Thursday, July 26, 2012

सरकार अगर गहरी नींद में है, तो जनता को जागना ही पड़ेगा



दरभंगा अब राज्य प्रायोजित आतंकवाद के प्रतिरोध का केंद्र बन रहा है। हमने आजमगढ़ में बहुत पास से देखा है कि किस तरह अपहरणकर्ता-अपराधी एटीएस-एसटीएफ के लोगों को दौड़ा-दौड़ा कर, पकड़ कर पूछताछ की गयी और गैरकानूनी गिरफ्तारियों और छापेमारी को रोका गया। यह सिलसिला दरभंगा में भी शुरू हो चुका है। जिस तरह यूपी में एक दौर में आतंकवाद के नाम पर हो रही फर्जी गिरफ्तारियों को लेकर एसटीएफ अधिकारियों के नार्को टेस्ट और उसे भंग करने की मांग मुद्दा बनी, आज उसी तरह एक बार फिर से एटीएस के खिलाफ भी ऐसा माहौल बन रहा है। यह जद्दोजहद फासीवादी/सैन्यवादी मानसिकता वाले राज्य की नीतियों के खिलाफ लोकतांत्रिक राज्य के लिए है। इस मुहीम में सियासत तो बदलेगी ही, बेगुनाहों को भी छोड़ना पड़ेगा।

13 मई को सउदी से अपहरण किये गये फसीह महमूद, जिन्हें आज तक पेश नहीं किया गया, की पत्नी निखत परवीन बता रही थीं कि दरभंगा से फिर किसी को उठाने जा रहे थे। कुछ लोग एक कार में बैठे थे और उनमें से एक सामने वाले डाक्टर की क्लीनिक में देखने गया। एक बंदे को बुला कर कहा कि उस कार वाले लोग तुम्हें बुला रहे हैं। जब वो उस कार के पास गया, तो पुलिस वालों ने जो सिविल ड्रेस में थे, उसका अपहरण करने का प्रयास किया। आस-पास के लोगों ने जब कार रोकी और उस बंदे को निकाला तो पुलिस वाले वहां से भाग गये। इसी तरह की घटना एक और गांव में हुई, जहां पर बाद में एटीएस वालों ने आकर माफी मांगी कि वो लोग गलती से उसे उठाने आये थे। निखत आगे कहती हैं कि अगर लोगों ने बचाव नहीं किया होता, तो आज उनकी गलती नहीं होती बल्कि एक बड़ा नया आतंकवादी पकड़ा गया होता।

इसी तरह आजमगढ़ में भी हुआ था। जब वहां आतंकवाद के नाम पर दमन हो रहा था, तो आम नागरिकों ने गांव-गांव में पर्चे बांटे थे कि अगर आपका कोई करीबी गायब है, तो आप इन सरकारी और मानवाधिकार संगठनों के नंबरों पर फैक्स-फोन-ईमेल करिए। एटीएस-एसटीएफ के आतंक के खिलाफ ग्राम सुरक्षा कमेटियां बनायी गयीं। आज फिर उसी आंदोलन की दस्तक दरंभगा में भी हो चुकी है।

नीतीश सरकार बताये कि आखिर उसके सुशासन वाले राज्य में बिना नंबर प्लेट के एटीएस की कार कैसे घूम रही है। नीतीश को याद रखना चाहिए कि आजमगढ़ जिसे आतंकवाद की नर्सरी के बतौर स्थापित करने की राज्य ने कोशिश की, वहां के लोगों ने 2009 के लोकसभा और 2012 के विधानसभा चुनाव के एजेंडे को बदल दिया। बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ के बाद आजमगढ़ में बनी राष्‍ट्रीय ओलमा कांउसिल अपने आप में एक नयी राजनीति की दस्तक थी।

कांग्रेस ने चुनावों में हुई अपनी करारी हार का कारण भी इसे माना। सत्ता में आयी मुलायम सरकार ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में इस बात को कहा था कि वो सरकार में आएगी, तो आतंकवाद के नाम पर पकड़े गये बेगुनाहों को छोड़ेगी। आज सपा के सत्ता में आने के बाद लगातार सरकार को राजनीतिक दल और मानवाधिकार संगठन इस बात पर घेरे हुए हैं। सरकार के नुमाइंदे बार-बार छोड़ने की प्रक्रिया के बारे में बयान देते नजर आते हैं।

