Monday, September 10, 2012

कुछ अपनी ज़िंदगी



एनजीओ पर काम कर रहा था आगे भी जारी रहेगा पर आज के चंद अल्फ़ाज़ अपने लिए.............
दुख, तकलीफ़, धोखा, फ़रेब, हसद, जलन ये सब ज़िंदगी का हिस्सा हैं। ये सब भी चलता है, फिर भी ज़िंदगी चलती रहती है, हाँ रफ़्तार मुतास्सिर होती है। कभी कभी इरादे भी मुतास्सिर होते हैं। मुझे ये सौगातें पैदाइश के बाद से ही मिलती रही हैं और ये सिलसिला आज भी जारी है। गुज़श्ता 3 रोज़ कुछ ऐसे ही हालात में गुज़रे, ना कुछ लिख सका, ना एनजीओ का काम आगे बढ़ सका, ना अपनी ज़िंदगी जी सका। फिर याद आया वो दिन जब आज से 20 बरस क़ब्ल मैं अपने दफ़्तर सहारा इंडिया काम्प्लेक्स से शाम को अपना कम ख़त्म कर निकल रहा था। गेट से बाहर निकलते ही मेरा एक्सीडेंट हुआ। बेहोशी की हालत में मुझे अस्पताल ले जाया गया, मालूम हुआ एक हाथ टूट गया है। रॉड डाली गई। पलास्टर चढ़ाया गया। तक़रीबन 24 घंटे होश नहीं आया फिर जब होश आया तो तमाम वाक़ेआत एक फ़िल्म की तरह मेरी आँखों के सामने घूमने लगे। ये वेल प्लान्ड एक्सीडेंट था। जब क्रीम कलर की जीप 8426 मुझे दी गई। हाई वे पर पहुंच कर मालूम हुआ कि इसके ब्रेक फ़ेल हैं। ड्राईव मैं ख़ुद कर रहा था। उन दिनों मयूर विहार के सामने वाला हाई वे बन रहा था लिहाज़ा पत्थरों पर चढ़ा कर गाड़ी रोकी और जान बच गई। वो भी वेल प्लान्ड था। बुरा हाल, जब होश आया और मैंने देखा दाहिने हाथ पर उंगलियों से कुहनी तक पलास्टर है, तो रात भर बाएं हाथ से लिखने की मश्क़ करता रहा और अगली सुबह दफ़्तर में था। एक्सीडेंट प्लान्ड करने वाले ने मुझे देख कर कहा हम तो तुम्हें देखने आ रहे थे कि इस हालत में दफ़्तर। मेरा जवाब था सिर्फ एक हाथ टूटा है, बाक़ी सब ठीक है। इरादे अभी नहीं टूटे हैं। काम कर सकता हूँ। तफ़सील लंबी है ऐसे बहुत से वाक़ेआत हैं जिन्हें अपनी ज़िंदगी की दास्तां में लिख रहा हूँ। इन हादसात के बाद फ़र्क़ बस इतना है कि हादसात की नौईयत बदल गई है। एक्सीडेंट अब भी होते हैं मगर जिस्मानी नुक़्सान के लिए नहीं ज़हनी नुक़्सान के लिए। बहरहाल इन अज़ीयतनाक हालत से गुज़रने पर भी ज़िंदा रहना होता है, काम करना होता है। ख़ुशी मिले ना मिले, दुख का दामन थाम कर भी आगे बढ़ना होता है, लिहाज़ा तमाम नाख़ुशगवार हालात के बाद भी कल फिर निकला, ज़िंदगी के सफ़र पर, दिन की शुरूआत करनी थी। सुबह 10 बजे मुस्लिम मुत्तहेदा महाज़ के प्रोग्राम से मुज़फ़्फ़र नगर पहुंच कर जिसके आर्गेनाईज़र हाफ़िज़ आफ़ताब साहिब मुझे बहुत अज़ीज़ हैं, मगर अफ़सोस ज़हनी कैफ़ीयत ऐसी नहीं थी कि जा पाता, बोल पाता, हालाँकि मुस्लिम रिज़र्वेशन का इश्यू ऐसा था, जिस पर मुझे बोलना चाहिए था, मगर ज़हनी एक्सीडेंट के असर से बाहर आने में कुछ वक़्त लग रहा था, फिर सँभाला ख़ुद को और शाम पाँच बजे जमाते इस्लामी हिंद के कैंपस में मुनाक़िद किशनगंज एऐमयू सेंटर के इजलास में पहुंचा और अपने ख़यालात का इज़हार किया और चल दिया डिफ़ेंस कॉलोनी की तरफ़ जहां तेहरान टीवी के लाइव प्रोग्राम अंदाज़े जहां में हिंदुस्तान पाकिस्तान के वज़ीरे ख़ारजा की मुलाक़ात के मौज़ू पर डिस्कशन में हिस्सा लेना था जिस में कश्मीर से यासीन मलिक और पाकिस्तान से सीनियर जर्नलिस्ट अबरार ज़ैदी भी थे। 45 मिनट के लाइव डिस्कशन की तफ़सील बयान करना यहां मुम्किन नहीं मगर दो बातें ज़रूर लिखना चाहता हूँ एक वो जो मैंने यासीन मलिक को मुख़ातिब करके कही कि कश्मीर से मैं आप से कम मुहब्बत नहीं करता फ़र्क़ बस इतना है आप ने कश्मीर की लड़ाई बंदूक़ के ज़रिए लड़ी है और मैंने क़लम के ज़रिए । दूसरी बात मैंने पाकिस्तानी जर्नलिस्ट अब॒रार ज़ैदी को मुख़ातिब कर के कही कि तारीख़ी पसे मंज़र पर नज़र डाल कर देखें तो कश्मीरियों ने पाकिस्तान को उसी वक़्त रीजेक्ट कर दिया था जब पाकिस्तान की तरफ़ से कबायलियों ने कश्मीर पर हमला किया इस के बाद 9/11 के इश्यू पर तहरान टीवी के लिए मेरा एक इंटरव्यू रिकार्ड किया गया। समाजी ज़िंदगी के लिहाज़ से मेरे दिन का सफ़र बस यहीं तमाम होता था लेकिन ज़ाती ज़िंदगी का सफ़र अभी बाक़ी था कुछ दुश्वार मराहिल से गुज़रना अभी बाक़ी था। ये मंज़िल भी ख़ुदा ख़ुदा कर के तय हुई उम्मीद थीं कि सोने से पहले चंद लमहात ख़ुशी के भी होंगे मगर ऐसा हो ना सका, जाने दीजिए इस ज़िंदगी की दास्तान को, बस इतना ज़हन में रखिए कि जिस मक़सद को हासिल करने के लिए आप को साथ लेकर निकला हूँ इस में हज़ार तूफ़ान आयेंगे, कई बार लगेगा कि बाज़ू टूट गए हैं मगर इरादों को, हौसले को टूटने नहीं देना है। माज़ी का एक वाक़िया बस इस लिए तहरीर कर दिया कि अगर फिर किसी हादसे से गुज़रना पढ़े तो भी नज़र मंज़िल पर रहे..........

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