Saturday, November 10, 2012

दंगों में कौन मरता है, कौन उन्हें शुरू करता है...??



विभूति नारायण राय ने अपने एक लेख “दंगों में कौन मरता है, कौन उन्हें शुरू करता है” में स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि साम्प्रदायिक दंगों के बारे में सोचते समय भारत में बहुसंख्यक समुदाय से तथ्यों को ओझल रखा जाता हैं और ऐसा करने वालों का मन पूर्वाग्रहों से ग्रस्त रहता है। आम हिन्दू यह मान कर चलता है कि दंगों की शुरूआत मुसलमान करतें हैं और उनमें मरने वालों में ज्यादा हिन्दू होतें हैं। पर दंगों की शुरूआत के बारे में बहस की गुंजायश है। लेकिन मरने वालों की तादाद के बारे में तो कतई नहीं। आमतौर पर मरने वालों में न सिर्फ मुसलमानों की संख्या लगभग हर दंगे में ज्यादा होती है। बल्कि आधे से ज्यादा दंगों में तो यह संख्या 90 प्रतिशत से भी अधिक होती है।
दंगों की शुरूआत कौन करता है। इस मुद्दे पर बात करने के पहले यदि हम मरने वालों की संख्या की पडताल करना उचित होगा। 1960 के बाद हमारे देश में जो साम्प्रदायिक दंगे हुयें हैं। उनका चरित्र सन् 1947 के आसपास हुए विभाजन से सम्बन्धित दंगों के चरित्र से भिन्न हैं। 1960 तक विभाजन से उत्पन्न कारण लगभग समाप्त हो चुके थे और तत्कालीन पूर्वी एंव पश्चिम पाकिस्तान से भागकर आने वाले हिन्दुओं के मुंह से सुनी हुई ज्यादतियों की प्रतिक्रिया में होने वाले कुछ दंगों को छोड दें। तो लगभग अधिकतर दंगों के कारण विभाजन की स्मृति से एकदम परे हटकर रहे हैं। विभाजन के फौरन बाद क्षीण हुये मुस्लिम और हिन्दू साम्प्रदायिक संगठनों के पुनर्संगठित होने और राजनीतिक हितों के लिये दंगे कराने की बढती प्रवृत्ति के कारण अधिकतर दंगे हुए हैं।
यदि सरकारी आंकडों का विशलेण किया जाए तो यह प्रकट होता है कि सभी दंगों में मारे गये लोगों में तीन चौथाई मुसलमान होतें हैं। नष्ट हुई सम्पति में भी लगभग 75 प्रतिशत से अधिक मुसलमानों की होती है। यही नहीं, दंगों के लिये गिरफ्तार किये जाने वाले लोगों में भी मुसलमानों की ही संख्या ज्यादा होती है। यदि हम बडे-बडे पांच-छः दंगों में मारे गए लोगों की संख्या की पडताल करें। तो सारी स्थिति बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है।
1960 के बाद का सबसे बडा दंगा अहमदाबाद में हुआ। राज्य सरकार ने न्यायमूर्ति जगमोहन रेड्डी वाले जाँच आयोग ने अहमदाबाद के दंगों के बारे में जो आंकडे दिये। उनके मुताबिक इस दंगे में 6742 मकान और दुकान जलाई गयीं। इनमें सिर्फ 671 हिन्दुओं की थीं बाकी 6071 मुसलमानों की नष्ट हुई। कुल सम्पत्ति का मूल्य 42324068 रुपये था। जिसमें हिन्दू सम्पत्ति 7585845 रु. की थी और मुस्लिम सम्पत्ति 34738224 रुपये की। 512 मृतकों में 24 हिन्दू थे और 413 मुसलमान । बाकी 75 की शिनाख्त नहीं हो सकी थी।
