Monday, October 01, 2012

तीन किताबों ने न जाने कितने आतंकवादी बना दिए?



प्रांत दर प्रांत और शहर दर शहर, पुलिस बेकसूरों को भी आतंकवादी बता कर सजा कटवाती रही. एक में तो कईयों को छ: साल सजा कटवा चुकने के बाद पता चला कि गुनाह तो किन्हीं और ने ही किया था ! हिंदुस्तान में लोगों को आतंकवादी साबित करने पे तुली पुलिस का एक सच ये भी है.

अप्रैल, 2006. मध्यप्रदेश में खंडवा तनावग्रस्त था. ईद से पहले कुछ घटनाएं घटी थीं. पुलिस ने अब्दुल हफीज़ कुरैशी की दो बेटियों बीस साल की आसिया और तेईस साल की रफिया को पकड़ा. सबूत के तौर पर उसने उन दोनों से 2004 में हिंदी में छपी पत्रिका, तहरीके मिल्लत की तीन प्रतियां ज़ब्त कीं. इस पत्रिका को भेजी पांच सौ रूपये की राशि की एक रसीद भी. दोनों को आतंकवादी साबित करने के लिए ये सबूत थे. पुलिस के मुताबिक़ एक पत्रिका के कवर पे आसिया ने अपना नाम हाथ से लिखा हुआ था. दो पे, हाथ से ही, रफ़िया ने अपना. बाद में पुलिस ने कोटा, राजस्थान से पत्रिका के मालिक, संपादक एम.ए. नईम को भी गिरफ्तार कर लिया. पत्रिका बंद हो चुकी थी.

लेकिन इस पत्रिका को रखने के जुर्म में लोगों का 2001 में प्रतिबंधित हो चुकी सिमी का सदस्य होना बंद नहीं हुआ. जुलाई, 2006 को मुंबई की एक लोकल ट्रेन में हुए धमाकों के लिए जिम्मेवार बताए गए मोहम्मद फ़ैसल अताउर रहमान शेख, ज़मीर लतीफुर रहमान शेख और डा. तनवीर अहमद अंसारी को भी इसी पत्रिका की तीन प्रतियां मिलने की वजह से प्रतिबंधित संगठन सिमी का सदस्य माना और बताया गया.

जुलाई 2006 में मुंबई की एक अदालत को दिए हलफनामे में रहीमतुल्ला सैय्यद ने कहा कि दानिश रियाज़ शौकत अली शेख नाम के एक आतंकवादी से उसे तहरीके मिल्लत की एक पत्रिका मिली थी. अगस्त 2006 में मुंबई पुलिस के एक ए.एस.आई. रहीमतुल्ला इनायत सैय्यद ने कोर्ट को दिए हलफनामे में 30 को पकड़े गए मोहम्मद नजीब अब्दुल राशिद शौकत अली शेख को आतंकवादी बताया. इसी पत्रिका की एक प्रति मिलने के आधार पर.

13 अगस्त, 2006 को कंदिवाली पुलिस स्टेशन में दर्ज एक मामले में पकड़े गए मोहम्मद नजीब अब्दुल राशिद और उस के साथियों को भी पुलिस इसी पत्रिका की कुछ प्रतियां मिलने के आधार पर आतंकवादी और प्रतिबंधित संगठन सिमी के सदस्य बताया था.

8 सितम्बर, 2006 को मालेगांव के बड़ा कब्रिस्तान इलाके में कुछ फ़साद हो गए. इन में 37 लोग मारे गए, सौ ज़ख़्मी हुए. पुलिस ने आज़ाद नगर थाने में मामला दर्ज किया. पुलिस ने नूर उल हुदा नाम के एक मजदूर को पकड़ा. उस के मुताबिक़ उस ने उस के घर पे छापा मार के तहरीके मिल्लत की एक प्रति बरामद की. 19 सितम्बर को इस मामले की तफ्तीश एटीएस को सौंप दी गई. एटीएस ने नूर उल हुदा की निशानदेही पर आठ और आतंकवादियों को पकड़ने के साथ दावा किया कि उसने मालेगांव ब्लास्ट केस सुलझा लिया है. लेकिन असीमानंद के इकबालिया बयान से पता चला कि वो बम धमाके नूर उल हुदा और उस के साथियों ने किये ही नहीं थे. उन सब को ज़मानत मिल गई. ये अलग बात है कि तब तक ये नौ के नौ लोग छ: छ: साल की सजा काट चुके थे. उस अपराध के लिए जो उन्होंने किया ही नहीं था.

19 सितम्बर 2008 को मध्य प्रदेश पुलिस ने मिसरोद रेलवे स्टेशन से जबलपुर के एक 29 वर्षीय नौजवान मोहम्मद अली को पकड़ा बताया. दावा किया कि उस से भी 'तहरीके मिल्लत' मिली. थानेदार चंदन सिंह सुरामा ने अपनी रपट में इसी आधार पर उसे भी सिमी का सदस्य और आतंकवादी माना. सुरामा के मुताबिक़ उसे मोहम्मद अली के झोले से पत्रिका को दी पांच सौ रूपये की राशि की रसीद भी मिली.

उधर, रफ़िया और आसिया के भाई इनामुर्रहमान को राजस्थान पुलिस ने उठा लिया. ये कह के उसका जयपुर के धमाकों में हाथ है. उस के और उसकी दोनों बहनों समेत कुल 14 लोग इस आरोप में पकड़े गए. इन सब पे इस पत्रिका को पढने और पढ़ाने का इलज़ाम था. बाद में इन 14 में से 11 को ज़मानत पे छोड़ दिया गया.

हैरानी और दुःख की बात ये है कि अलग अलग प्रांत और शहरों की अलग अलग वारदातों में इन जिन तमाम लोगों को पुलिस ने जिस पत्रिका 'तहरीके मिल्लत' की प्रतियां मिलने की वजह से आतंकवादी बताया उस की हरेक के पास वही तीन प्रतियां थीं जो शुरू में आसिया और रफिया के पास से मिली थीं और जिन में से एक के कवर पेज पे आसिया ने अपने हाथ से अपना और बाकी दो पे रफ़िया ने अपने हाथ से अपना नाम लिखा हुआ था. पांच सौ रूपये वाली रसीद भी वही एक थी. अलग अलग प्रांतों की पुलिस ने बेकसूरों को भी आतंकवादी बता के जेल में भिजवा देने के लिए इस पत्रिका की इन्हीं तीन प्रतियों का इस्तेमाल किया. जिन का नाम ही रख दिया गया था, 'तहरीके मिल्लत आसिया'.

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