Wednesday, August 22, 2012

भारत छोड़ो आन्दोलन और संघ-सावरकर


भारत छोड़ो आन्दोलन को लेकर हिन्दू दक्षिणपंथ अक्सर ही अति आक्रामक मूड में रहता है. वैसे तो पूरे आजादी के आन्दोलन से बाहर रहे इस गिरोह की 'राष्ट्रभक्ति' दंगों के दौरान ही दिखाई देती है, लेकिन यह देख लेना मजेदार होगा कि 'भारत छोड़ो आन्दोलन' के दौरान यह क्या कर रहा था? अंग्रेजी सेना में भारतीयों की भर्ती के आह्वान के पीछे की देशभक्ति की पहचान अब ज़रूरी है. यह आलेख जाने-माने विद्वान और संस्कृतिकर्मी शम्सुल इस्लाम ने लिखा है जो मूल रूप से काउंटर करेंट्स  में प्रकाशित हुआ था. अनुवाद संतोष चौबे का है.
  
इस अगस्त हम भारत छोडो आन्दोलन तथा आजाद हिंद फौज ,जिसकी कमान १९४३ से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के हाथों में थी , दोनों की ७० वीं वर्षगाँठ मना रहे हैं . यह सच है की नेताजी के नेतृत्व में गठित आजाद हिंद फौज तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस नीत भारत छोडो आन्दोलन के बीच विचारधारा के स्तरपर गंभीर मत-वैभिन्य था , दोनों की भारत की आज़ादी के लक्ष्य हेतु दो भिन्न रणनीतियां थीं. फिर भी ,दोनों आन्दोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मील के पत्थर साबित हुए .निश्चय ही ,विदेशी शासन से मुक्ति चाहने वाले वाले लाखों भारतीयों ने इन दोनों आंदोलनों में हिस्सा लिया , इनमे से बहुतों ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लक्ष्य हेतु अपने प्राणों तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की आहूति दी .ये दोनों आन्दोलन अपने कालखंड में बड़े विक्षोभ के रूप में उभरे जिसने स्वतंत्रता संग्राम के असंख्य नायक ,स्त्री पुरुष दोनों ,दिए .यह संयोग ही है की दो महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ,मृणाल गोरे (भारत छोडो आन्दोलन के नेत्रिओं में से एक तथा महात्मा गाँधी की करीबी सहयोगी ) तथा कैप्टन लक्ष्मी सहगल (नेताजी सुभाष बोस की प्रसिद्द सहयोगी तथा आज़ाद हिंद फौज की प्रख्यात लक्ष्मी बाई रेजिमेंट की कमांडर ), का देहावसान गुजरे जुलाई माह में ही हुआ.  .


आजाद हिंद फौज के सिपाहियों द्वारा अंग्रजों के खिलाफ दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्वोत्तर भारत में , तथा भारत की आम जनता द्वारा कांग्रेस के आह्वान पर भारत छोडो आन्दोलन में किये गए शौर्यपूर्ण कृत्यों ने पूरे देश को प्रभावित किया तथा एक आम जन के लिए आज भी प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं .ये दोनों आन्दोलन इस तथ्य की गवाही देते हैं की इन दोनों आंदोलनों  में हिस्सा लेने वाले सभी स्वतंत्रता सेनानी धार्मिक ,जातीय ,भाषाई तथा क्षेत्रीय विभेदों के ऊपर उठकर एक समग्र सर्वसमावेशी भारत के स्वप्न के प्रति दृढ संकल्पित थे .इस बात की प्रबल संभावना है की यदि ये दोनों आन्दोलन सफल रहे होते तो भारत के धार्मिक आधार पर हुए विभाजन को रोका जा सकता था तथा धर्म व राष्ट्रीयता के घालमेल वाली विभाजनकारी राजनीति का बेहतर प्रत्युत्तर दिया जा सकता था .निश्चित तौर पर तब एक भिन्न प्रकृति का' भारत ' हमारे पास होता . दुर्भाग्य से इन आंदोलनों के सफल न हो सकने की भारी कीमत पूरे उपमहाद्वीप की जनता को चुकानी पडी ,सवा करोड़ लोगों को अपना घर-बार, चूल्हा-चौकी छोड़ना पड़ा और कितनी असहाय औरतों का बलात्कार हुआ,कितनों का जबरन धर्म परिवर्तन हुआ, कितनों की हत्या हुई इसका लगभग कोई विश्वसनीय रिकोर्ड नहीं .