इसके बाद का सबसे बडा दंगा 1970 में भिवंडी में हुआ। इसमें 78 लोग मारे गये। इनमें 17 हिन्दू थे और 59 मुसलमान। बाकी दो की शिनाख्त नहीं हो सकी। भिवंडी दंगे की जांच के लिए नियुक्त न्यायमूर्ति डी. वी. मेडन जांच आयोग के सामने जो बयान दिये गये। उनसे यह प्रकट हुआ कि इस दंगे में 6 मुसलमान औरतों के साथ बलात्कार हुआ। जबकि एक भी हिन्दू औरत बलात्कार की शिकार नहीं हुई। भिवंडी के दंगों के परिणामस्वरूप हुये जलगांव के दंगे में 43 लोग मारे गये, जिनमें एक हिन्दू और बाकी के 42 मुसलमान। नष्ट हुयी कुल सम्पत्ति में 3390977 रुपये मूल्य की सम्पत्ति मुसलमानों की थी और सिर्फ 83725 रुपये मूल्य की हिन्दुओं की।
1967 में रांची-हटिया और नौशेरा में हुये दंगों में मृतकों की कुल संख्या 184 थी। जिनमें 164 मुसलमान और तो 19 हिन्दू, एक की शिनाख्त नहीं हो सकी। जिन दंगों का ऊपर जिक्र आया है, वे 1960 के बाद के भारत के भयंकरतम दंगों में हैं। इसके अलावा जमशेदपुर, अलीगढ, वाराणसी और बंबई जैसे शहरों में भी दंगे हुयें हैं। इन दंगों में भी कमोबेश उपर वाली स्थिति ही रही। शायद ही कोई ऐसा दंगा हुआ होगा, जिसमें मरने वालों में 70 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान न रहें हों। नष्ट हुई सम्पत्ति में भी लगभग यही अनुपात रहा।
सबसे ज्यादा अजीब बात यह है कि लगभग हर दंगे में पुलिस के हाथों गिरफ्तार होने वालों में भी मुसलमानों की ही संख्या अधिक रहती है. मुसलमानों के ही अधिक घरों की तलाशियां भी होतीं हैं। पुलिस भी बहुसंख्यक समुदाय की तरह यह सोचती है कि दंगों के लिये जिम्मेदार मुसलमान हैं। लिहाजा वह यह मानती प्रतीत होती है कि दंगों पर तभी नियंत्रण पाया जा सकता है जब मुसलमानों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी। लेकिन इसके बावजूद बहुसंख्यक समुदाय की यह धारणा, कि दंगों में मरने वालों में अधिकतर हिन्दू होतें हैं।
यह धारणा इतनी गहरी है कि तमाम सरकारी आंकडों के बावजूद आम हिन्दू इस बात को नहीं मानता कि वास्तव में दंगों में हिन्दू ज्यादा आक्रामक होतें हैं। इसको न मानने की बात को अगर गहराई से देखा जाय तो पता चलेगा कि इसके पीछे बचपन की वो धारणाएं काम करतीं हैं। जो बचपन से हर हिन्दू घर में बच्चे को यह सिखाया जाता है कि मुसलमान क्रूर होतें हैं और वे किसी की भी जान लेने में नहीं हिचकते। इसके विपरीत हिन्दू तो बडे क़ोमल हृदय का होता है और उसके लिये चींटी की भी जान लेना मुश्किल होता है।
अक्सर आम हिन्दू आपको यह कहते हुए मिलेगा कि अरे साहब ! हिन्दू घर में तो आपको सब्जी काटने की छूरी के अलावा कोई हथियार नहीं मिलेगा। आम हिन्दू का मानना है। कि आमतौर पर मुसलमान अपने घरों में हथियारों का जखीरा रखतें हैं। यही वजह है कि आम हिन्दू को दंगों में मरने वालों के सरकारी आंकडे भी अविश्वसनीय लगतें हैं। दूसरी ओर कोई भी सरकार आंकडों को इस ढंग से पेश करना नही चाहेगी। जिससे आम लोगों के बीच मे यह धारणा बने कि देश में अल्पसंख्यक असुरक्षित है।

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