इसकी तस्दीक लखनऊ की दीवारों पर चिपके ‘वादा निभाओ’ पोस्टर, खुफिया और एटीएस की सांप्रदायिकता के खिलाफ और ‘खुफिया द्वारा संचालित इंडियन मुजाहिदीन पर श्‍वेत पत्र जारी करो’ की मांग वाले बैनर करते हैं। आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों की रिहाई के लिए पिछली 30 जून को विधानसभा घेराव के एक दिन पहले ही यूपी के एडीजी (कानून व्यवस्था) जगमोहन यादव को कहना पड़ा कि एटीएस और जिलों के कप्तानों से ऐसे मामलों को चिन्हित करने को कहा गया है, जिनमें फर्जी धरपकड़ की शिकायत है। खैर, जो भी हो, अगर सपा सरकार स्वतंत्रता दिवस तक आतंकवाद के नाम पर पकड़े गये निर्दोषों को नहीं छोड़ती है, तो इसके खिलाफ एक बड़े जनआंदोलन की तैयारी हो चुकी है।

सैकड़ों दलितों के हत्यारे ब्रम्हेश्‍वर मुखिया को रिहा करने वाली नीतीश सरकार बताये कि उसके राज्य के कतील सिद्दीकी को पुणे की जेल में मार दिया जाता है और उसी के गांव बाढ़ समेला, दरभंगा के फसीह महमूद का दो महीनों से भारतीय एजेंसियों ने अपहरण किया, इस पर उसने क्या किया? उसे ही नहीं, बिहार में पसमांदा (पिछड़े-दलित) मुसलमानों की राजनीति करने वाले और मुस्लिम समुदाय पर ‘मसावात की जंग’ जैसी गंभीर किताब लिखने वाले अली अनवर अपनी चुप्पी तोड़ें। कुछ दिनों पहले बिहार के मधुबनी जिले के सकरी क्षेत्र से फिर एक व्यक्ति के उठाने की खबर सामने आयी थी।

नीतीश बाबू, दरभंगा की गलियों में राज्य प्रायोजित आतंक का जो बीजारोपण हुआ है, उसे जाकर देखिए कि किस तरह लोगों का जीना मुहाल हो गया है। पिछले दिनों दरभंगा के मानवाधिकार नेता शकील शल्फी बता रहे थे कि महेशपट्टी के एक लॉज से पुलिस वाले कुछ मुस्लिम लड़कों को उठा ले गये और दो दिन बाद उन्हें यह लिखवाते हुए छोड़ा कि हम अपनी मर्जी से आये थे। नीतीश जी, जरा अपना कामन सेन्स लगाइए कि जिस इलाके में खाकी वर्दी क्या, किसी हट्टे-कट्टे मोटे आदमी को पुलिस वाला समझकर लोग दहशत में जी रहे हैं, वहां कोई अपनी मर्जी से पुलिस वालों के पास जाएगा?

शकील बताते हैं कि मुंबई एटीएस के नाम से दरभंगा के कुछ लड़कों को फोन करके उन्हें धमकाते हुए मुंबई आने का दबाव बनाया गया कि चुपचाप बिना किसी को बताये वो मुंबई पहुंचे। कुछ दिनों पहले बैंग्लोर में इंजीनियरिंग पढ़ने वाले अब्दुल निसार को लंबे समय तक एटीएस ने पूछताछ के नाम पर यातना दी। वह डर के मारे किसी को कुछ नहीं बता रहा था, पर उसके शरीर पर गंभीर चोट के निशान देखकर जब परिजनों ने पूछा, तो वह रो-रो कर एटीएस की यातना की लंबी दास्तान बताने लगा। लगातार परिजनों को एटीएस की धमकी मिल रही है और वह पढ़ाई छोड़कर गांव में डर-डर कर रह रहा है।

