Wednesday, March 28, 2012

बाजार की गिरफ़्त में मीडिया



आज पूरी दुनियाँ पर बाजारवाद का संकट गहराता जा रहा है। बाजार बहुत ही तेजी के साथ समस्त संसाधनों पर अपना कब्जा जमाता जा रहा है। चाहे वह प्राकृतिक संसाधन हो या गैर प्राकृतिक हो। उत्पादन शक्ति से लेकर उत्पादित वस्तु तक सभी बाजार की गिरफ़्त में आ गए हैं यहाँ तक की इंसान भी बाजार की एक वस्तु मात्र बनकर रह गया है।

पूँजीवादी सभ्यता ने साहित्य, कला, संस्कृति यहाँ तक की ज्ञान को भी बाजार की वस्तु बनाकर रख दिया है। दुनिया के सामने सच की तस्वीर रखने का दावा करने वाली हमारी मीडिया, समाचार पत्र भी आज बाजार की गिरफ्त में आ गए हैं। कभी-2 तो ऐसा लगता है जैसे पत्रकारिता पत्रकारिता न होकर पूँजीपतियों और सरकारों की चाटुकारिता करती नजर आती है। खास तौर से भारत की पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा शोषकों और साम्राज्यवादी ताकतों की ही वकालत करता दिखाई देता है। ऐसा हो भी क्यों न क्योंकि आज की पत्रकारिता इन्हीं पूँजीपतियों, भ्रष्टाचारियों और जमाखोरों के विज्ञापन के बलबूते जीवित है। ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि आज का प्रकाशक, सम्पादक और पत्रकार जनसेवक नहीं अपितु वह देश के बड़े अमीरों की कतार में खड़ा होना चाहता है। आज का प्रकाशक, सम्पादक व मीडिया कर्मी यह पूरी तरह से भूल गया है कि पत्रकारिता के मायने क्या होते हैं और पत्रकारिता किसे कहते हैं।

भूमण्डलीकरण के इस वर्तमान दौर में भारतीय पत्रकारिता ने बाजार की शक्तियों के सामने घुटने टेक दिए हैं वैसे तो भारतीय पत्रकारिता का दायरा बहुत बड़ा है। यही नहीं भारत में तो मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ भी कहा जाता है। इसके बावजूद भी भारतीय पत्रकारिता पूरी ईमानदारी के साथ जनहित में खड़ी होती नजर नहीं आती। पूरा मीडिया जगत जनसरोकारों की जगह बाजार से सरोकार रखने लगा है। अंग्रेजी पत्रकारिता तो तमाम सामाजिक सरोकारांे और नैतिक मूल्यों से पल्ला झाड़कर सीधे-2 बाजार से जुड़ गई है। लेकिन वर्तमान समय में हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के बहुसंस्करणीय अखबार भी अंग्रेजी पत्रकारिता के नक्शेकदम पर चल पड़े हैं और इसके चलते उनकी अपनी कोई पहचान नहीं रह गई है। भूमण्डलीकरण और साम्राज्यवादी नीतियों के चलते भारत के आम आदमी का जीवन कष्टों का पर्याय बन गया है। इससे इनका कोई नाता नहीं है। साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ संघर्षरत श्रमिकों, किसानों व जन सामान्य के कष्टों से उदासीन हमारे भारतीय भाषाओं के बड़े कहे जाने वाले अखबार आम जनता के संघर्ष से कहीं भी जुड़े हुए दिखाई नहीं देते। सत्तासीन राजनैतिक पार्टियों के जोड़-तोड़ की राजनीति में ही मशगूल हैं। जनता के दर्द से इनका कोई भी लेना देना नहीं रह गया है।

जहाँ तक क्षेत्रीय अखबारों का प्रश्न है वे अपनी साधन हीनता के चलते अपने अस्तित्व को ही बचाने में लगे रहते हैं लेकिन अब इन अखबारों के प्रकाशकों के अंदर भी बाजारवादी मानसिकता घर करने लगी है जो कभी परिवर्तन कामी आन्दोलनकारी भूमिका निभाने की इच्छा रखते थे। अब यह भी बाजार के रंग में रंगने लगे हैं। वर्तमान समय में इन अखबारों के प्रकाशक और पत्रकार स्थानीय व्यापारियों, माफियाओं, सांसदों, मंत्रियों, और छुट-भइये नेताओं के विज्ञापन के नाम पर मोटी रकम काटने के चक्कर में इनकी दलाली व चापलूसी करते फिरते हैं। स्थानीय स्तर पर फूट रहे जन-आन्दोलनों और संघर्षों की रिर्पोटिंग न के बराबर ही करते हैं। यदि करते भी हैं तो आलोचनात्मक रिर्पोटिंग करते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि यह जन आन्दोलनों को उत्साहित करने की जगह हतोत्साहित करते नजर आते हैं। भारत जैसे देश में, जिसे कृषि प्रधान देश कहा जाता है, जिस देश की 60 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर करती है उस देश में लगभग 40 हजार किसानों ने पिछले एक दशक के अंदर आत्महत्याएँ कर लीं। बेरोजगारी की मार से आज का शिक्षित युवा वर्ग आत्महत्या करने को विवश है, आई।टी. जैसे संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थी आत्महत्या करने को मजबूर हैं। आज देश में शिक्षा का निजीकरण दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों का व्यक्तिगत क्षेत्र में विलय होता जा रहा है लेकिन वर्तमान समय में पूरे देश की मीडिया मौन खड़ी है। आज जनता शासक वर्ग के खिलाफ दिनों दिन हथियार उठाती जा रही है। केन्द्र सरकार व राज्य सरकारें अपने दमनात्मक अभियानों से उन जन आन्दोलनों को कुचलने का असफल प्रयास कर रही हैं। फिर भी ये जन आन्दोलन दिनो दिन बढ़ते ही जा रहे हैं। यह बात जुदा है कि आज का जन आंदोलन संगठित न होकर अनेक धाराओं में बँटा हुआ है और जनता का भारी समर्थन जुटाने में असफल है। इसके पीछे शासक वर्ग द्वारा मीडिया के माध्यम से किया जा रहा दुष्प्रचार, ज्यादा कारगर साबित हुआ, क्योंकि मीडिया का सबसे बड़ा हिस्सा, केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों, पूँजीपतियों व साम्राज्यवादी ताकतों से संचालित होता है और शासक वर्ग यह कभी नहीं चाहता है कि उसके खिलाफ खड़ा हो रहा कोई भी जन आन्दोलन मजबूत हो और उनकी शोषण परक व्यवस्था को नेस्तानाबूद कर जनता के लिए एक शोषण विहीन शासन व्यवस्था का निर्माण करे इसके लिए देश में जन सरोकारी मीडिया की अत्यन्त आवश्यकता है जो बाजार के चंगुल से मुक्त हो, जो जनता के अधिकारों के लिए काम करे, जो मानवीय संस्कृति, साहित्य, कला और शिक्षा का निर्माण करे और व्यापक जनता के पक्ष में खड़ी होकर जनपक्षधरता की बात करे, एक जनसंस्कृति के निर्माण में अपनी भूमिका अदा करे। सही मायने में वही पत्रकारिता एक श्रेष्ठ पत्रकारिता होगी जो वास्तव में मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त कर एक समाजवादी व्यवस्था का निर्माण करने में अपनी महती भूमिका अदा करेगी।

No comments:

Post a Comment

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...