Wednesday, September 05, 2012

5 सितंबर, 2012 एन.जी.ओ. का आगाज़


आज का दिन कई वजहों से मेरी लिए अहम है आज यानी 5 सितंबर को मेरी वालिदा मोहतरमा की बरसी है। मेरी बड़ी बेटी सबा अज़ीज़ का जन्म दिन है, टीचर्स डे है और आज के दिन को आप अपनी एन.जी.ओ. का फ़ाउंडेशन डे भी समझ सकते हैं। अभी तक 103 फेसबुक फ़्रैंडज़ ने इस एनजीओ से अपने कमेन्स्ओ के ज़रीए जुड़ने की दिलचस्पी ज़ाहिर की है 22 लोगों ने मेरी ई मेल आई डी पर अपना प्रोफ़ाइल भेज कर और लेटर लिख कर अपनी वाबस्तगी का इज़हार किया है, मैं इन सबका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ये सब इस एनजीओ के फ़ाउन्डर मेंबर हैं जल्द ही मैं इस ताल्लुक़ से सभी के नाम लेटर जारी कर दूंगा इस वक़्त मेरी पास कोई स्टाफ़ नहीं है इसलिए वक़्त लग रहा है आप ही में से कुछ लोग सामने आयेंगे और ऑनलाइन ये ज़िम्मेदारी संभालेंगे।
एन.जी.ओ. रजिस्ट्रेशन के पेपर्स मेरी सामने हैं जल्द ही एक नाम तय करके रजिस्ट्रेशन के लिए भेज दूंगा। लेकिन काम आप के दिलचस्पी लेने के साथ ही शुरू हो चुका है जो लोग इस एनजीओ से जुड़ना चाहते हों उनके नाम आप सबके सामने रख दे रहा हूँ। फ़ाउन्डर मेम्बर्स और आज से 15 सितंबर तक जुड़ने वालों को हक़ होगा कि इन नामों पर अपनी राय का इज़हार करें। 11सितंबर को मैं रजिस्ट्रेशन पेपर्स तैय्यार कर मुताल्लिक़ अफ़राद की मंज़ूरी के लिए भेज दूंगा और उम्मीद है अगले जुमा यानी 15 सितंबर तक ये पेपर्स दाख़िल कर दिए जाऐंगे। क़ौमी सतह पर एन.जी.ओ. का क़याम करने के लिए कम से कम 8 रियासतों की नुमाइंदगी ज़रूरी होती है। मैं अभी हिंदुस्तान की 10 रियासतों से चंद नाम आपके सामने रख रहा हूँ, इन्शाअल्लाह जल्द ही 10 से ज़्यादा मुल्कों के नुमाइंदे आप के साथ होंगे। अभी तक किसी से बात नहीं की है पर सबको जानता हूँ उनकी क़ाबिलियत का इल्म है, पर डैमोक्रेटिक सिस्टम के साथ चलना चाहता हूँ। मेरे सामने जो नाम हैं—
1- एस.वाई. क़ुरैशी (दिल्ली) साबिक़ इलेक्शन कमिश्नर आफ़ इंडिया।
2- माजिद मेमन (मुंबई) हिंदुस्तान के मशहूर वकील। 
3- पी. ए. इनामदार (पुणे) एजूकेशन एक्सपर्ट।
4-
5- रहमान शरीफ़ (बंग्लुरू) जनाब सी. के. जाफ़र शरीफ़ के पोते (यूथ विंग)।
6- शाइस्ता अम्बर (लखनऊ) प्रेसीडेन्ट मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड (वीमन)। 
7- एम. आदिल (हैदराबाद) प्रोड्यूसर प्रज़ेंटर टीवी शो हम बदलेंगे देश बदलेगा। 
8- उजाला आयत (श्रीनगर) यूथ विंग। 
9- आफ़ताब अह॒मद एम.एल.ए. (मेवात)। 
10- अख़तरुल ईमान एम.एल.ए. ( किशनगंज, बिहार)। 
11- मौलाना मुफ़्ती महफ़ूज़ुर्रहमान, (अररिया, बिहार)। 
12- मौलाना इसरारुल हक़ क़ासिमी एम.पी. (किशनगंज, बिहार)। 
13- मौलाना ग़ुलाम मोहम्मद वस्तानवी (अक्क्लकुँआं, गुजरात)। 
14- मौलाना बरकाती साहब (कोलकाता)।
15- डाक्टर नूर मोहम्मद (रामपुर, यू.पी.) यूथ विंग। 
16- हफीज़ुर्रहमान (मुरादाबाद, यू.पी.) यूथ विंग। 
17- बिलाल बर्नी ऐडवोकेट (यूथ विंग)। 
18- प्रोफ़ेसर अख़॒तर मेहंदी (जे.एन.यू.)। 
19- अल्हाज जी.एम. मुस्तफ़ा, सदर नेशनल माइनारीटीज़ फ्रंट (मेरठ, यू.पी.)।  
20- हाफ़िज़ आफ़ताब (मुज़फ़्फ़र नगर, यू.पी.)।
21-
22- फ़िरोज़ बख़्त अह॒मद (दिल्ली) मौलाना आज़ाद के पोते। 
23- मिस मुमताज़ (मेवात) यूथ विंग। 
24- एस.यू. ख़ान (क़ौमी अक़ल्लियती कमीशन)।
25- वसी अह॒मद नोमानी, ऐडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट।

