Wednesday, August 01, 2012

बलात्कार पर दोहरे मानदंड क्यों? सज़ा मौत क्यों नहीं…



गुवाहाटी में एक युवती के साथ छेड़खानी की घटना के बाद मीडिया ने जिस तरह उसका चीर हरण किया उस पर कई सवाल खड़े हुए हैं. घटना का वीडियो बनाने वाले रिपोर्टर का गिरफ्तार होना पत्रकारिता के गिरते स्तर का एक और प्रमाण है. घटना में टीआरपी थी इसलिए मीडिया इस पर भूखे भेड़िये की तरह टूट पड़ी, वरना दलित और गरीब लड़कीयों से बलात्कर की खबरें रोज पेज आठ पर सिंगल कॉलम में निपट जाती हैं.
हमारे देश में हर दिन गरीब और दलित युवतियों के साथ बलात्कार होते है, लेकिन उन पर  हुआ जुल्म मीडिया में इसलिए नहीं दिखाया जाता क्योंकि वे लड़कियां गरीब या दलित परिवार की होती हैं, पब और डिस्को के बारे में जानती तक नहीं, जिन्दगी में कभी जींस नहीं पहना… चेहरे पर शर्म लेकर चलती हैं… यानि पिछड़ी महिलाओं का प्रतीक हैं. अगर माडर्न और फेशेनेबल लड़की के साथ छेड़खानी हो तो पूरा देश उबल पड़े और अगर रोजाना सैंकड़ों गरीब-दलित लड़कियों की इज्जत तार-तार हो जाए तो किसी को फर्क न पड़े…

दलितों के साथ बलात्कार के अनेको उद्धाहरण दिए जा सकते हैं, जिन पर हमारी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की नज़र नहीं गई. दो दिन पहले ही गोवा की राजधानी पणजी में 17 साल की एक लड़की ने दम तोड़ दिया. इस बच्ची ने अपने साथ बलात्कार करने वाले आरोपी शिक्षक की रिहाई की ख़बर सुनते ही खुद को आग लगा ली थी. लड़की ने अपनी अंतिम चिट्ठी में लिखा कि वह डर से इतना बड़ा क़दम उठा रही है, क्योंकि आरोपी ज़मानत पर रिहा हो चुका है.
ओडिशा के पुरी जिले में लगभग सात महीने तक कोमा में रहने के बाद कथित रूप से सामूहिक बलात्कार की शिकार 19 वर्षीय दलित लड़की बबीना की पिछले महीने मौत हो गई. बताया जाता है कि पिछले साल 28 नवंबर को पुरी जिले में अर्जुनगोदा गांव में बबीना एक खेत के पास अर्धनग्न, बेहोश और अधमरी हालत में मिली. उसके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था और उसके बाद उनकी गला घोंटकर हत्या करने की कोशिश की गई थी. तब से वो कोमा में थी.
हमारी दिल्ली तो बाकी राज्यों से चार क़दम आगे ही है. दिल्ली में एक व्यक्ति ने 15 साल की लड़की को अगवा कर लिया. इस व्यक्ति ने अपनी पत्नी की मदद से इस नाबालिग से बलात्कार किया. इसके बाद पति-पत्नी ने  इसे रोहिणी इलाके में रहने वाले एक व्यक्ति को बेच दिया. उसने भी इस बच्ची के साथ अपना मुंह काला किया.
और जब हमारे रक्षक ही भक्षक बन जाएं तो क्या होगा? उत्तर प्रदेश की पुलिस ऐसा करने में माहिर है. उत्तरप्रदेश में कुशीनगर जिले के खड्डा थाना परिसर में पुलिसकर्मियों द्वारा एक महिला को जबरन शराब पिलाकर सामूहिक बलात्कार किये जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया. ऐसे बेशुमार मामले हैं, जिसमें हमारे रक्षक ही भक्षक बन जाते हैं. या फिर महिलाएं ही महिलाओं की दुश्मन बन जाती हैं.
आगे की कहानी तो और भी भयावह है. केरल के सुधीर नाम के एक व्यक्ति ने न केवल अपनी बेटी का बलात्कार किया बल्कि पैसों के लिए उसे कम से कम 200 लोगों के साथ यौन संबंध बनाने पर भी मजबूर किया. इस मामले में पुलिस ने 106 लोगों को गिरफ्तार किया, जिसमें एक वकील, एक डॉक्टर, एक फिल्म प्रोड्यूसर और एक व्यवसायी शामिल है, जिन्होंने इस 14 वर्षीय लड़की का शोषण किया है. यही नहीं, अर्नाकुलम के अतिरिक्त सत्र-न्यायालय के न्यायाधीश पीजी अजित कुमार ने बताया कि भारत में कुल 26 ऐसे मामले हैं जिसमें लोगों ने अपनी बेटियों का बलात्कार किया है.

