टोपी को दरकिनार कर अन्ना टोपी की जय-जयकार और गुणगान करवाने में लगी है, जिस तरह के फूहड़ भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, यह एक साथ अम्बेडकर और गाँधी, दोनों के लिए सम्मान की बात नहीं है| अम्बेडकर का संविधान और गाँधी का त्याग और बलिदान के सामानांतर अन्ना का ड्राफ्ट और अन्ना की टोपी हो गई! अम्बेडकर साहेब का संविधान कमजोर है, टीम अन्ना ऐसी गालियाँ देती और दिलवाती रही|

कोई कहता है अन्ना हमारे देश को महान बनाने के लिए एक नई विचारधारा और सोच को प्रस्तुत किये हैं| इस सोच की जीत आवश्यक है| दुनियाँ में जिस देश को महानतम देश के रूप में देखा जाता हो, फिर यह नई सोच कहाँ से पैदा हो गई देश को महान बनाने के लिए? कोई कहता है कि यह एक शांत क्रांति है, इस क्रांति ने देश को जगा दिया, नव निर्माण के लिए इस सोच को जीतना चाहिए| मुझे लगता है कुछ सांसदों ने जिस तरह संसद और लोकतंत्र से बड़ा अन्ना की सोच को दिखाने और समझाने का काम किया वह बिल्कुल ही अनुचित है| उस व्यक्ति को हमारी सभ्यता, परंपरा, संस्कृति, संस्कार और इतिहास के बारे में कुछ पता नहीं| कुछ मीडिया वालों और इतिहासकारों ने तो २७ अगस्त २०११ को आज़ादी के बाद से अब तक का सबसे बड़ा ऐतिहासिक दिन कह डाला| किसी ने १९७४ के आंदोलन से बड़ा कह दिया, तो किसी ने एक समान आंदोलन की बात कह डाली|

शायद नवसिक्खु इतिहासकार, पत्रकार, जिन्हें इतिहास की कोई जानकारी नहीं, १९७४ का जनउभार भारत के लिए था, भारत के गाँव में रहने वाले किसान और मजदूर, छात्र, नौजवानों के लिए था| परन्तु रामलीला मैदान में रासलीला रचाने वाले नचनिया नौजवानों का यह आंदोलन इंडिया और भारत के बीच और दूरी बढ़ाने के लिए था| जहाँ १९७४ का जनउभार बिना सोशल नेटवर्किंग साइट्स, टीवी, प्रिंट मीडिया आदि के बगैर थी, रामलीला का आंदोलन सोशल नेटवर्किंग साइट्स, टीवी, प्रिंट मीडिया, कॉर्पोरेट घरानों के द्वारा प्रायोजित था| १९७४ का आंदोलन समाज के सभी वर्ग, समुदाय, भाषा-भाषी, जाति, धर्म, मजहब, क्षेत्र, के एकजुटता का प्रतीक था| वह आंदोलन लोकतंत्र, संविधान और संसदीय प्रणाली के साथ-साथ भारत और गाँव को मजबूत करने के लिए था| परन्तु रामलीला का आंदोलन मुट्ठी भर लोगों के साथ पूर्णत: भारत और इंडिया के बीच बंटा हुआ था| यह आंदोलन उन्मादी भीड़तंत्र के द्वारा लोकतंत्र पर चोट था| लोकतंत्रीय व्यवस्था और संसदीय प्रणाली के लिए चुनौती और खतरा था| वह आंदोलन व्यवस्था को मजबूत और परिपक्वता के लिए किया गया था, परन्तु टीम अन्ना और उसके प्रबंधन शुरू से ही ऐसा माहौल बनाने लगे कि मानो यह भ्रष्टाचार की पहली लड़ाई है, शायद अन्ना ही पहला व्यक्ति है जिसे आंदोलन के क्रम में जेल जाना पड़ा हो| टीम अन्ना को इतिहास पढ़ने की जरूरत है|

आज़ादी से लेकर आज तक दर्ज़नों बार भ्रष्टाचार के प्रश्न को लेकर कभी अम्बेडकर, कभी लोहिया, बी.पी. सिंह, कभी चन्द्रशेखर के नेतृत्व में लड़ा गया| मैं मानता हूँ अन्ना एक भले लोग हैं| लेकिन जिस तरीके से आज बहुत जोर-शोर से प्रचार किया गया–दूसरी आज़ादी की लड़ाई एक संत के नेतृत्व में लड़ा जा रहा है; वहाँ युवाओं के लिए आज़ादी के मायने महज मस्ती, शोर-शराबा, ऐय्याशी, भोग-विलासिता ही रह गया है|

मैं मानता हूँ कि अन्ना जी जल संरक्षण, शराब बंदी, भजन-कीर्तन जैसे सेवा मूल कारणों से समाज में आपकी एक बेहतर पहचान बनी, तथा इसके आप हक़दार भी हैं| लेकिन यहाँ यह आपको नहीं भूलना चाहिए कि महान बनने के लिए आपको महान विचार के साथ महानतम हिन्दुस्तान के लिए जिम्मेवारियों का भी भार वहन करना पड़ेगा| मीडिया और कॉर्पोरेट घरानों  के द्वारा हमारे बेमिसाल और लोकतान्त्रिक देश को भ्रष्टाचार प्रधान देश के साथ-साथ अन्ना प्रधान देश बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा! गूंगे, बहरे, अंधे व्यक्ति को अन्ना की प्रशंसा में बोलते हुये दिखाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी और तो और भिखारियों की मण्डली भी फील-गुड की बातें हिलोड़ मारने लगी, सबके सर पर टोपी, जिस पर लिखा है ‘मैं अन्ना हूँ’ बड़ी चालाकी से सजाने का काम किया गया| मुफ्त माल, दिल बेरहम, कम से कम इस गोल्डन सत्ता पर रामलीला मैदान में भर पेट इज्जत की रोटी तो तबियत से तरह-तरह के माल उड़ाने की व्यवस्था की गयी|

