Friday, May 04, 2012

बीती ताहिं बिसार दे?


गुजरात दंगे को दस वर्ष गुजर गए हैं परंतु वहां के दंगा पीड़ितों को आज तक न्याय नहीं मिल सका है। इस सिलसिले में पिछले कुछ समय से एक नई बहस प्रारंभ हुई है। कुछ लोगों का कहना है कि गुजरात के मुसलमानों को वह सब भूल जाना चाहिए जो उन पर गुजरा, दोषियों को माफ कर देना चाहिए और गुजरात में हो रहे विकास में हिस्सेदार बन आगे ब़ना चाहिए। आखिर कब तक मुसलमान 2002 के नाम पर रोते झींकते रहेंगे? चाहे वह कितना ही भयावह अनुभव क्यों न रहा हो, वह अब गुजर चुका है और उसकी कटु स्मॢतियों को भुला देना ही श्रेयस्कर है। कुछ माह पहले, मौलाना वस्तानवी, जो कई मदरसे और धर्मनिरपेक्ष उच्च शिक्षण संस्थान चलाते हैं, ने भी इस आशय का सुझाव दिया था। उन्होंने कहा था कि मुसलमानों को गुजरात की विकास की मुख्यधारा में शामिल होना चाहिए और उससे पूरा लाभ उठाना चाहिए।
मेरा मानना है कि यह एक बहुत महत्वपूर्ण बहस है जिसके सभी निहितार्थों और पहलुओं पर गौर किया जाना जरूरी है। इस मुद्दे के गंभीर नैतिक और कानूनी पहलू हैं। यह विचार नैतिक दृष्टि से अत्यंत तार्किक, उचित और आकर्षक प्रतीत होता है कि गुजरात के मुसलमानों को अपने प्रियजनों के हत्यारों को माफ कर देना चाहिए और पूरे घटनाक्रम को एक दुःस्वप्न की भांति भूल जाना चाहिए। परंतु ऐसे किसी कदम के कानूनी और संवैधानिक पहलुओं पर विचार भी परम आवश्यक है।
सबसे पहले हमें """"भूल जाने"""" और """"माफ कर देने"""" के बीच के अंतर को समझना होगा। अक्सर ये दोनों शब्द (फारगेट एण्ड फारगिव) एक साथ इस्तेमाल किए जाते हैं परंतु ये समानार्थी नहीं हैं। इनमें महत्वपूर्ण अंतर हैं। क्षमा करना जहां नैतिक मूल्यों की श्रेणी में आता है वहीं भूल जाना एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। क्षमा करना (सिवाय उनके जो खून का बदला खून के सिद्घांत में आस्था रखते हैं) आसान है, भूल जाना कहीं मुश्किल।
गुजरात के कत्लओम जैसी लोमहर्षक घटनाओं को भूल जाना लगभग असंभव है। क्या गुलबर्ग सोसायटी, नरोदा पाटिया, अहमदाबाद के कुछ हिस्सों और उत्तर व केन्द्रीय गुजरात के मुस्लिम निवासी उन आतंक भरे दिनरातों को भूल सकते हैं? कई महिलाओं के साथ उनके परिजनों के सामने बलात्कार किए गए, बच्चों को उनके माता पिता की आंखों के सामने मौत के घाट उतार दिया गया। बिलकिस बानो अपने रिश्तेदारों की क्रुर मौत की चश्मदीद थीं। क्या इस तरह की आपबीती को कोई भूल सकता है?
