Monday, November 05, 2012

विशेष राज्य के दर्जे की लड़ाई नहीं, जनता को मुद्दे से भटकना है नीतीश बाबू


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सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए,
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए..."
दुष्यंत सिर्फ ये चंद पंक्तियाँ लिख कर लोगों के जहन में बदलाव की आग जला गए, पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इतनी भव्य रैली का आयोजन कर भी सिर्फ हंगामा खड़ा करने में कामयाब हो सके. बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिले ये हम सभी चाहते हैं, लेकिन क्या सिर्फ हंगामा खड़ा कर इस मकसद को पाया जा सकता है. नहीं.... कदापि नहीं.
नीतीश इसे मुद्दा बना राजनीति कर रहे हैं. कहीं ये तीर निशाने पर लग जाए और आगामी चुनाव में फिर एक बड़ी जीत. नीतीश बताएंगे कि अधिकार रैली के नाम पर कितने पैसे पार्टी फंड में जमा हुए. एक उदाहरण देता हूँ, मुज़फ्फ़रपुर सेन्ट्रल जेल में सजा काट रहे जेडीयू के पूर्व बाहुबली विधायक मुन्ना शुक्ला अधिकार रैली के लिए पार्टी को चंदा देने के एवज में वैशाली जिले के एक निजी कॉलेज संचालक से सात करोड़ की रंगदारी मांगी. शुरूआती जांच में इसे सही पाया गया. इसकी पुष्टि खुद एडीजी गुप्तेश्वर पाण्डेय कर चुके हैं. ऐसे कई उदाहरण हैं कि किस तरह से अरबों रूपए पार्टी फंड में चुनावी तैयारी के लिए जमा किये गए. इस चक्कर एक बड़ा सच सामने आ गया. सुशासन की पोल खुल गई. फंड के नाम पर जिस तरह से धन की उगाही हुई ये आम आदमी की नींद हराम करने के लिए काफी है. ये लालू राज के उस वाकये की याद दिलाता है जब लाठी रैली के लिए सुभाष और साधू यादव के गुंडे शोरुम से नई गाड़ियाँ और व्यापारियों से रंगदारी मांग नया चलन शुरू किया था. 
रैली को सफल बनाने के लिए पार्टी की तरफ से नौ विशेष रेलगाड़ियों को किराए पर लिया गया था. साथ ही सैकड़ों बसों के ज़रिए लोगों को रैली में लाने और वापस भेजने की मुफ्त सुविधा उपलब्ध भी कराई गई थी. बड़े-बड़े होर्डिंग, बैनर और पोस्टर से पटना शहर के तमाम प्रमुख हिस्सों को इस क़दर पाट दिया गया था, जैसे दल को अवैध अतिक्रमण की खुली छूट प्राप्त हो. इतना ही नहीं, रैली में आने वालों के मनोरंजन के लिए जदयू विधायकों और दल से जुड़े मंत्रियों के सरकारी आवासों पर नाच-गाने की भी पुख्ता व्यवस्था थी.
दरअसल ये विशेष राज्य के दर्जे की लड़ाई नहीं, पार्टी को मजबूत बनाने की कोशिश भर है. इस रैली का मकसद कार्यकर्ता में जोश भरना, एक जुट करना और विपक्ष को उसकी औकात बताना है. भीड़ जमा करें, पैसे जमा करें यही टास्क विधायकों, जिला अध्यक्षों और संगठन के कर्ताधर्ता को दिया गया था. मुर्गा, मछली और मटन बिरियानी का भोज, मुफ्त की पिकनिक, सैर सपाटा.. ऐसी ही सोच वाले लोग जमा हुए थे अधिकार रैली में. जिन्हें ये नहीं पता कि हमारे देश के प्रधानमंत्री कौन हैं, जो ये नहीं जानते कि बिहार के मुख्यमंत्री कौन हैं. जिन्हें ये नहीं पता कि बिहार देश है या राज्य या जिला. ऐसे ही लोग आते हैं इस रैली में. भीड़ में शामिल 70 फीसदी लोग ये नहीं जानते कि वो पटना क्या करने आये हैं. उन्हें नहीं पता क्या होता है विशेष राज्य. ये ऐसे ही लोग हैं जो नादानी में पैसे लेकर वोट देते हैं. जो डर या किसी दवाब में आ कर वोट देते हैं. इनकी अपनी सोच नहीं होती. ऐसे लोग इशारों पर चलते हैं. फिर नीतीश किस मकसद को पूरा करने के लिए ऐसी भीड़ जमा करते हैं.  