क्या यह घटनाएं हमारी दोहरी मानसिकता और मानदंड़ों का प्रमाण नहीं ?

कई मामले ऐसे हैं जो पुलिस थानों तक पहुंचते हैं, लेकिन उनका होता कुछ नहीं हैं. भारतीय क्राइम रिकार्डस ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक देश में पिछले साल 24,000 से अधिक बलात्कार के मामले दर्ज किए गए लेकिन उनमें से महज 26 प्रतिशत मामलों में ही दोषियों को सजा हो पाई. और सच तो यह है कि समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों के चलते बलात्कार के ज्यादातर मामले दर्ज हो ही नहीं पाते हैं. हमारी अदालतों पर भी अब दलितों व गरीबों का बहुत ज़्यादा यक़ीन रह नहीं गया है. हालांकि इन दिनों हमारी अदालत इन दिनों इस मामले पर काफी सक्रिय दिखाई दे रही है.

दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि 15 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ विवाह के बाद जब संभोग होता है तो उसे बलात्कार माना जाएगा. चाहे यह संभोग लड़की की रजामंदी से हुई हो.
कितनी अजीब बात है कि एक तरफ हमारी अदालतें 15 वर्ष की उम्र में शादी को जायज़ क़रार देती है, दूसरी तरफ रजामंदी से हुए संभोग को बलात्कार का नाम दिया जा रहा है. मैं यहां अदालत के फैसले की सम्मान करती हूं, लेकिन कोई यह बताए कि ऐसे मामलों में निगरानी रखेगा कौन?  और फिर जब सब कुछ रजामंदी से हो रहा है तो मामला थानों या अदालतों में जाएगा कैसे?  और फिर आपसी सहमति से बने संबंध को बलात्कार कैसे कहा जा सकता है? ये हम सबके समझ से परे है. इधर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘बलात्कार’ के स्थान पर ‘यौन उत्पीड़न’ शब्द लगाकर इसे लिंग के भेद के आधार से मुक्त ‘अपराध’ घोषित करने का प्रस्ताव पारित कर दिया है. यानी अब पुरूष भी बलात्कार की शिकायत दर्ज कर पाएंगे. मीडिया में ‘बलात्कारी पुरूष’ के साथ ‘बलात्कारी औरत’ जैसे शब्द भी अब सुनने को मिलेंगे. अब अगर किसी पुरूष के साथ यौन हिंसा का मामला पुलिस में दर्ज होता है तो ये कैसे तय होगा कि उक्त कृत्य स्वेच्छा से हुआ या जोर-जबरदस्ती? दरअसल, प्रस्तावित संशोधन मामले को और उलझा रही हैं.
वैसे ये सच है कि हर बार पुरूष ही दोषी नहीं होते… महिलाएं भी बलात्कार के लिए ज़िम्मेदार होती हैं. कई ऐसी महिलाएं हैं जो अपने फायदे के लिए पुरुषों पर बलात्कार का आरोप लगाने से नहीं हिचकिचातीं या संबंधित पुरुष को शारीरिक संबंध बनाने के लिए उकसाती हैं.
बिहार के पूर्णिया में बलात्कार से जुड़ा एक मामला हैरान कर देने वाला है. पूर्णिया के धमदाहा अनुमंडल में एक महिला ने एक ऐसे शख्स पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज कराया है, जिसकी काफी समय पहले मौत हो चुकी है. यह औरत पहले भी धोखाधड़ी कर चुकी है. मगर इस बार वह थोड़ा सा चूक गई और उसने मरे हुए ससुर को ही आरोपी बना दिया…
इस पूरे मामले में इस्लानी कानून लाने की ज़रूरत है, क्योंकि इस्लामी क़ानून में बलात्कार की सज़ा मौत है. हालांकि बहुत से लोग इसे निर्दयता कह कर इस दंड पर आश्चर्य प्रकट करते हैं. कहते हैं कि यह जंगलीपन है. तो उन लोगों से मेरा सवाल है कि “कोई आपकी माँ या बहन के साथ बलात्कार करता है और आपको न्यायधीश बना दिया जाये और बलात्कारी को सामने लाया जाये तो उस दोषी को आप कौन सी सज़ा सुनाएँगे?”  तो शायद आपका जवाब होगा- “उसे मृत्यु दंड दिया जाये या उसे कष्ट दे दे कर मारना चाहिए” लेकिन यही घटना किसी और कि माँ, पत्नी या बहन के साथ होती है तो आप कहते हैं मृत्युदंड देना जंगलीपन है.  इस स्थिति में यह दोहरा मापदंड क्यूँ? मैं लाल कृष्ण आडवानी जी की अन्य नीतियों और विचार से भले ही सहमत न हूँ लेकिन बलात्कार के मामले में उनके इस विचार से सहमत हूं कि बलात्कारियों को सज़ा-ए-मौत देनी चाहिए.

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