मीडिया के द्वारा प्रचारित किया गया कि बच्चा-बच्चा, पूरा देश के जुबान में एक ही नारा था कि अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं| बल्कि उस भीड़ में ८२ % लोग ऐसे भी थे जिन्हें ‘जन लोकपाल बिल’ के बारे में कुछ भी पता नहीं था| पर कहने के लिए मुहिम में पूरा साथ दे रहे हैं| वाकई संविधान में लिखी गयी यह लाइन कि भारत एकता और अखंडता का देश है, क्या यह बिल्कुल सही है? फिर यह कैसी एकता कि सिर्फ १२ % देश भर में टीवी, समाचार पत्र, रेडियो, विभिन्न तरह के सोशल नेटवर्किंग साईट जैसे फेसबुक, ट्विट्टर, ब्लॉग में बस अन्ना ही अन्ना| कौन हैं ये लोग जो समर्थन कर यह सोचते हैं कि जन लोकपाल बिल आने से भ्रष्टाचार खत्म हो जायेगा, महंगाई खत्म हो जाएगी और गरीबी खत्म हो जायेगा? जो युवा और मध्य वर्गीय लोग कभी रैली, प्रदर्शन और मार्च से नफरत करते थे, बेरोजगार, नंगे, भूखे, भिखारी को कोई काम नहीं है कह कर गरीबों को गाली देने वाले यही लोग, आज इस कैंडल मार्च को दूसरी आज़ादी की संज्ञा दे रहे हैं|

अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम को मजाक बनाकर रख दिया| युवकों के लिए अन्ना का अनशन महज मौज-मस्ती बन कर रह गया| सड़कों पर मोटरसाइकलों से तेज गति से चलना, एक हाथ में राष्ट्रीय झंडा और मुँह में सिगरेट, और बस खत्म हो गया भ्रष्टाचार| तिरंगा लेकर निकलना उनके लिए आनंद का जरिया बन गया| इतना ही नहीं युवा-युवतियों के मोबाइल में भी ऐसे ही संदेश मिलते हैं| बीते दिन सुना और पढ़ा गया, मोबाइल पर भी ऐसा ही मेसेज लिखा गया था कि अन्ना को सपोर्ट करो और भ्रष्टाचार मिटाओ| काला धन वापस लाओ| यदि काला धन इंडिया आ गया तो बीयर १५ रुपये, वोदका २० रूपया, सोडा ५ रूपया और विस्की २० रूपया हो जायेगा| इतना ही नहीं अन्ना की टोपी लगाये रामलीला मैदान के पीछे बाइक पर बैठे नवयुवक फोन करता है, “हाय जान! तुम नहीं आ रही हो, अन्ना के कैंडल मार्च में? ओह, कम ऑन यार! पापा को बोलो कि अन्ना के कैंडल मार्च में जा रहे हैं! प्लीज जल्दी आ जाओ, मैं वेट कर रहा हूँ” फिर क्या था कुछ देर बाद दोनों गाल पर ‘आई लव यू अन्ना’ लिखते हुये पहुँच गयी अपने यार के पास और शुरू हो गया भ्रष्टाचार मिटाने का दौर|

इसी तरह के नज़ारा अन्ना के तिहार जेल से निकलने वाले दिन देखा गया| कई रेस्त्राँ के बाहर भी लड़के अपने दोस्तों की टोली में यह कहते देखे गए कि यार आज तो अन्ना बाहर आ गया, आज तो राहुल पार्टी देगा, चल बेटा बीयर पीला दे, तुझे बहुत शौक है अन्ना बनने का| यह मैं नहीं कह रहा हूँ, ये बातें संदीप, पत्रकार, अलीगढ पंजाब केसरी से जुड़े हैं, उनका कहना है| हजारों उदाहरण ऐसे हैं जो लिखना उचित नहीं समझ रहा हूँ| सिर्फ आपके विचारों के लिए मैंने उदहारण दिया| मैं उन ११ साल पहले आये इलेक्ट्रोनिक मीडिया (लाइव कवरेज) के लोगों से पूछना चाहता हूँ जो सुप्तता अवस्था में हैं और परिपक्व नहीं हैं, बहुत ही खतरनाक मोड़ पर आज की इलेक्ट्रोनिक मीडिया है| उन्हें इस बात की जानकारी है या नहीं कि जो लोग रामलीला मैदान आये उन्हें ३०० रुपये का लोभ दिखाया गया साथ-साथ नौजवानों के बीच दारु बांटा गया, और तरह-तरह के व्यंजन परोसा गया|