हम में से अधिकांश इस तथ्य से अवगत हैं की तब की भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भारत छोडो आन्दोलन का विरोध कर स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उभरते जनविरोध के ज्वार के साथ विश्वासघात किया ,फिर भी , आर एस एस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) और हिन्दू महा सभा से निर्मित 'हिन्दू खेमे ' की इस प्रसंग में क्या भूमिका रही ? ,यह कुछ अज्ञात कारणों वश अब भी अस्पष्ट है .दर असल हिन्दू खेमे ने न केवल भारत छोडो और आजाद हिंद फौज केदोनों आंदोलनों का विरोध किया बल्कि इनके दमन में ब्रिटिश हुक्मरानों को अपना बहु-आयामी व बहु-विस्तारी सहयोग भी उपलब्ध करवाया .इस सन्दर्भ में पढ़े जाने योग्य व विश्वसनीय कुछ हतप्रभ कर देने वाले दस्तावेज उपलब्ध हैं .वीर सावरकर सुभाष चन्द्र बोस के विरुद्ध अँगरेज़ हुकूमत के साथ खड़े दिखाई देते हैं .

हिंदुत्व गिरोह नेताजी सुभाष बोस के ,जिन्होंने भारत से अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए एक सैन्य संगठन निर्मित करने का प्रयास किया , घोर प्रशंसक होने का ढोंग करता है . परन्तु वीर सावरकर के नेतृत्व में हिन्दू महासभा द्वारा इस अभियान के प्रति किये गए विश्वासघात को कम ही लोग जानते हैं .द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी देश की आज़ादी के लक्ष्य प्राप्ति हेतु विदेशी सहायता ,विशेषकर जापान से मदद लेकर सैन्य शक्ति द्वारा देश के पूर्वोत्तर क्षेत्रों पर आक्रमण करना चाहते थे ,वहीँ वीर सावरकर के नाम से प्रसिद्द विनायक दामोदर सावरकर ने अपने ब्रिटिश आकाओं को पूर्ण सैन्य सहायता का आश्वासन १९४१ में ही दे दिया था .भागलपुर में आयोजित हिन्दू महा सभा के २३वे सत्र को संबोधित करते हुए सावरकर ने कहा -


"जहाँ तक भारत की सुरक्षा का प्रश्न है ,हिन्दुओं को बिना हिचक थल ,वायु व नौ सेना में अधिकाधिक संख्या में भर्ती होकर हिन्दू हितों के अनुरूप , ब्रिटिश भारतीय सरकार का एक प्रतिक्रियात्मक सहयोग की भावना से प्रेरित होकर पूर्ण सहायता के लिए तत्पर रहना चाहिए ....पुनश्च यह ध्यातव्य है की युद्ध में जापान के प्रवेश ने हमें प्रत्यक्षतः और तुरंत ब्रिटेन के शत्रुओं के सम्मुख असहाय छोड़ दिया है .परिणामतः ,ये हमें पसंद हो या न हो, हमें युद्ध के झंझावातों से अपने घर बार की रक्षा हेतु स्वयं प्रयास करने होंगे और यह केवल सरकार के भारत के रक्षार्थ युद्ध -प्रयत्नों को और तेज करके ही किया जा सकता है . अतएव हिन्दू महा सभा के सदस्यों को ,विशेषकर बंगाल व असम प्रान्त में हिन्दुओं को सेना के सभी अंगों में बिना एक भी मिनट गंवाए अधिकाधिक संख्या में भर्ती होने हेतु जागरूक करने की आवश्यकता है."

