Saturday, October 13, 2012

नक्सलवाद या राजनीतिक आतंकवाद !



हिन्दुस्तान में राजनीति राष्ट्र की सेवा और विकास का हेतु होने के बजाय लोकतांत्रिक तानाशाही का जरिया मात्र रही है। यह तानाशाही काफी हद तक देश को घुन की तरह चाट चुकी है फिर भी लोकतंत्र में आस्था का डंका पीटने वाले बेशर्मो को इस बात का अंदाजा नहीं है कि उनके पैरों तले जमीन कब की खिसक चुकी है। देश के किसी भी हिस्से में देखिये ये राजनीतिक आतंकवाद फन काढ़े विष वमन कर रहा है। कमोवेश हर जगह के हालात एक जैसे हैं अंतर सिर्फ इतना है कि कुछ जगहों पर इसके विरोध में लोगों ने हथियार तक उठा लिए हैं और कुछ जगहों पर संगठन की कमी के कारण अभी सिर्फ दिलों में बारूद इकट्ठा हो रहा है। गौरतलब है कि जो तस्वीर उभर रही है वह बहुत ही भयानक है और किसी भी समय हकीकत की जमीन पर उतर सकती है। राजनीतिक और प्रशासनिक पर्यवेक्षक शासन और सत्ता के सामने सिर्फ वही तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं जो वह देखना चाहती है। वैसे भी ये इतने प्रैक्टिकल होते हैं कि इनका ध्यान सिर्फ अपने वेतन, भत्ते और हनक बनाने पर ही केन्द्रित रहता है। राजनेताओं द्वारा जिस तरह क़ानून और व्यवस्था को बंधक बनाने की परिपाटी और विरोधियों का दमन करने का चलन अपना लिया गया है वह इस लोकतांत्रिक तानाशाही का निकृष्टतम रूप है। राजनेताओं की इसी राजनीति की प्रतिक्रिया स्वरुप जन्मे हिंसक विरोध को नक्सलवाद की संज्ञा दी जा रही है। नक्सलवाद जाने-अनजाने देशद्रोह तक की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं, और जिन स्थानों पर वे पूरी तरह से नक्सलियों के रूप में चिन्हित कर दिए गए हैं वहां उनका राजनीतिक इस्तेमाल भी धड़ल्ले से हो रहा है। यानी प्रतिक्रिया स्वरुप की जाने वाली हिंसा को अब राजनीतिक हथियार बनाकर नासूर में तब्दील कर दिया गया है। स्पष्ट है कि इन नक्सलियों के हालात अब पाकिस्तान द्वारा पोषित आतकवादियों के समकक्ष है जिनके पास पुनर्वास का कोई रास्ता नहीं है। जग-जाहिर है कि इंसान जब हथियार उठता है और उसके लिए पीछे लौटने के दरवाजे बंद हो जाते हैं तो वह जेल में मरने के बजाय आज़ाद जिन्दगी जीते हुए एन्काउन्टर होने की सबसे बड़ी और अदम्य इच्छा पाल लेता है।
नक्सलवाद की जड़ों और उनके प्रभावों पर केन्द्रित ना रहते हुए मेरा मकसद राजनीतिक आतंकवाद से पनप रहे आक्रोश और बेहद चिंताजनक विचारधारा की तरफ ध्यान आकृष्ट करना है। राजनीति अब राज्य और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरी तरह से भुलाकर आम आदमी और स्थानीय क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व कायम करने का साधन बन गई है प्रशासनिक कार्यों में बेढंगे और निहायत घटिया स्तर पर हस्तक्षेप करना राजनेताओं का प्रमुख उद्देश्य बना हुआ है। चुनावों के बाद सबसे पहले उन लोगों की लिस्ट बनती है जिन्होंने चुनाव में विरोध किया हो, और उनके दमन की योजनायें तैयार की जाती है, (बहुतेरे नेता इसे बाकायदा नाकाबंदी की संज्ञा देते है) उसके बाद बारी आती है अपने लोगों (जाहिर सी बात है इनमे कोई शरीफ आदमी नहीं होता) को कमाई करवाने और उनका रोब-दाब बढ़ाने की, सो स्थानीय प्रशासन से बाकायदा उनकी पहचान कराई जाती है कि ये आज से आपके नए दामाद हैं। और फिर बारी आती है सगे-सम्बन्धियों और आर्थिक हितैषियों की जिन्हें नाली, खडंजे, सड़के और जितने भी सरकारी निर्माण के ठेके पट्टे (यहाँ तक की बीयर और शराब की दुकानों के लाइसेंस तक) उन्हें सौंपने की। जिन लोगों की तनिक भी दिलचस्पी इन चीजों में होगी उन्होंने अक्सर क्षेत्र के माननीयों को अपने हाथों से सार्वजनिक उपक्रम (शिक्षा, चिकित्सा, खाद्य, निर्माण एवं आपदा प्रबंधन विभाग आदि) के कार्य बांटते देखा होगा। बात सिर्फ यहीं तक सीमित होती तो भी स्थिति विस्फोटक न होती। अपराधियों को संरक्षण देकर जिस तरह का असुरक्षित वातावरण पैदा किया जा रहा है वह लोकतंत्र से स्वास्थ्य के लिए बिलकुल भी लाभदायक नहीं है। दमन और विद्वेष की नीव पर खडी सरकारें हर घर में नक्सली पैदा करने की कोशिश करती नजर आ रही हैं। इन राजनेताओं को इतना भी समझ में नहीं आता है कि ये वास्तव में उस पद के हकदार भी नहीं है जिस पर बैठकर ये इतराते हैं और तानाशाहों जैसी भोंडी हरकतें करते हैं। कुछेक नेताओ को छोड़कर सारे राजनेताओं की हालत ये है कि उन्हें विधायक या संसद इसलिए बनने का मौका मिला क्योंकि मतदाता मतदान करने ही नहीं आया। महज २० से २५ प्रतिशत वोटों को पाकर राजनेता बन गए इन राजनीतिज्ञों को कमाई और राजनीतिक ताकत को छोड़कर राजनेता के किसी फ़र्ज़ का ककहरा तक नहीं आता है। शिक्षित युवाओं और सभ्य हिन्दुस्तानियों के दिल पर क्या गुजरती होगी जब उनके द्वारा चुने गए नेता भारत की जनता और भारत माता में अपनी निष्ठा की बात न कहकर व्यक्ति विशेष में अपनी निष्ठा का ढोल पीटता है? शायद ये बात आज कोई राजनेता नहीं सोचता; हिन्दुस्तान की अधिकाँश जनता भी शायद इस छोटी सी बात की गंभीरता को नहीं समझ पाती और हर बार छली जाती है। लेकिन जिस तरह शिक्षा और संचार के माध्यमों का विकास हो रहा है आज इस देश की जनसँख्या का एक बहुत बड़ा युवा तबका राजनीति की दशा और दिशा पर निगाह रखता है और हर रोज उसका असंतोष बढ़ता जाता है, मैं इसी असंतोष को नक्सलवाद के बीज के रूप में देखता हूँ जो आगे चलकर बहुत ही विकराल रूप ले सकता है। ये राजनीतिक आतंकवाद यदि इसी तरह जारी रहा तो विस्फोट बहुत दूर नहीं है, असंतोष यदि ब्रिटेन में राजा और रानी का सार्वजानिक क़त्ल करवा कर कामनवेल्थ की स्थापना कर सकता है तो हिन्दुस्तान में पूर्ण शुद्धिकरण का नाद करके लोकतांत्रिक-अधिनायक की व्यवस्था भी दे सकता है।

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