Tuesday, March 27, 2012

तकदीर लिखिए, तदबीर नहीं


कभी समुद्र में गहरे उतरे हैं आप? मौका मिले तो ऐसा जरूर कर देखिएगा। अथाह लगने वाली गहराई में आप ज्यों-ज्यों धंसते जाते हैं, हर पल एक नई दुनिया सामने आती जाती है। जहां सूरज की किरणें तक नहीं पहुंचतीं, वहां एक समूची दुनिया सांस ले रही होती है। जल का अपना जीवन होता है। इतिहास का भी। जाने बूझे सत्य, तथ्य और कथ्य को जितना हिलाइए-डुलाइए उतने अर्थ नजर आते हैं। क्यों न हम भी ऐसा कुछ करें? आजादी की वर्षगांठ के इस महीने के पहले हफ्ते देश की मौजूदा चुनौतियों को गुजरे जमाने की घटनाओं से जोड़कर देखेंगे। आखिर हमारा आज गुजरे कल पर टिका है, जैसे आने वाला कल वर्तमान पर।
क्या हो रहा था अगस्त 1947 के पहले हफ्ते में। साफ हो चुका था, हजारों साल से चला आ रहा यह राष्ट्र अब दो मुल्कों में बंटने जा रहा है। बंटवारा मजहब के नाम पर हुआ था, लिहाजा सदियों से साथ रहते आए लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे। हर ओर लहूलुहान आशंकाएं बिखरी पड़ी थीं। क्या विडंबना थी! पीढ़ियों से संग जिंदगी गुजार रहे लोग अपनी ही जमीन से धकिया दिए गए थे। उनका खून-पसीना पोंछने के लिए जो हाथ उठ रहे थे, वे अपरिचित थे। पंजाब, सिंध और बंगाल का हाल सबसे बुरा था। इसके लिए जिम्मेदार मोहम्मद अली जिन्ना इसी हफ्ते के अंतिम दिन अपने सपनों के पाकिस्तान के लिए रवाना होने वाले थे, हालांकि जो सरजमीं उनका खैरमकदम करने वाली थी, वह तब तक हिन्दुस्तान का ही हिस्सा थी।
देश को दो हिस्सों में बांटने का संकल्प लेकर आए लॉर्ड माउंटबेटन के सामने बहुत बड़ी चुनौती थी। वह कानून और व्यवस्था का पालन करवाने में नाकाम साबित हो रहे थे। उधर जिन्ना की गरदन के बल कायम थे। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी एक बार फिर हिम्मत संजो रहे थे, पर सवाल उभर रहा था कि क्या वह भारतीय समाज और राजनीति के लिए कुछ नया कर सकेंगे?
जवाहरलाल नेहरू के स्वप्नजीवी भाषण लोगों के दिल-दिमाग पर छाए हुए थे। नेहरू आम आदमी में उम्मीद का संचार करने में भले ही कामयाब लग रहे थे, पर भारत नाम का यह देश कैसा होगा, इस पर कई सवालिया निशान थे। हैदराबाद, जूनागढ़ और जम्मू-कश्मीर के शासकों ने अभी तक विलय प्रस्ताव पर दस्तखत नहीं किए थे। इनके बिना भारतीय गणराज्य की कल्पना अधूरी थी।
उधर उत्तर-पूर्व में कुछ लोग अलगाव की दुकान चला रहे थे। मसलन, मणिपुर में तत्कालीन मुख्यमंत्री इरबोट सिंह खुद को संप्रभु राष्ट्र का सर्वेसर्वा साबित करने पर आमादा थे। वहां के राजा की हालत पतली थी। किसी को यकीन नहीं था कि घने जंगलों, पहाड़ों और दुर्गम घाटियों से बने ‘सतबहनी’ के राज्य कभी लोकतंत्र की किलकारियों से खुद को आनंदित महसूस करेंगे। हमारी धरती पर उभर रही चारदीवारियों के दोनों तरफ कुछ ऐसे लोग थे, जो हिंदू और मुस्लिम राष्ट्र के सपने बुन रहे थे। अगस्त के उस पहले हफ्ते तक लाखों लोग यह जान चुके थे कि सिर्फ एक हफ्ते बाद उनमें से कुछ की पहचान बदल जाएगी। वे हिन्दुस्तानी से पाकिस्तानी बन जाएंगे।
पर बहुत कुछ अनजाना और अनकहा था। मसलन, सिर्फ छह महीने बाद अनहोनी घटने जा रही थी। एक ऐसे आदमी की हत्या, जो यकीनन उस समय दुनिया का सबसे लोकप्रिय शख्स था। जी हां, किसी ने सोचा भी न था कि खुद को हिंदुओं का प्रतिनिधि बताने वाला कोई युवक गांधी जी की हत्या कर देगा। खुद गांधी आश्वस्त थे कि ऐसा नहीं होगा। सिर्फ दस दिन पहले 20 जनवरी, 1948 को भी उन पर हत्यारों की इसी टोली ने हमला बोला था, पर वह सुरक्षा बढ़ाने पर राजी नहीं हुए। नेहरू के शब्दों में अपनी नियति खुद लिखने वाले राष्ट्र में एक प्रवृत्ति उभर रही थी, वक्ती लोकप्रियता अजिर्त करने की। अर्धसत्य को संपूर्ण सच साबित करने की। आने वाले वक्त में यह पुख्ता होती गई।