आज जो रामलीला मैदान या शहरों में भ्रष्टाचारी, भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जो उछल-कूद, हाय-तौबा मचा रहे हैं, ये वही पैसे वाले और उच्च मध्य वर्गीय हैं जिन्हें इन्टरनेट की सुविधा है| और आपने इन्हीं लोगों को पूरा देश कह दिया| आपको पता भी है कि देश की आत्मा गाँवों में बसती है| आज़ादी से लेकर आज तक आप लोग यही फर्क करते आये हैं, इंडिया और भारत के बीच| अन्ना की लड़ाई इंडिया के लोगों के लिए है, भारत की आत्मा के लिए नहीं| गाँव के लिए नहीं| अन्ना को इस बात की जानकारी है भी या नहीं की हिन्दुस्तान की ८२ % आबादी, बगैर बिजली, टीवी और पंखा के रहती है| जिन हिंदुस्तानियों के हाथ में रोटी की व्यवस्था ना हो उसे क्या पता की सोशल नेटवोर्किंग साईट क्या होता है और शहर में क्या हो रहा है| देश के गरीबों को क्या पता कि टेक्नोलोजी क्या है, वे तो बस जुगार टेक्नोलोजी से जीते हैं और अपना जीवन गुजर-बसर करते हैं| गरीब के बच्चे जहाँ पढते हैं, वहाँ बेंच, पंखा और बिजली भी नहीं होता, तो वे कंप्यूटर का माउस चलाना क्या जानेंगे| दलित, आदिवासी, पिछड़े, गरीब को भाग्य, किस्मत, भगवान, दलाली, नौकरी से फुर्सत हो तब ना वे गाँव को इंडिया बनाने की कल्पना कर सकते हैं|

अन्ना जी लड़ाई लड़ना हो तो इंडिया और भारत के बीच के फर्क को मिटाने के लिए लड़िए! गरीबी और अमीरी के बीच की खाई को पाटने के लिए लड़िए! एक चूल्हा - एक चौकी, एक है मानव समाज, के लिए लड़िए! मानव-मानव एक हों, मानव समाज एक हों, विश्व बंधुत्व कायम हो और विश्व के नैतिकवान एक हों, इसके लिए लड़िए! तभी खत्म होगी सभी तरह की बुराई| लोभ, असमानता, विषमता, जड़ता, संकीर्णता को खत्म कीजिये और तब हम कल्पना कर सकते हैं भ्रष्टाचार मुक्त समाज की|

आज़ादी की दूसरी लड़ाई, ऊपर से नहीं नीचे से शुरू होगी, ढांचागत परिवर्तन, सामाजिक पिरामिड की तलहट्टी से आ सकती है| गाँधी जी की वे बातें याद रखनी चाहिए, ‘कुछ भी करें उसका असर आखिरी इंसान पर क्या पड़ता है, उसे जानो!’ अम्बेडकर को यदि उच्च वर्ग और पूंजीपति पढ़े होंगे और समझे होंगे तो उन्हें समझ में आया होगा कि वे लोग एक भ्रष्ट और डकैत समुदाय में पैदा हुये और जिसने दलितों और शूद्रों से उनका सब कुछ छीन लिया| यही नहीं एक तरफ ऊँची जाति के लोग उपभोक्ता की तरह शूद्रों एवं अतिशूद्रों की पैदावार को मुफ्तखोरों की तरह लूटते रहे और दूसरी तरफ श्रम की महत्ता को खत्म किया| यहीं से लालची की तरह भ्रष्टाचार शुरू कर दिया गया| जब अंग्रेज आये तो ऊँची जातियों से कई राय बहादुर साहेब, जमींदार बन गए| ब्रितानिया हुकूमत के सिपेसालाहर हो गए| इस तरह के लोगों ने काफी संसाधन इकठ्ठा किया|

वर्ण व्यवस्था वाले समाज की अगर चर्चा करें जो लोहिया कहा करते थे, (जो सबसे भ्रष्टतम एवं क्रूरतम व्यवस्था थी) तो और भी बातें खुलती हैं| सबसे ज्यादा गुलामी भारत ने झेला| क्या करते रहे क्षत्रिय? सबसे ज्यादा निरक्षरता हमारे देश में है, क्या करते रहे ब्राह्मण? सबसे ज्यादा कर्जदार हैं हमारे देश में, क्या करते रहे वैश्य? किन्तु शूद्रों और अतिशूद्रों ने हाड़तोड़ मेहनत किया और अनाज पैदा किया| इन तीन वर्णों का अपने वर्ण के अनुसार कार्य में विफल होना, इंसान को इंसान नहीं समझना और श्रम की महत्ता को खत्म करना, क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है?

अन्ना जी आपके आंदोलन में ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ अपने फेसबुक में लिखते हैं कि पटना की गलियों से आवाज़ आती है, जिसे भैंस चराना चाहिए, वह सरकार चला रहा है – कुमार विश्वास| यह क्या है अन्ना जी? लोग रामलीला मैदान में पोस्टर ले कर आये हैं कि आरक्षण हटाओ और जन लोकपाल लाओ, यह क्या है? खुद केजरीवाल ने आरक्षण के विरुद्ध संगठन में हिस्सा लिया, इसका अर्थ हुआ कि ५००० साल के व्यवस्था में कुछ जाति के अमीरों ने, जिन्होंने अपने संपर्क, ताकत, प्रभाव और पैसे को अपनी ताकत बनाई, उसका भ्रष्टतम उपयोग आपके आंदोलन में हो रहा है| बुद्ध ने कहा है कि जैसा आप सोचते हैं वैसा ही दुनिया बनाते हैं| इसलिए मुझे जानना है कि कैसी व्यवस्था आप चाहते हैं और इतिहास में आप किसके साथ हैं| क्योंकि आप महाराष्ट्र, गुजरात में आर.एस.एस. व खाप पंचायत का विरोध नहीं किया| खाप में ऑनर किलिंग होती रही| जबकि आर.एस.एस. के दूसरे सर संघचालक गोलवरकर अपनी आत्मकथा में भारतीय संविधान और तिरंगे का विरोध किया है| इनके समर्थन का विरोध आप और आपकी टीम क्यों नहीं करते?