किसी महिला के लिए एक साधारण बलात्कार को भी जीवन भर भुलाना मुश्किल होता है। फिर हम कैसे यह अपेक्षा कर सकते हैं कि कोई महिला उस बलात्कार और बर्बर व्यवहार को भुला सकेगी जो उसके परिवारजनों के सामने उसके साथ किया गया। हम क्या भूलते हैं और क्या याद रखते हैं यह कई मनोवैज्ञानिक अध्ययनों का विषय रहा है। कई बार किसी चीज को याद रखना मनोवैज्ञानिक दृष्टि से लाभप्रद होता है तो कभी भूल जाने से आदमी अपने मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रख पाता है। कुछ यादें ऐसी होती हैं कि अगर वे हमारा पीछा न छोड़ें तो हमारा पूरा जीवन नर्क हो जाए। इसके विपरीत, कई चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें याद रखने से हमें प्रेरणा और संतोष प्राप्त होता है। अतः याद रखना और भूल जाना, एक अत्यंत जटिल परिघटना है।
दूसरी ओर, क्षमा करना एक जानतेबूझते लिया जाने वाला नैतिक निर्णय है। यह निर्णय लेने के पहले व्यक्ति को गहरे अतंद्वंद से गुजरना होता है। बदला लेने की इच्छा, मानव की मूल प्रकृति का हिस्सा है। हर व्यक्ति स्वयं को अपमानित करने या नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति का अपमान करने या उसे नुकसान पहुंचाने की प्रबल इच्छा रखता है। जाहिर है कि यह प्रक्रिया हिंसा के एक अनवरत चक्र को जन्म देती है। इसी चक्र को तोड़ने के लिए सभी धर्मों के ग्रंथ हमें अपने शत्रुओं को क्षमा करने की शिक्षा देते हैं। बाईबल तो यहां तक कहती है कि अगर कोई तुम्हारे एक गाल पर चांटा मारे तो अपना दूसरा गाल उसके सामने कर दो। यह एक अत्यंत कठिन नैतिक निर्णय है जिसे लेने का साहस और धैर्य बहुत कम लोगों में होता है। दूसरा गाल सामने कर देने का उद्धेश्य है हमलावर को उसकी हरकतों के लिए शर्मसार करना।
क्षमा करने के साथ कई अन्य शर्तें जुड़ी हुई हैं। क्षमा करने के बाद दोनों पक्षों के बीच मेलमिलाप हो जाना चाहिए और उनके दिलों में एकदूसरे के प्रति तनिक सी भी कड़वाहट नहीं बचनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो ऐसी क्षमा का महत्व काफी कम हो जाता है यद्यपि उसकी कुछ उपयोगिता फिर भी बाकी रहती है। जहां तक गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का सवाल है, उन्होंने गुजरात दंगों की जिम्मेदारी आज तक नहीं ली है। कुछ लोगों का कहना है कि नरेन्द्र मोदी ने दंगों को रोकने में असफल रहकर स्वयं को मुख्यमंत्री के पद के लिए अयोग्य सिद्ध कर दिया है। कुछ लोग इससे भी आगे जाकर कहते हैं कि मोदी ने न सिर्फ दंगे नहीं रोके वरन दंगे कराने के पीछे भी वही थे।
कई क्षेत्रों से यह सुझाव भी आया था कि दक्षिण अफ्रीका की तरह गुजरात में भी ट्रुथ एण्ड रिकन्सियीलिएशन कमीशन (सत्य एवं मेलमिलाप आयोग) का गठन किया जाए। परंतु गुजरात सरकार ने इस सुझाव को एक सिरे से नकार दिया। इसका अर्थ यही है कि दंगा कराने वालों को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है। वे एक राजनैतिक विचारधारा विशेष से प्रभावित हैं और उन्होंने सन 2002 में गुजरात के मुसलमानों के साथ जो व्यवहार किया, वह उसे अपनी हिन्दुत्ववादी सोच के अनुरूप मानते हैं और वे यह भी मानते हैं कि उन्होंने जो कुछ किया वह पूरी तरह उचित था। अतः यह साफ है कि अगर उनकी क्रुरता के शिकार हुए लोग, गुजरात के दंगाईयों को क्षमा भी कर दें तो भी उससे उनके मन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और उनका ह्दय परिवर्तन होने की संभावना तो लगभग शून्य है।