तीन उदाहरण देना चाहूंगा। अगस्त 1977 में हम अति आशावाद के शिकार थे। मार्च में जनता पार्टी शासन में आ चुकी थी। ऐसा लग रहा था कि हिन्दुस्तानी जम्हूरियत जवान हो गई है। वंशवाद का नामोनिशान मिट गया है। कुछ ही सालों में हम सबसे बड़े ही नहीं, बल्कि आदर्शतम लोकतंत्र के तौर पर जाने और माने जानेवाले हैं। यह सपना दो साल भी नहीं चला। ठीक इसी तरह स्वघोषित ‘सत्य’ और ‘ईमानदारी’ की राह पर चलते हुए विश्वनाथ प्रताप सिंह और उनके अलंबरदार अगस्त के पहले हफ्ते में दहाड़ रहे थे। परिणाम? ढाक के तीन पात।  1992 के अगस्त का पहला हफ्ता। पूरा देश हिंदू लहर में डूब-उतरा रहा था। और तो और नाथूराम गोड्से के भाई गोपाल गोड्से शहर-दर-शहर घूमकर प्रचार कर रहे थे कि उन्होंने अपने भाई के साथ गांधी जी पर गोली क्यों चलाई? वह इसे ‘हत्या’ नहीं, ‘वध’ मानते थे। उनकी पुस्तक ‘गांधी वध और मैं’ की बिक्री जोरों पर थी। नतीजतन, अयोध्या का राम मंदिर उन लोगों की महत्वाकांक्षा का हिस्सा बन गया था, जिनके पुरखों ने भी कभी अयोध्या में कदम नहीं रखे थे। सब जानते हैं। न मंदिर बना, न हिंदू राष्ट्र अलबत्ता सदा सर्वदा के लिए भारतीय राजनयिकों से सफाई मांगने का बहाना हमसे द्वेष रखने वाले देशों को मिल गया।
इसीलिए आज जब कुछ लोग खुद को 121 करोड़ की आबादी वाले महान देश की ‘सिविल सोसाइटी का नुमाइंदा’ बताकर बयानबाजी करते हैं, तो डर लगता है। लोगों को पहले भी शब्दों की आडंबरी आंधियों में उड़ाने का काम किया गया है। तनी हुई पतंग की तरह हवा में ऊपर जाना तो अच्छा लगता है, पर जब कटी पतंग की तरह अरमान धूल चाटते हैं, तो कुंठाएं पैदा होती हैं। ये तीन उदाहरण इस सच को बताने और जताने के लिए काफी हैं। मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहूंगा कि यकीनन इस समय देश के सामने महंगाई और भ्रष्टाचार सबसे बड़े मुद्दे हैं, पर इनसे जूझने के लिए एक सामूहिक रणनीति की जरूरत है। लोकप्रिय बयानबाजी की नहीं। पहले भी इसको देश भोग चुका है।
अगस्त 1947 के पहले हफ्ते से मौजूदा हालात की तुलना करें, तो आपका सिर यकीनन गर्व से ऊंचा हो उठेगा। अब हम एक लहूलुहान देश नहीं हैं। हमारी ताकत का लोहा दुनिया मानती है। यह बात अलग है कि कुछ मूलभूत समस्याएं आज भी कायम हैं। पर ऐसा संसार के किस देश में नहीं है? क्या सबसे ताकतवर देश अमेरिका में, जिसने अभी आजादी की 234वीं वर्षगांठ मनाई है, गरीबी नहीं है? क्या वहां बेरोजगारी के आंकड़े नहीं बढ़ रहे? क्या ओबामा पहले अश्वेत राष्ट्रपति नहीं हैं? क्या अभी तक वहां किसी भी महिला को राष्ट्रपति बनने का मौका मिला है? क्या धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला यह देश अंदरूनी तौर पर कंपकंपी का शिकार नहीं है? अगर यह सच है, तो शर्म के बजाय गर्व कीजिए। हमने गए 64 सालों में बेहद महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की हैं।
भूलिए मत। सफलताएं तभी बरकरार रहती हैं, जब नई चुनौतियां पैदा होती हैं। सिर्फ हमारे देश में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में यह जबरदस्त परिवर्तन का दौर है। बदलाव अंधी गुफाओं में भटकने का अभ्यस्त होता है। उसके साथ चलते-दौड़ते अक्सर लगता है कि हम भटक गए हैं। पर हर अंधेरी रात के आगे उजला सवेरा होता है।

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