यहाँ २२, २९ अक्टूबर १८९२ के घटना की चर्चा कर रहा हूँ| इटली की सिविल सोसाइटी एवं वर्कर, ३० हज़ार लोगों ने रोम के सड़कों एवं सांसदों को घेर लिया| लोगों को रोम के पूंजीपतियों का भरपूर समर्थन मिला| उसके बाद वहाँ के राजा ने चुनी हुयी सरकार की जगह मुसोलिनी को सत्ता सौंप दी| यह यूरोप के विस्तार की दिशा में निर्णायक कदम था| इसकी परिणिति दूसरे विश्व युद्ध में ६ करोड़ लोग मारे गए| तो क्या आप भी भारत में ऐसा करने के विचार में हैं| ये तो महात्मा गाँधी, सुभाष, अम्बेडकर का रास्ता नहीं है, ये तो महापुरुषों एवं उनके मूल्यों के साथ गद्दारी होगी|

गाँधी जी ने १९१९ में हड़ताल शुरू किया तो उन्होंने आतंरिक बदलाव में ज्यादा बल दिया था| आप और आपके आंदोलन में शामिल कितने लोग सामाजिक भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं? कितने लोग दहेज और कर्मकांड जैसे अभिशाप के खिलाफ हैं? और कितने लोग गर्भ में बच्चों की हत्या नहीं कर रहे हैं? आपकी भीड़ में से कितने लोग इसका विरोध करेंगे? संसाधन और अर्थ की वास्तविकता राजनैतिक और सामाजिक ताकत को निर्धारित करता है| शायद आप वो बात भूल गए जो आप कहा करते थे कि अपने गाँव के दलित के जमीन पर हमलोगों ने काम कर ६० हज़ार कर्ज से मुक्ति दिलाई, बहुत भारी कृपा और चैरिटी की| असल में इस देश में कितने प्रतिशत दलितों के पास जमीन है, जमीन तो जाति व्यवस्था द्वारा बड़े जातियों ने कब्ज़ा कर रखा है| और बाद में कुछ जाति के लोगों ने ही भारत के साथ गद्दारी कर ब्रिटिश हुकुमरानों के जमींदार बनकर कब्ज़ा जमा लिया| बड़े लोग सोनभद्र जैसे आदिवासियों की पानी पर कब्ज़ा कर रहे हैं किन्तु आदिवासियों को बिजली नहीं मिलती| पर हम शहर वाले अधिक से अधिक बिजली का प्रयोग कर रहे हैं, उसी तरह जैसे उत्तर की देश की मात्र वे लोग (दुनिया की २० % आबादी) विश्व के ८० % संसाधन का इस्तेमाल करते हैं और गाँव के २० % आबादी वाले, उत्तर टोले के लोग ८० % संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं| क्या यह भ्रष्ट–आचार भ्रष्टाचार नहीं है? अन्ना जी क्या आपकी दृष्टि भ्रष्टाचार रूपी दानव के विराट स्वरप को पहचानने में सक्षम है? कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता|

आज बेहिसाब बढती आबादी में जन्म से लेकर मरण तक, हाथ दिखाने से लेकर जलने तक, गाँव के चमईन से लेकर जलाने वाले डोम तक, अस्पताल से लेकर नर्सिंग होम तक, गाँव के परचून के दुकान से लेकर अम्बानी के शौपिंग मौल तक, गाँव के कोटे से लेकर पेट्रोल पम्प तक, दाल से लेकर सब्जी, मसाला से लेकर मिठाई, चावल से लेकर आटा, सबमें मिलावट| होटल से लेकर मोटेल तक सबमें मिलावट| पानी से लेकर दूध सबमें मिलावट| मुनाफा अधिक कमाने की होड़ में पूंजीपति आदमखोर बन गए| एन.जी.ओ. से लेकर धार्मिक ट्रस्ट तक, किस-किस प्रकार से परिवार, दम्पति, समाज का आर्थिक शोषण होता है| संभवत: शोषण के इस स्वरुप से आप बेखबर हैं| लड़का जन्म लिया तो गनीमत है, किन्तु लड़की का जन्म लेना तो मानो गोबरपट्टी तथा देश के प्रभुत्व में एक दाग है| आम कन्या भ्रूण हत्या के कारण देश में लिंगानुपात एक विभिन्न चर्चा का विषय बनकर रह गया|