द्वीतीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में जब ब्रिटिश हुकूमत सैन्य बलों की नई बटालियंस खडी करने को प्रवृत्त हुई तब वीर सावरकर के नेतृत्व में यह हिन्दू महासभा ही थी जिसने हिन्दुओं को अधिकाधिक भर्ती कर इस अभियान में जोरदार ढंग से सर्कार का सहयोग किया . हिन्दू महा सभा के मदुरा अधिवेशन में सावरकर ने संबोधित किया ,"स्वाभाविक रूप से व व्यावहारिक राजनीतिक  दृष्टि के अनुरूप ,जहाँ तक भारत भूमि की रक्षा का प्रश्न है तथा नई सैन्य टुकड़ियाँ खडी करने का प्रश्न है , हिन्दू महा सभा ने सरकार के युद्ध प्रयत्नों तथा नई सैन्य टुकडियां भर्ती करने के अभियान में सहभागिता का निर्णय लिया है "(२)

ऐसा नहीं था की इस तरह के रवैये के विरुद्ध आम जन मानस में उभरती तीव्र जनभावना से सावरकर अनभिग्य रहें हों .हिन्दू महा सभा के अंग्रेजों के सहयोग के निर्णय की लगभग किसी भी आलोचना को सहज रूप से ख़ारिज कर देते थे , उदाहरणार्थ "भारतीय जनता जिस प्रकार से राजनीतिक मूर्खता वाली इस सोच की सामान्यतः भारतीय व ब्रिटिश हित अनिवार्यतः परस्पर विरोधी हैं से ग्रस्त हो चुकी है ,की ब्रिटिश सरकार से सहयोगात्मक लगभग किसी भी पहल को आत्म-समर्पम ,राष्ट्र-विरुद्ध ,ब्रिटिश हाथों में खेलने जैसा व अनिवार्य तौर पर देशद्रोह तथा इस कारण से निंदनीय माना जाता है "(३)

जहाँ महात्मा गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने द्वितीय विश्व युद्ध को साम्राज्यवादी करार दिया और "न एक भाई ,न एक पाई "( न एक व्यक्ति सेना में भर्ती हेतु न एक पैसा सहयोग हेतु ) का नारा बुलंद किया वहीँ वीर सावरकर ने इस मत की तीव्र आलोचना इन शब्दों में की-  " यह स्मरण रखने की आवश्यकता है की सशस्त्र सैन्य आक्रमण की स्थिति में भी अहिंसा और अ-प्रतिरोध के निराशाजनक व ढोंगी झक के चलते जिन्होंने सरकार के युद्ध-प्रयत्नों में सहयोग न करने का शौक पाल रखा है अथवा जिन्होंने महज नीतिगत सिद्धांत के चलते सैन्य बलों में भर्ती होने से इनकार किया है दर असल वे अपने को धोखा दे रहे हैं तथा पर्याप्त उत्तरदायित्व से चूक रहे हैं "(४)

उनके हिन्दुओं के लिए किये आह्वान में कहीं कोई संशय नहीं था ,"इसलिए हिन्दू आगे आयें और थल सेना ,नभ सेना ,जल सेना ,तोपखाने तथा अन्य युद्ध -कला से जुड़े कारखानों में हजारों की तादाद में भर्ती हों ."(५) जो लोग वीर सावरकर को महान राष्ट्रभक्त व स्वतंत्रता सेनानी मानते हैं उनके सर शर्म से झुक जायेंगे जब वे सावरकर का सेना में भर्ती होने वाले उन हिन्दुओं को दिए गए सन्देश को पढेंगे -

"
इस सम्बन्ध में एक बिंदु जिस पर हमारे अपने हित में अत्यंत जोर दिए जाने की जरुरत है वो यह है की जो हिन्दू 'भारतीय ( इसे 'ब्रिटिश' पढ़ें ) सेना ' में सम्मिलित्त हों वे पुरी तरह वफादार व सैन्य अनुशासन व आदेश के प्रति निष्ठावान बने रहें ,उस सीमा तक जहाँ तक इस तरह के आदेश 'हिन्दू सम्मान' को जानबूझकर ठेस पहुचानेवाले न हों "(६)