इन के अलावा कुछ दीगर मुमालिक की नुमाइंदगी भी होगी। हमारे जो फ़ाउन्डर मेंम्बर हैं उनसे दरख़्वास्त है कि इसी तरह अपने दायरे से कल 25 नुमाइंदा अफ़राद का इंतिख़ाब करें। 14 का ताल्लुक़ दुनिया के किसी भी शहर की नुमाइंदगी से हो पर 11 नुमाइंदे आप के शहर से हों, जो ज़िला कमेटी को बनायें.............


तास्सुरात आने लगे हैं, हौसला अफ़्ज़ा आग़ाज़ हैं, कुछ हौसला शिकन लहजा भी सामने आ रहा है। कोई हैरानी नहीं, अक्सर बड़े इरादों की नाकामी के पीछे वजूहात ये भी होती हैं कि किस तरह इरादों को कमज़ोर किया जाय। किस किस तरह के इल्ज़ामात लगाए जाएं। लिहाज़ा, मैं शुरूआत तमाम इल्ज़ामात को क़ुबूल करने के बाद करने जा रहा हूँ। मैं क़ौम के लिए जो कुछ कर सकता था अपनी 25 बरस की सहाफ़त के दौरान कर चुका अब जो कुछ कर रहा हूँ ज़ाती मफ़ादात के लिए, अपने वजूद को ख़त्म होने से बचाने के लिए। लोग मुझे जीते जी नजर अंदाज़ ना कर दें, लिहाज़ा, उनके ज़हनों में बने रहने के लिए एन.जी.ओ. के नाम पर जिस जिस तरह के जितने भी मफ़ादात हासिल हो सकते हैं, उन्हें हासिल करने के लिए अगर इस बहाने सियासत में कोई जगह बन सकती है तो वो बनाने के लिए लोक सभा, राज्य सभा या कोई भी सरकारी तमग़ा हासिल हो सकता है, तो उसे हासिल करने के लिए, बाक़ी जो मुम्किन इल्ज़ामात मैं भूल गया हूँ उन्हें भी शामिल कर लें इस सबके बावजूद भी मेरे ज़ाती मफ़ादात को ज़हन में रख कर जो मेरे साथ जुड़ सकते हैं उनका ख़ैर मक़दम है । इस एन.जी.ओ. के ज़रीए अपने अख़बार से कहीं ज़्यादा उन सियासतदानों के नाक में दम करने का इरादा रखता हूँ जो पिछले 65 बरस से हमें सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं, बेगुनाहों को जेल की सलाखों के पीछे भेजते रहे हैं ताकि हमारे हौसले टूटे रहें। हम एहसासे कमतरी, एहसासे जुर्म का शिकार रहें। कश्मीरियों को दहशतगर्द साबित कर दिया जाय ताकि हम उनकी हिमायत में खड़े होने से घबराएं। मुसलमानों के लिए इंसाफ़ की आवाज़ उठाने वालों को ख़ामोश कर दिया जाय या सफ़ए हस्ती से मिटा दिया जाय, मैं इन साज़िशों को नाकाम बनाने के लिए एक मज़बूत प्लेटफार्म बनाना चाहता हूँ, जो ये एन.जी.ओ. हो सकता है क्योंकि उसकी आड़ में मैं अपना सियासी मक़सद हासिल करना चाहता हूँ, नेता बनना चाहता हूँ। क्या करूं कहीं से आज तक नेता बनने का लाईसेंस मिला ही नहीं तो एन.जी.ओ के बहाने ही सही। छोटे छोटे अख़बारों के एडीटर राज्य सभा में चले गए। मैं हिंदुस्तान के सबसे बड़े अख़बार का एडीटर हो कर भी... , किसी ने इस लायक़ नहीं समझा, इसलिए अब आख़िरी रास्ता अपना रहा हूँ। ये सब जान कर भी अगर आप मेरी साथ खड़े होने का इरादा रखते हैं तो आप का ख़ैर मक़दम है। मेरी क़लम और तक़ारीर ने जिन लोगों की नींदें उड़ा दी थीं वो अब फिर से पेश बंदी कर लें। मुख़ालिफ़ों की फ़ौज खड़ी कर लें। मेरी पास बस दर्से क़ुरान, सीरते रसूल और इस एन.जी.ओ से जुड़ने वाले चंद साथी हैं मगर बहुत काफ़ी हैं। तमाम साज़िशों को नाकाम बनाने के लिए और कामयाबियों की मंज़िलें तय करने के लिए शायद फिर कोई तारीख़ बन जाय। उर्दू सहाफ़त में एक तारीख़ रक़म करने के बाद क़ौम के दामन से दहशतगर्दी का दाग़ मिटाने के बाद दुआ करें अल्लाह कामयाब करे........ मेरा नया ई-मेल आई.डी. है azizburneyngo@gmail.com बराये करम एन.जी.ओ. के ताल्लुक़ से अपने मश्विरे और प्रोफ़ाइल इस पर भेजें।


तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ अपने उन तमाम फेसबुक फ़्रैंडज़ का जो एन.जी.ओ. के वजूद में आने से क़ब्ल ही बड़ी तादाद में इसमें दिलचस्पी ले रहे हैं। जो लोग फेसबुक पर नहीं हैं उनके भी फ़ोन काल और ई-मेल मिल रहे हैं। कुछ लोगों के नाम मैं उनसे राबिता किए बगै़र सामने रख रहा हूँ इसलिए कि वो क़ौम का सरमाया हैं अगर वो सब वाक़ई साथ आ गए तो बिलाशुबा एक नई तारीख़ रक़म होगी लेकिन पहले 2 बातों पर रौशनी डाल दूँ। नंबर एक इस एन.जी.ओ. का मक़सद 1- सोशल जस्टिस 2- कश्मीर हमारा है और कश्मीरी हमारे हैं। सोशल जस्टिस फ़ार इनोसेंट कश्मीरी पीपल (Social Justice For Innocent Kashmiri People) 3- एजूकेशन 4- पोलीटिकल पावर फ़ार मुस्लिम्स (Political Power For Muslims) होगा।
अब अपने बारे में
मैं इस एनजीओ का 1 साल के लिए ऐक्टिंग चेयरमैन और कोआर्डीनेटर रहना चाहूंगा। इसके बद तंज़ीम से अलग हो जाऊंगा। तमाम मेंबर चाहें तो फ़ाउन्डर के तौर पर मेरा नाम तंज़ीम के साथ रख सकते हैं। जिस दिन रजिस्ट्रेशन के बाद एन.जी.ओ. का नाम और अग़राज़ो मक़ासिद जारी करूंगा उसी दिन अपने एसेट डेक्लेरेशन (Asset Declearation) और सोर्स आफ़ इनकम (Source Of Income) भी सब के सामने रख दूंगा और 1 साल बद अलग होने के वक़्त के असेट सब के सामने रख दूंगा। मेरी ख़्वाहिश होगी कि नई नसल अहम ज़िम्मादारियां सँभाले और वो तमाम शख्सियतें जो क़ौम का सरमाया हैं अपने अपने क़ीमती मश्विरों से नवाज़ें। अपने तजुर्नबों की रोशनी में इस तंज़ीम को चलायें। नई नस्ल की रहनुमाई करें। 1 साल की बंदिश सिर्फ मेरी लिए होगी बाक़ी किसी के लिए नहीं।
कल की तहरीर में कुछ और अहम नाम लिखने जा रहा हूँ। फिर फ़र्दन फ़र्दन राबिता भी क़ायम करूंगा। जो रजामंदी देंगे उन के नाम ही रजिस्ट्रेशन पेपर्स में शामिल होंगे। मैं आने वाले 20 साल के लिए क़ौम की क़यादत तैय्यार करना चाहता हूँ और इसके लिए क़ौम के रहनुमाओं की रहनुमाई चाहता हूँ। मैं जल्द ही सफ़र पर निकलना चाहता हूँ। मैं जिस वक़्त अपने अख़बार में लिख रहा था 26 लाख से ज़्यादा लोग तक़रीबन हर रोज़ मुझे पढ़ते थे और 1 बरस के अंदर 1 करोड़ से ज़्यादा लोगों से सीधे उन के सामने पहुंच कर ख़िताब किया था। आज़ाद भारत का इतिहास लिख रहा था, लिख रहा हूँ और आख़िरी सांस तक लिखता रहूँगा। तंज़ीम की शुरूआत कर कश्मीर से कन्याकुमारी तक सफ़र करना चाहता हूँ। रास्ते भर की मसाजिद में नमाज़ पढ़ना चाहता हूँ, नमाज़ियों और इमाम साहिबान से बात करना चाहता हूँ। मदारिस में तलबा से गुफ़्तगु करना चाहता हूँ। गर्ल्स स्कूल और कॉलिजों में ख़िताब करना चाहता हूँ, ताकि वो आने वाली नस्लों को ऐसी तर्बीयत दें कि इनमें अपना हक़ हासिल करने का हौसला पैदा हो। अपने हालात पर आँसू बहाने या रहम की भीख मांगने की आदत ना पड़े।
और एक बात इस तंज़ीम के नुमाइंदों को सबसे पहले मुसलमानों के वोट पर सियासत करने वालों से जवाब तलब करना है। चाहे वो किसी पार्टी के क्यों ना हों। अगर आप ज़हनी तौर पर इसके लिए तैय्यार हैं तो साथ आएं, हम उनसे अपने वोट के क़र्ज़ की अदायगी के साथ अपने काम की शुरूआत चाहते हैं। क़ौम को दरपेश मसाइल की फ़ेहरिस्त हमारे हाथ में होगी, उन की पेशरफ़्त क्या रही इस का जवाब उन के पास होगा। जवाब तसल्ली बख़्श मिला तो सर आँखों पर, चाहे जिस पार्टी में हों, ना मिला तो अब तक जो क़ौम इक़्तेदार सौंपती आई है अब इक़्तेदार छीनने के लिए क़दम उठाएगी।
हमारे लिए ये जंगे आज़ादी की जंग से कम नहीं होगी, हम ने मुल़्क की आज़ादी के लिए क़ुर्बानियां इस लिए नहीं दी थीं कि हम मुल्क को आज़ाद करायें और ख़ुद ग़ुलाम हो जाएं। मेरी बात बहुत वाज़ेह है। जोशो जज़्बात में साथ खड़े होने का फ़ैसला ना करें। एक नई तारीख़ रक़म करने का इरादा हो, मज़लूम क़ौम को इंसाफ़ दिलाना हो तो आगे आएं, हक़ की इस जंग में सामने कौन होगा पता नहीं, लेकिन इतना पता है कि अगर हम क़ौम को मुत्तहिद करने और जगाने में कामयाब हो गए तो एक नया इन्क़लाब बरपा होगा और इस इन्क़लाब में हमारे साथ होंगे इंसाफ़ पसंद हिन्दू भाई। हमें शिकवा उनसे नहीं, ना इंसाफ़ी करने वाली सियासत से है।
अगर आप मेरी राय से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं तो जान लें कि मैं इस वक़्त अपनी क़ौम के दरमियान महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, चन्द्रशेखर आज़ाद और शहीद भगत सिंह और झांसी की रानी, मैदान कर्बला की ज़ैनब तलाश कर रहा हूँ, अगर आप में ये जज़्बा हो तो प्लीज़ ज्वाइन मी (Please Join Me)...................