देश में तमाम कानून बने| परिवार, पिता-माता को कितने तकलीफें उठानी पढ़ती हैं, क्या आपने कभी सोचा है? आम शिक्षा का आधार कानून है, वाबजूद बाल श्रम पर लोग रोक लगा सके? सरकार आपके और आपके टीम के नजर में तो, सरकार के चेहरे पर कालिख पोत लोग शामिल हैं, जबकि दूध से धुले चन्दन के सफ़ेद वस्त्र वाले, अर्धनग्न वाले आम क्रांति के मशाल थामे रामलीला मैदान में उतर खड़े हैं| अभिभावक अपने बच्चे को निजी स्कूल तथा कॉलेज में पढाने के लिए लालायित होते हैं| आपके टीम के अनुसार सामाजिक व्यवस्था के कॉन्वेंट में बिना इंग्लिश पढ़े तो कोई शिक्षित हो ही नहीं सकता| अब ऐसी स्थिति में निजी स्कूल वाले डोनेशन के नाम पर लाखों रूपया वसूल कर रहे हैं| अन्ना जी, आपके यह मलूम है भी या नहीं? वाकई आप बहुत महान है, आपको ये छोटी चिंता नहीं सताती है|

आप तो सिर्फ भ्रष्टाचार के चरम शीर्ष पर हमला कर उसे जड़ से मिटाकर ही छोड़ेंगे| यही चिंता आपको सताती है| अन्ना जी, शिक्षा और चिकित्सा के व्यापक क्षेत्र में, आप हलके से भी जरुर परिचित होंगे| इनके विराट स्वरुप का दर्शन कराना यहाँ मेरे लिए मुमकिन नहीं है| कारण, समाज की परतें जब उठने लगेंगे, रामलीला में आये सब हमाम में नंगे दिखेंगे| मिलावट, जमाखोरी, महंगाई का नाम तो आपने सुना ही नहीं और ना ही इनके खिलाफ कभी आवाज़ उठाया| स्वयं विदेशों में द्वीप के मालिक बनने वाले रामदेव विदेश में जमा पैसों को लेकर आवाज़ उठाने में परहेज़ नहीं किये, मामूली सी योग प्रशिक्षण शुरू कर लाखों-करोड़ों की संपत्ति खड़ा करने में उन्हें कोई गुरेज नहीं| अन्ना जी, दूसरों पर उंगली उठाने में कोई हिचक नहीं होता|

हाँ! हम सभी भ्रष्ट हैं क्योंकि भ्रष्टाचार हमारे रग-रग में समाया हुआ है| नैतिकता का झंडा बुलंद करना तो कोई आपसे सीखे| दरअसल हमारे देश की वास्तविकता की खासियत है कि वे विश्लेषण की जहमत उठाना नहीं चाहताभ्रष्टाचार वाकई ही बेहद दानवी समस्या है| इसका खात्मा जरुरी है| लेकिन किस प्रकार - - - !!!???

डॉक्टर आम आदमी के आंत तक को निकल रहे हैं, दवाई कंपनी वाले पैसा लूट रहे हैं| शिक्षक क्लास में किस तरह पढाते हैं और ट्यूशन के दौरान किस प्रकार? डॉक्टर सरकारी अस्पतालों में किस प्रकार ईलाज करते हैं और निजी क्लिनिक में किस प्रकार? क्या बताने की जरुरत है? नियम-कानून के आँखों में धूल झोकने वाले वकील आज भ्रष्टाचार के खिलाफ बोल रहे हैं| समझाइए अपने आन्दोलनकारी वकीलों को कि आज से भ्रष्टाचारी, मुनाफाखोरी, पूंजीपतियों और अपराधियों से पैसे ना लेकर दलाली बंद करें| देश के कानून का किस प्रकार अदालत में धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं, क्या आपको नहीं दिखता? अधिकतर वर्गों के लिए आपके पास क्या कोई शब्द है? आप जैसे प्रभुत्व और नैतिक व्यक्ति से आग्रह है कि युवाओं को आदर्श और नैतिकवान बनाने के लिए कोई ठोस क्रांति कीजिये|

आप कीजिये भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग, लेकिन क्षण-क्षण बदलिए नहीं! आप उठ खड़े होइए, नेता, डॉक्टर, पुलिस, पूंजीपति और न्यायपालिका के खिलाफ! जीवन से लेकर मरण तक भारत का हर नागरिक विभिन्न समस्याओं से जूझ रहा है|

किसी बड़े वृक्ष के फुनगियों की छंटाई कर आप भ्रष्टाचार मुक्त देश, समाज का सपना युवाओं को दिखा रहे हैं| क्या हुआ वह सपना, राजनैतिक भ्रष्टाचार की चर्चा तो आपने खूब चलाई लेकिन देश के निजी उद्योगपति घराने द्वारा किसान, मजदूर और अपने कर्मचारियों के शोषण पर आप चुप्पी साधे हैं| देश में लाखों किसान ऋण के कारण आत्महत्या करने पर मजबूर हैं| क्या आपने कभी उनकी चिंता की? उन लोगों को जरुर एक आशा बंधी, आपने एक मुद्दा उठाया| लोगों को क्या पता कि यह बात हकीकत से बहुत दूर है| क्योंकि ऊपर से नीचे और घर के भीतर बाहर दोनों ओर सफाई नहीं होगी तब तक गन्दगी दूर नहीं होगा|