आश्चर्यजनक रूप से सावरकर को यह नहीं अनुभव हुआ की किसी भी आत्म सम्मान वाले तथा राष्ट्रभक्त हिन्दू के लिए अपने औपनिवेशिक स्वामियों के सैन्य बल में सम्मिलित होना स्वयं में घोर अपमानजनक था. ब्रिटिश सैन्य बल में भर्ती होने की इच्छा रखने वाले हिन्दुओं की सहायता हेतु सावरकर के नेतृत्व में हिन्दू महासभा ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में उच्च स्तरीय 'युद्ध-परिषदों ' का गठन किया(७).इसके अतिरिक्त वायसराय ने सावरकर की पसंद के व्यक्तियों को 'राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद्' में स्थान दिया जिसके लिए सावरकर ने वायसराय तथा ब्रिटिश सेना के कमांडर-इन-चीफ को इस टेलीग्राम के जरिये कृतज्ञता ज्ञापित किया "योर एक्सीलेंसी की सुरक्षा समिति के कार्मिकों सम्बन्धी घोषणा का स्वागत है ,हिन्दू महा सभा सर्वश्री कलिकार तथा जमनादास मेहता की नियुक्ति पर गहरा संतोष व्यक्त करती है "(८)

वीर सावरकर ने ब्रिटिश तथा मुस्लिम लीग का सहयोग कर भारत छोडो आन्दोलन से विश्वासघाट किया .८ अगस्त १९४२ को किये गए 'भारत छोडो ' के आह्वान के अलोक में ब्रिटिश हुकमरानों ने कई प्रान्तों की कांग्रेस सरकारों को बर्खास्त कर दिया .ब्रिटिश शासकों ने आम तौर पर राज्य के आतंक व दमनचक्र का सूत्रपात कर दिया .जबकि कांग्रेस के काडर व सामान्य जनता का अधिकांश हिस्सा औपनिवेशिक शासन के घोर दमन का सामना कर रहे थे तथा राज्य की संस्थाओ के बहिष्कार का निर्णय किये थे ,वहीँ हिन्दू महा सभा ब्रिटिश शासकों का साथ दे रही थी . कानपूर में आयोजित हिन्दुमाहा सभा के २४वे अधिवेशन को संबोधित करते हुए सावरकर ने औपनिवेशिक सत्ता के साथ सहयोग की अपनी नीति को इन शब्दों में परिभाषित किया -

"हिन्दू महासभा 'प्रतिक्रियावादी सहयोग' को व्यावहारिक राजनीति का अग्रणी सिद्धांत स्वीकार करती है ,फलतः यह विश्वास करती है की जो भी हिन्दू संगठन वादी पार्षद ,मंत्री ,विधायक ,या किसी सार्वजनिक अथवा निगम निकाय संचालक हैं तथा गैर-हिन्दू वर्गों के वैध हितों को निश्चित रूप से बिना क्षति पहुंचाए यदि हिन्दुओ के वैध हितों के रक्षण तथा संवर्धन हेतु अपने शक्तियों का उपयोग करते हैं ,वे निश्चित रूप से देश को महती सेवा अर्पित कर रहे हैं.जिन सीमाओं में वे कार्य करते हैं उनको ध्यान में रखते हुए महासभा ये अपेक्षा करती है की दी हुई परिस्थितियों में जो भी अच्छा कार्य वे कर सकते हैं करें और ऐसा करने में यदि वे असफल नहीं होते तो महासभा उनके अच्छे कार्य सम्पादन हेतु उनके प्रति कृतग्य होगी . सीमायें क्रमशः स्वयं चरणवार ढंग से सीमित होतीं जायेंगीं और अंततः पुरी तरह लुप्त हो जाएँगी .प्रतिक्रियावादी सहयोग की निति जो बिना शर्त सहयोग से लेकर सक्रिय व यहाँ तक की सशस्त्र प्रतिरोध तक की देशभक्ति परक गतिविधियों को स्वयं में समेटे हुए है ,समयकी मांग , उपलब्ध संसाधन व राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा के अनुरूप अपेक्षित ढंग से संशोधित होती रहेगी ."(९)


वीर सावरकर के नेतृत्व में हिंदू महा सभा ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर १९४२ में गठबंधन सरकारें भी चलाईं.