एन.जी.ओ. का कन्सेप्ट अभी प्रोसेस में है। कई बातें ज़ेरे ग़ौर हैं कुछ सवाल उठ रहे हैं कुछ और उठेंगे इसीलिए तो ओपन प्लेटफार्म पर आकर बात कर रहा हूँ, एक सवाल ये सामने आ रहा है कि मैं 1 साल बाद क्यों हट जाना चाहता हूँ। जवाब हाज़िर है मैं आने वाले 20-25 साल के लिए क़यादत सामने लाने की कोशिश कर रहा हूँ। पुराने चेहरे अपनी ज़िंदगी में बहुत हासिल कर चुके। अब नए लोगों को आगे लाने का वक़्त आ गया है। एक नई और मज़बूत टीम खड़ी करनी है। मुसलमानों में एक थिंक टैंक की कमी है। काबिल लोगों की कमी नहीं बस एक प्लेटफार्म पर आ जाएं तो कमाल हो जाय। सब बड़ों में कोई किसी की क़यादत क्यों तस्लीम करे। मैं किसी को इस कश्मकश में नहीं डालना चाहता, इसलिए एक नई अंजान टीम को रखना चाहता हूँ। जिसे तमाम क़ाबिल लोग मिल कर ग्रूम (Groom) करें जो हमारी अहम तंज़ीमें हैं वो अपनी सरपरस्ती फ़राहम करें, क़ौम को मुत्तहिद करें, एक रोड मैप सामने रखना चाहता हूँ । क़ौम को एक ऐसी सियासी ताक़त के तौर पर देखना चाहता हूँ जो अपने मसाइल को हल कर सके, दूसरों के सामने हक़ीर बन कर ना खड़े हों। बड़े लोगों के साथ बड़ी मस्लेहत होती है। नौजवान ऐसी मस्लेहत से दूर होते हैं इसलिए मैं उन्हें एक बढ़ी फ़ोर्स की शक्ल में देख रहा हूँ, वैसे भी हम लोग तो अपनी ज़िंदगी जी चुके, अब तो नई नस्ल का मुस्तक़बिल संवारना है.................

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