मुर्दा घाट से लेकर जन्म की पीढ़ी तक सबको सुविधा चाहिए| तब भी आपके युवाओं को लग रहा है कि १०१ नंबर डायल करो, जन लोकपाल आएगा तथा अलादीन के जिन की तरह सब कुछ ठीक हो जायेगा और भ्रष्टाचार खत्म हो जायेगा| कोई भी लड़ाई मूल्य और आदर्श पर आधारित सही तरीके से नहीं होगी उसका सही निष्कर्ष कभी नही निकलता| हम जैसे कम बुद्धि वालों को बहुत पीड़ा पहुंचती है| मैं मानता हूँ कि यह समय की जरुरत है, आवश्यक भी है भ्रष्टाचार रूपी दानव से छुटकारा, लेकिन अन्ना जी सिर्फ अपने धुन से बांसुरी बजाकर नहीं| आपको मदद करने वाले और चाहने वाले लोगों ने तो आज तक बांसुरी बजाकर ही संविधान, कानून, मर्यादा सब कुछ को खरीदकर भारत और इंडिया का बड़ा फर्क कर दिया| आप आह्वान कीजिये सभी से कि पहले खुद सुधरना होगा, ना भ्रष्टाचार करेंगे और ना ही होने देंगे! और परिवार से ही शुरू किया जाए! ना दहेज लेंगे ना देंगे! सिर्फ एक चीज़ आप समाज से खत्म कर दीजिए तो क्रांति की तहरीर लिखती चली जाएगी|

जो लोग आज आपको मैदान में साथ दे रहे हैं, इन्ही लोगों ने तो बी.बी.ए., एम.बी.बी.एस, एम.सी.ए., इंजिनीरिंग, बैंकिंग आदि शिक्षा को महंगे बनाकर, फीस लेकर सारी व्यवस्था को चौपट कर दिया| क्रांति चाहते हैं तो खिलाइए कसम अपने आंदोलनकारियों से कि पढ़ने के लिए ना घूस लें ना दें| आपकी टीम कहती है मल्टीनेशनल, नेशनल, पूंजीपति, कॉर्पोरेट घराने, पक्ष-विपक्ष, विधायक, सांसद, मीडिया, मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा, शाषण-प्रसाशन, ना जाने किन-किन को चंदा-अनुदान और माहवारी देता है, तो क्या ये लोग भ्रष्ट हो गए? इनकी नीयत ही है चन्दा देना| यदि किरण बेदी के किसी संस्था को चंदा देने का अनुदान मिलता है तो क्या इस आधार पर उसे भ्रष्ट घोषित कर देंगे? अन्ना जी, आपको और आपके टीम के नजर में यह हो सकता है कि यह उनकी नीयती है| लेकिन मैंने समझा है कि पूंजीपति, कॉर्पोरेट घराने जैसे बड़े लोग बिना पैसे के करवट भी नहीं बदलते| घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खायेगा क्या? बिना लाभ-घाटा को समझे कॉर्पोरेट जगत काम नहीं करता| किसी अनथालय, मंदिर, मस्जिद आदि को दान भी कोई पूंजीपति इसलिए देता है कि उसकी ब्लैक मनी, व्हाइट मनी में तब्दील होता रहे| यदि देने की नीयत ही होती तो रोड पर भीख मांगने वालों के लिए, गाड़ी के शीशे जरूर खुलते और उनके हाथ में एक रुपया जरुर होता, या गाँव में किसी के बेटी की शादी में दान जरुर दिया जाता| आज तक मैंने नहीं सुना कि ये पूंजीपति लोग बिना फायदे के किसी से दोस्ती करते हैं| इसी देश में सूदखोर, मुनाफाखोर जैसे लोगों के चलते देश के किसान आत्महत्या करते हैं, इससे उसकी नीयती कैसे कही जा सकती है? जिस तरह, बैंक लोन उसे ही देता है जो लौटाने लायक हो, उसी तरह कॉर्पोरेट दान उसे ही देता है जिससे उन्हें वर्त्तमान या भविष्य में फायदा हो|

अन्ना जी, लोकतंत्र है तभी आप और आपकी टीम आज आवाज़ उठा रही है, तानाशाह के देश का हाल किसी से छुपा नहीं है| आपके टीम को तानाशाह रवैया छोड़ना होगा| आपकी टीम ब्लैकमेलर है| आखिर क्या कारण है अन्ना जी कि वर्षों वर्ष तक आपको साथ देना वाले आपके एक भी साथी आपके साथ नहीं है| सिविल सोसाइटी में जो लोग आपसे जुड़े, क्यों एक-एक कर आपसे दूर हो गए, क्यों सिर्फ पांचाली के टीम आपके साथ बच गयी? अग्निवेश, अरुणा राय, अरुंधती, जैसे लोग नहीं रहे, जिनके जीवन के कुछ अपने मूल्य हैं| आपकी टीम में प्रशांत भूषण, केजरीवाल, किरण बेदी जैसे लोग शामिल हैं, जिनके अपना कोई विश्वसनीयता और पारदर्शिता नहीं है| इन लोगों का बडबोलापन, अहंकार, गलत दिशा देने वाली प्रक्रिया ने हमेशा अच्छे लोगों को चोट पहुँचाया जिन्हें आपसे दूर होना पड़ा| जब कुछ लोगों के साथ ही आप नहीं रह पाए, जब कुछ लोगों का सहयोग आप नही ले पाए जो आपके टीम के अभिन्न सदस्य थे, तो आपकी टीम से क्या कल्पना की जा सकती है? केजरीवाल और किरण बेदी के बीच मैं बड़ा तो मैं बड़ा का संघर्ष है| टीवी पर ख्याति पाने के लिए एक-दूसरे के बीच मतभेद है, तो उनसे आदर्श की बात कैसे सोची जा सकती है| मनमोहन सिंह, अब्दुल कलाम, अंटोनी और सदन में बैठे अन्य व्यक्ति जो ३०-४० साल से संघर्ष करके बेदाग सार्वजनिक जीवन को बनाये रखने वाले लोगों को ऐसे लोग पाठ पढ़ा रहे हैं तो यह दुर्भाग्य है इस लोकतान्त्रिक देश का|