यह बहुत कम लोगों को पता होगा कि जब कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के साथ किसी भी तरह के सम्बन्ध का निषेध किया था उसी समय हिन्दु महासभा ने मुस्लिम लीग से मिलकर सिंध व बंगाल में गठबंधन सरकारें चलाईं थीं .सावरकर ने इस ‘अनैतिक गठजोड़’ को १९४२ में कानपूर में संपन्न २४वे सत्र को संबोधित करते हुए निम्नलिखित शब्दों में जायज ठहराया था ,”महासभा भालिभाती अवगत है कि व्यावहारिक राजनीति में हमें आगे बढ़ने हेतु किंचित समझौते भी करने होंगे .उदहारण के तौर पर सिंढ  में आमंत्रण मिलने पर महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर  गठबंधन सरकार चलाई .बंगाल का मामला सर्व-विदित है .वही उशृंखल लीगी जो कांग्रेस के दब्बूपने भरे आचरण के बावजूद शांत नहीं हो सके ,ज्यों ही हिन्दुमहसभा के संपर्क में आये पर्याप्त समझौतावादी तथा सामाजिक रूप से मिलनसार आचरण पर उतर आये और श्री फज़ल उल हक के मुख्यमंत्रित्व तथा हमारे श्रद्धेय नेता श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में दोनों समुदायों के भले के लिए गठबंधन सरकार एक साल से अधिक समय तक चली “(१० )

आर एस एस की भूमिका

हिंदुत्व का एक अन्य ध्वज-वाहक आर एस एस भी भारत छोडो आन्दोलन और आजाद हिंद फौज के प्रति अपने रवैये में हिन्दुमाहसभा से भिन्न नहीं था . इसने १९४० में अपने अभिभावक सावरकर द्वारा चलाई गई  ब्रिटिश सेना में भरती की मुहीम का खुला समर्थन किया .इसने सावरकर के साथ सभाएं आयोजित कीं जिसमे मुख्य वक्ता आम तौर पर हिंदू युवाओं को अंग्रेजी सेना में भरती होने की अपील करता था .भारत छोडो आन्दोलन के विषय में आर एस एस के दृष्टिकोण को इसके दूसरे प्रमुख व अब तक के सबसे महत्वपूर्ण विचारक एम् एस गोलवरकर के इस वक्तव्य से समझा जा सकता है . असहयोग आन्दोलन तथा भारत छोडो आन्दोलन के परिणामों के विषय में उन्होंने कहा ,” निश्चित रूप से संघर्ष के बुरे परिणाम होने ही हैं .१९२० के असहयोग आन्दोलन के पश्चात लड़के (युवा) उत्पाती हो गए .यह कथन किसी नेता पर कीचड उछालने के उद्देश्य से नहीं है ,इस प्रकार के परिणाम संघर्ष के फलस्वरूप अपरिहार्य हैं .मूल बात यह है कि हम परिणामों को उचित ढंग से नियंत्रित नहीं कर सकते .१९४२ के बाद लोगों के मन में ये धारणा घर करने लगी कि कानून (पालन )के विषय में सोचना आवश्यक नहीं है .” (११)

इस प्रकार से हिंदुत्व के पैगम्बर भारतीयों से अमानवीय ब्रिटिश सत्ता के आतताई व दमनकारी कानूनों के प्रति आदर के भाव की अपेक्षा रखते थे .उन्होंने यह स्वीकारा कि भारत छोडो अन्दोलान के प्रति इस प्रकार का नकारात्मक दृष्टिकोण आर एस एस काडर में भी अच्छे रूप में नहीं लिया जाता था .