ये सत्ता का दंभ है. नीतीश ये दिखाना चाहते हैं कि मेरे एक इशारे पर क्या हो सकता है. वो ये साबित करना चाहते हैं कि विशेष राज्य के मुद्दे पर वो चुनाव जीत सकते हैं, या जो बड़ी पार्टी बिहार को ये तमगा देगी राज्य में जीत उसी की होगी. लेकिन ये महज एक चुनावी हथकंडा भर है. राजनीतिक रूप से बिहार को विशेष दर्जा मिल भी सकता है लेकिन तकनीकी रूप से शायद कभी नहीं. क्यूंकि राज्य इसके लिए जरूरी नियम फुलफील नहीं करता है.  
न्यूज़ चैनलों पर लाइव कवरेज, अख़बारों की अघोषित सहमती, इंटरनेट पर टेलीकास्ट... ये सब इतनी खूबसूरती से मैनेज किया गया था कि कोई भी साधारण सोच का आदमी नीतीश कुमार के झांसे में आ जायेगा. ये त्रासदी भी है कि लोग अक्सर ऐसी बात के लिए भीड़ बन जाते हैं जो शायद मुमकिन नहीं है.
अगर ऐसी रैली नीतीश शिक्षा में जागरूकता फ़ैलाने के लिए करते या महिलाओं के उत्थान के लिए करते. गांव गांव से लोगों को बुलाते, भीड़ जमा करते और शिक्षा की अहमियत को समझाते तो कोई बात होती. तब लगता सुशासन बाबू अपना काम कर रहे हैं. पर ऐसी बेतुका बातों के लिए अनपढ़, कमअक्ल, निर्दोष ग्रामीणों का नैतिक शोषण करना निहायत ही ओछी राजनीति है. अधिकार रैली शुद्ध रूप से राजनीतिक आयोजन है. इससे किसी भी रूप से विकास की खुशबू नहीं आती. केवल सत्ता में टिके रहने जैसी लालच की बू आती है. पैसे बनाने की बू आती है. धिक्कार है ऐसी रैली पर जिसका मकसद ही झूठा है.
ऐसी रैलियों में ताली इशारों पर बजती हैं. मंच पर जगह पाने के लिए नेताओं की आपस में लड़ाई होती है. भीड़ में हंगामा होता है. भाषण देने के लिए बड़े छोटे नेताओं में होड़ लगी रहती है. फिर कैसे ऐसी रैली से बिहार की आवाज़ को मजबूती मिलेगी. सत्तासीन दल के इस भव्य रैली का एक बड़ा मकसद है बड़ी पार्टियों को प्रभाव में लेना. ताकि वो इस मुद्दे को अपनी चुनावी घोषणा पत्र में जगह दे. उन्हें ये एहसास दिलाना कि इस सहमती के बगैर आप चुनाव नहीं जीत सकते. लेकिन नीतीश को ये याद रखना चाहिए कि बिहार में मुद्दे की नहीं जाति की राजनीति होती है. इसलिए इस आयोजन का बड़ी पार्टियों पर कोई असर होगा मुश्किल लगता है. नीतीश का दूसरा मकसद, जनता को उसके मुद्दे से भटका कर नकली सोच देना है. पर वो भूल रहे है कि ऐसे आयोजन का असर सिर्फ 24 घंटे ही रहता है. लोग ऐसी बातें जल्दी भूल जाते हैं. रोटी खाते वक़्त, सड़क पर चलते वक़्त और ढिबरी की रौशनी में पढाई करते वक़्त सरकार की खूबी और खामी समझ आती है. और यही वो चीज़ है जो रोज 24/7 लोग याद करते हैं.

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