भीड़तंत्र से लोकतंत्र को नहीं चलाया जा सकता| लोकतंत्र अपने मूल्य से चलता है| नियम, व्यवस्था, कायदे-कानून से चलता है| लोकतंत्र सोशल नेटवर्किंग साइट्स के यूजर्स से नहीं चलता है| टीम अन्ना ही यह कह सकता है कि २७ अगस्त २०११ ऐतिहासिक दिन है, मेरे जैसे लोग नहीं| मेरे जैसे नौजवान सिर्फ यही मानते हैं कि आज का दिन संसद और लोकतंत्र का सबसे काला दिन साबित हुआ है| दुनियां के सबसे मजबूत लोकतंत्र के ताना-बाना पर आघात किया आप और आपके टीम ने|

आज सभी पार्टी को वोट की चिंता है, लोकतन्त्र बचाने की नहीं| सदन में बैठे सांसद पर निराशा हुयी हमलोगों को| जिन लोगों ने समाज और राष्ट्र को कुछ नहीं दिया है, वे लोग ही जय-जयकार में लगे हैं – अन्ना की जय हो, अन्ना – अन्ना – अन्ना| चार महीने में यदि अन्ना जी या रामदेव जी की पहचान इस देश में बनी है तो उसे लिए जिम्मेवार सरकार और सरकार को चलाने वाले कुछ लोग हैं, जिन्होंने इन लोगों को महामंडित किया| कभी कारपेट व्यवस्था तो कभी सरकारी व्यवस्था ने, सारी लोकतान्त्रिक मूल्य और संसदीय मर्यादा को खत्म किया है|

सरकार के कुछ लोगों ने ही इनके मनोबल बढ़ाया वरना लोकतंत्र को खत्म करने की साजिश रचना इन लोगों बूते में नहीं है| ओमपूरी जिसका चरित्र भी चरित्रहीन हो, सिनेमा में नाचने वाला हीरो-हेरोइन जिसका अपना कोई चरित्र ना हो, जो टैक्स की चोरी कर विदेशों में धन जमा करते हों, वे मर्यादा सिखा रहे हैं सांसद को| वे बताएँगे कि जन लोकपाल बिल कैसे पास होगा? वे बताएँगे नियम और कानून? जो नियम और कानून को अपनी जागीर मानते हैं, खरीदते हैं, उस नचनिया-बजनिया से ही देश चलना है तो एक पार्टी बनाकर चुनाव लड़ लें| यह सिद्ध हो गया कि इस देश को कुछ मुट्ठी भर मीडिया ही चलाएगा| सोचना चाहिए सभी पार्टी के लोगों को, सवाल जीत हार का नहीं है, सवाल है देश के लोकतंत्र और मर्यादा को बचाने का|

वरुण गाँधी कहते हैं कि जन सबसे ऊपर है| जन का क्या मतलब – प्लेबॉय, कॉर्पोरेट घराने या विलायती कुत्तों को दूध पिलाने वाला परिवार या १२ % वे लोग जिन्होंने सब दिन भारत और उसके आत्मा का शोषण किया? क्या ये लोग जन हैं? जन और सांसद एक-दूसरे के पूरक हैं और अपनी-अपनी जगह दोनों का महत्व है| समाज और कोई भी संस्था लोक, लाज और मर्यादा से चलता है, आवेग या संवेग से नहीं| संवेदना, सेवा और मानवीय कल्याण के लिए होता है| केजरीवाल को अन्ना जी की आदर की बात याद आती है|

संसद से बढ़कर अन्ना नहीं हो सकते| गाँधी और सुभाष से बड़ा जन्म जन्म तक अन्ना नहीं हो सकता| लोकतंत्र और जनतंत्र एवं संसदीय व्यवस्था को बरक़रार रखने के लिए हजारों अन्ना का बलिदान की कोई कीमत नहीं होगी| जिस तरह का अकड़पन, भाषा, जिद, अहंकार, अन्ना और उसकी टीम ने दिखाया यह देश के भविष्य के लिए ठीक नहीं है| इस संसद में रहने वाले किसी भी सांसद को आने वाली पीढ़ी माफ नहीं करेगी| इतनी डरी-सहमी संसद और सांसद, देश का भला कभी नहीं कर सकता| जन और जातिय दवाब के कारण संसद के गरिमा को खत्म कर दी गयी| अपने स्वार्थ के लिए कुछ मुट्ठी भर लोगों ने संविधान का विरोध किया| हम और मेरे जैसे लाखों नौजवान उन सांसदों को धन्यवाद देना चाहते हैं जिन्होंने वोट की परवाह किये बगैर लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था के साथ-साथ, भारत और भारत के गाँव को बचाने के लिए मजबूती से आवाज़ उठाया|