१९४२ में बहुतों के मन में प्रबल भावनाएं थीं .उस समय भी संघ का दैनंदिन कार्यक्रम चलता रहा .संघ ने प्रत्यक्ष रूप से कुछ भी न करने का संकल्प लिया था .फिर भी स्वयंसेवकों के मन में उथलपुथल मचा हुआ  था .संघ निष्क्रिय लोगों का संगठन है और इनकी बातें अनुपयोगी होतीं हैं‘...केवल बाहरी ही नहीं वरन स्वयं स्वयंसेवकों ने भी ऐसा सोचना आरंभ कर दिया था .वे (स्वयंसेवक) अत्यंत कुंठित भी अनुभव कर रहें थे “(१२)

गोलवरकर का ‘संघ के दैनंदिन कार्यक्रम’ से क्या आशय था यह जानना काफी दिलचस्प होगा .इसका निश्चित अर्थ था हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बढ़ती खाई को और बढ़ाने में अतिरिक्त प्रयास करना ,और इस प्रकार से ब्रिटिश सत्ता तथा मुस्लिम लीग के रणनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक बनना .

आजाद हिंद फौज तथा भारत छोडो आन्दोलन की विफलता भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए दुर्भाग्यपूर्ण था . इसके लिए निस्संदेह अँगरेज़ उत्तरदायी थे परन्तु कुछ और भी थे जो इसके लिए उत्तरदायी थे और उनका बेनकाब होना बेहद जरूरी है .

अनुवादक 
संतोष चौबे
जन्म: १९७४ शिक्षा:भौतिकी में उपाधि (मास्टर डिग्री ) पूर्वांचल विश्वविद्या, १९९५ से भारतीय जीवन बीमा निगम में कार्यरत:. विकास अधिकारीभारतीय जीवन बीमा निगम ,शाखा कार्यालय -२आफिसर्स कालोनीआजमगढ़ (उ.प्र.) संपर्क:९४१५८३५५१८


यह उनका पहला ही अनुवाद है.


सन्दर्भ :
  (1) Cited in VD Savarkar, Samagra Savarkar Waangmaya: HinduRashtra Darshan , vol. 6, Maharashtra Prantik Hindu Sabha, Poona,1963, p. 460.

    (2) Ibid. p. 428.

    (3) Ibid. pp. 428-29.

    (4) A. S. Bhide (ed.), Vinayak Damodar Savarkar's WhirlwindPropaganda: Extracts from the President's Diary of his PropagandistTours Interviews from December 1937 to October 1941 , na, Bombay,1940, p. xxiv.

    (5) Ibid. p. xxvi.

    (6) Ibid. p. xxviii.

    (7) Ibid. p. xxvii.

    (8) Ibid. p. 451.

    (9) Cited in VD Savarkar, Samagra Savarkar Waangmaya: HinduRashtra Darshan , vol. 6, Maharashtra Prantik Hindu Sabha, Poona,1963, p. 474.

    (10) Samagra Savarkar Wangmaya , vol. 6, op. cited, pp. 479-480.Hindu Mahasabha joined a coalition government with Muslim League inNWFP also.

    (11) MS Golwalkar, Shri Guruji Samagra Darshan, (collected worksof Golwalkar in Hindi) vol. IV, Bhartiya Vichar Sadhna, Nagpur, nd, p.41.

    (12) Ibid, p. 40.

1 comment:

  1. Tauba karen musalmaan to Allah Kafi hai unki Hifazat ke liye .

    Please see -
    के. सी. सुदर्शन चल दिए मस्जिद
    http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BUNIYAD/entry/%E0%A4%95-%E0%A4%B8-%E0%A4%B8-%E0%A4%A6%E0%A4%B0-%E0%A4%B6%E0%A4%A8-%E0%A4%9A%E0%A4%B2-%E0%A4%A6-%E0%A4%8F-%E0%A4%AE%E0%A4%B8-%E0%A4%9C-%E0%A4%A6

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