इसी तरह आजमगढ़, संजरपुर के अबू राशिद पर मुंबई के क्राइम ब्रांच ने दबाव बनाया कि वो मुंबई आये और इसके लिए वे उनके भाई अबू तालिब को उठाकर आजमगढ़ ले आये और फिर अबू राशिद को संजरपुर गांव के लोगों ने इस भरोसे के साथ आजतक टीवी चैनल की मौजूदगी में विदा किया कि जांच करके वो लोग छोड़ देंगे? पर उनके भरोसे को मुंबई क्राइम ब्रांच ने तोड़ दिया और रास्ते से अपहरण कर लिया और आज तक किसी अदालत में पेश नहीं किया और अब उसे फरार बताती है। सवाल यह है कि अगर उसे फरार होना होता, तो वह सार्वजनिक तौर पर जाता ही क्यों? पर इसका जवाब आजमगढ़ ने दिया, जहां राज्य आजमगढ़ को आतंकवाद के नाम पर निर्दोषों के उत्पीड़न का केंद्र बनाने पर तुला था, वहीं आजमगढ़ आंदोलन का केंद्र बनकर उभरा।

नीतीश जी, रमजान का महीना है और आप और आपके नुमाइंदे इफ्तार करने-करवाने की तैयारी में भी होंगे। क्या आपको मालूम है कि आपके राज्य की राजधानी पटना से कुछ सौ किलोमीटर दूर रहने वाली लड़की निखत परवीन अपने पति फसीह महमूद, जिसे भारतीय एजेंसियों ने दो महीनों से गायब किया है, की खोज में दर-दर भटक रही है? यहां तक कि पिछले दिनों इंटरपोल ने कहा है कि जब तक भारत चार्जशीट नहीं देता, तब तक हम फसीह को भारत को नहीं सौंप सकते।

उत्तर प्रदेश में राज्य प्रायोजित आंतकवाद के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन की शुरुआत आपको जानना चाहिए। 2007 में उत्तर प्रदेश की कचहरियों में हुए धमाकों के बाद 12 दिसंबर को आजमगढ़ से तारिक कासमी और 16 दिसंबर को मड़ियाहूं से खालिद का अपहरण यूपी एसटीएफ ने किया था, जिसके बाद आजमगढ़ में जबरदस्त आंदोलन हुआ और नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के नेता चौधरी चंद्रपाल सिंह ने कहा कि अगर 22 दिसंबर 2007 तक तारिक को नहीं लाया गया, तो वे आत्मदाह कर लेंगे। एसटीएफ ने 23 दिसंबर को तारिक-खालिद को बाराबंकी से गिरफ्तार करने का दावा किया। जनांदोलनों के दबाव में पिछली मायावती सरकार को यूपी एसटीएफ द्वारा की गयी इस फर्जी गिरफ्तारी पर आरडी निमेश जांच आयोग का गठन करना पड़ा और जब से सपा की सरकार बनी है, वो इतने दबाव में है कि उसके नुमांइदे बार-बार छोड़ने की बात करते हैं।

कतील सिद्दीकी हों या फिर बाटला हाउस में कत्ल किये गये साजिद-आतिफ, वे भले जीते जी इस क्रूर राज्य व्यवस्था में न्याय नहीं पा सके, पर इनकी शहादत और न्याय के लिए चल रहा आंदोलन ही फासीवादी नीतियों को रौंदते हुए एक लोकतांत्रिक राज्य को कायम करेगा। सियासत भी बदलेगी और बेगुनाह अपने घरों पर लौंटेंगे भी, जहां उनके अपने बेसब्री से उनका इंतजार कर रहे हैं।

(राजीव यादव। पीयूसीएल यूपी के प्रदेश संगठन सचिव। आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद अपने प्रदेश में चल रहे जनसंघर्षों की रिपोर्टिंग में रम गये। वाम प्रतिबद्धता वाले युवा पत्रकारों के संगठन जेयूसीएस (जर्नलिस्‍ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी) से भी जुड़े हैं। उनसे rajeev.pucl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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