इतिहास भीड़ से नहीं हुआ है, ना ही जीत-हार से ही हुआ है| इतिहास हमेशा हुआ है – लीके लीक सब चले, बेलीक चले सपूत, वाले लोगों के साथ अन्ना जी, संसद सक्षम है हर तरह के मजबूत कानून बनाने के लिए, उसे लागू करने के लिए| मनमोहन सिंह और कलाम जैसे लोग आज भी इस देश में मौजूद हैं जो कमजोर से कमजोर और मजबूत से मजबूत कानून को अच्छे तरीके से चला सकते हैं| आज भी सोमनाथ चटर्जी जैसे कुछ लोग इस देश में हैं जिसके कारण लोकतान्त्रिक और संसदीय व्यवस्था आज भी जिन्दा है|

मुझे आश्चर्य है कि कुछ मुट्ठी भर लोगों के द्वारा संविधान और आंतरिक चीजों पर चोट किया गया| फिर भी कुछ ऐसे व्यक्ति, वर्ग, समुदाय के कुछ नैतिकवान लोग, इतने गंभीर दुर्घटना को लेकर चुप हैं| वे या तो बुदबुदा रहे हैं या खामोश हैं| जो लोग आज टीम अन्ना के जन लोकपाल के साथ हैं, उनसे मैं कहूँगा कि आप सदन से इस्तीफ़ा दें और चुनाव लड़ें तो आपको समझ में आ जायेगा भारत और इंडिया में फर्क| क्यों आप कुर्सी से चिपके हुये हैं?

कांग्रेस के सरकार से आग्रह करेंगे की लोकतंत्र को बचाने के लिए सरकार की कुर्बानी देनी पड़े तो किसी भी कीमत में व्यबस्था को बचाने में देर नही होनी चाहिएटीम अन्ना से हम विनती करेंगे कि आप एक जन लोकपाल पार्टी बना लें और चुनाव मैदान में इतिहास लिखने के लिए तैयार हो जाएँ| दो तिहाई से जीत कर आयें और पूरी तरह से हिटलर शाषण को स्थापित कर, भारत के लोकतान्त्रिक, सांस्कृतिक परंपरा को नंगा कर दें|

अंत में, हमें नही भूलना चाहिए कि आखिर बारह दिनों से रामलीला मैदान में चल क्या रहा था? अन्ना अनशन एपिसोड को देखे तो रामलीला की क्रांति कि भूमिका और उनके योगदान के बारे में चिंतन करना पडेगा| रामलीला अनशन का हाई टेक ड्रामा जब शुरू हुआ तो कहा गया था जब तक संसद में जन लोकपाल पारित नही हो जायेगा तबतक अनशन चलता रहेगा | “हम जियें या मरें भ्रष्ट्राचार मिट के रहेगा|” ना तो सरकार ने ऎसी कोई वादा की और ना ही जन लोकपाल बिल पारित हुआ| फिर ऎसी कौन सी परिस्थिति आ गई जो उन्होंने अनशन तोड़ दिया| क्या इसके पीछे टीम अन्ना ने कोई सौदेबाजी की है! अगर किया तो जनता के बीच ये बात आनी चाहिए| और नही किया है तो अन्ना के टीम को बताना चाहिए कि अन्ना ने अनशन तोडने का निर्णय क्यों लिया? जब पी.एम. और पूरे सदन के तरफ से अनशन तोड़ने का आग्रह किया गया था तो अनशन क्यों नही तोड़ा गया? देश के युवाओं को झूठी सब्ज-बाग क्यों दिखाया गया? यह क्यों प्रचारित किया गया कि ये देश की आजादी का दूसरी लड़ाई है| क्या आजादी की लड़ाई मुकम्मल हो गयी? जनता जानना चाहती है कि उसके अरमानों का सौदा क्यों किया गया? जब अन्ना अनशन तोड़ रहे थे तो क्या देश से भ्रष्ट्राचार खत्म् हो गया था? यदि भ्रष्ट्राचार खत्म नही हुआ तो क्या ये नही माना जाए कि देश के जनता के साथ अन्ना ने बड़ा छल किया! मेरा मानना है कि देश की आजादी के बाद झंडा का रंग बदला लेकिन बुराइयां नहीं बदली; बुराइयां बढ़ती चली गई| रामलीला मैदान के बचकाने आंदोलन के बाद कुछ मुठ्ठी भर लोगों ने गांधी के टोपी छोड़ अन्ना की टोपी पहन लिया| मेरा सवाल है कि क्या किसी भी तरह के लोकपाल बिल के कानून को लेकर बड़ी आशा होना चाहिए? क्या कोई भी संस्था हमें मूलभूत सुबिधा, सुरक्षित और बुराई मुक्त समाज देगी? मुझे नही पता! हमें ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो धर्म को सही तरह से समझें, उनकी नहीं जो धर्म को लेकर खेलतें हैं! कोई इन मूर्खों को समझाए कि हम पहले ही बटवारा देख चुके है, जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रबाद की मजबूत की चोट भारत पर पड़ चुकी है| अब हमें और कितने बटवारे की जरूरत है? हम खतरनाक दौर में प्रवेश करते जा रहे है| हमें यह आजादी कई बलिदानों के बाद मिली है, इसकी इज्जत करना चाहिये| हम गरीबी दर्द और दूसरे सामाजिक मसले से तोबा करना कहते हैं, क्यों? हमें अमन की बात करनी चाहिए जंग की नही| जंग हमें तोड़ देगी और ऐसे करने वालों को इतिहास कभी माफ नही करेगा|
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