इस तरह, गुजरात के दंगाईयों को क्षमा करने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। वे तो पहले से ही यह मानते हैं कि चूंकि उनकी पार्टी सत्ता में है इसलिए वैसे भी उन्हें कोई छू भी नहीं सकता। बेस्ट बेकरी और बिलकिस बानो मामले, उच्चतम न्यायालय की अनुमति से, गुजरात के बाहर के न्यायालयों में इसलिए चलाने पड़े क्योंकि गुजरात में पीड़ितों को न्याय मिलने की कोई संभावना नहीं थी। उल्टे, दंगाई, पीड़ितों को डरातेधमकाते रहे हैं। उन्हें उनके घरों में लौटने नहीं दिया जा रहा है और उनपर यह दबाव है कि वे पुलिस में की गई अपनी रिपोर्टों को वापिस ले लें और अगर मामला अदालत तक पहुंचे तो पक्षद्रोही साक्षी बन जावें।
अगर इन अपराधियों ने जरा सा भी पश्चाताप दिखाया होता तो उन्हें क्षमा करने और उनके साथ फिर से मेलमिलाप करने का कोई अर्थ होता। जब अपराधी के मन में पश्चाताप हो, वह शत्रुता खत्म करने के लिए इच्छुक दिखे तब उसे क्षमा कर देना, पीड़ित के मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। इससे उसकी बदला लेने की इच्छा खत्म हो जाती है और चोट पहुंचाने वाले को पीड़ा न पहुंचा सकने की मजबूरी से उत्पन्न बैचेनी और अवसाद से वह मुक्त हो जाता है। एक तरह से क्षमा करने से व्यक्ति को उसके खिलाफ की गई हिंसा या उसके अपमान का आध्यात्मिक और नैतिक मुआवजा मिल जाता है।
आईए, अब हम न्याय के मुद्दे पर विचार करें। इस मुद्दे के महत्व को हम कम करके नहीं आंक सकते। शायद यह सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। शक्तिशाली और प्रभुत्वशाली वर्ग को कमजोर वर्गों के खिलाफ हिंसा करके, उन पर अत्याचार करके, बच निकलने नहीं दिया जा सकता। प्रजातंत्र का आधार ही है कानून का राज। और जब किसी राज्य का प्रशासनिक मुखिया, जो कि संविधान के आधार पर शासन को चलाने के लिए जिम्मेदार है और कानूनव्यवस्था बनाए रखना जिसके कर्तव्यों में शामिल है, वही व्यक्ति जब अपने कर्तव्यों के पालन में असफल हो जाए और न्यूटन के गतिकी के तीसरे नियम को उद्धत कर हिंसा को औचित्यपूर्ण ठहराए, तब न्याय का मुद्दा और महत्वपूर्ण बन जाता है।
किसी भी संवैधानिक प्रजातंत्र में सबके साथ न्याय, प्रजातंत्र की सफलता की आवश्यक शर्त है। यद्यपि न्याय को सामन्यतः कानून से जोड़ा जाता है तथापि उसका एक नैतिक पक्ष भी है विशेषकर पीड़ित की दृष्टि से। अगर मेरे साथ अन्याय करने वाले व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है तो इससे मुझे एक आतंरिक संतुष्टि प्राप्त होती है और व्यवस्था में मेरी आस्था मजबूत होती है।
साफ है कि यदि न्याय नहीं होता तो इससे संवैधानिक प्रजातंत्र के स्थायित्व पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। न्याय पाने के लिए अनिश्चित काल का इंतजार व्यवस्था में आस्था को कमजोर करता है और व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। पीड़ितों को ऐसा लगने लगता है कि इस व्यवस्था में केवल शक्तिशाली व्यक्तियों के साथ ही न्याय होता है। अगर उच्चतम न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करता तो गुजरात हिंसा के जिन चन्द मामलों में न्याय हुआ है, वह भी नहीं हो पाता।
गुलबर्ग सोसायटी का घटनाक्रम तो दिल को हिला देने वाला था। अहसान जाफरी और 61 अन्य लोगों को जिन्दा जला दिया गया। उनकी लाशों को भी अपमानित किया गया। हरचंद कोशिशों के बावजूद अहसान जाफरी की पत्नि को आज तक न्याय नहीं मिल सका है। उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित विशेष जांच दल ने भी मोदी को क्लीन चिट दे दी। यद्यपि एमीकस क्यूरे (न्यायालय के मित्र) राजू रामचन्द्रन ने कहा है कि एसआईटी ने मोदी को क्लीन चिट देकर गलती की है।
इस सबके बावजूद जाफरी की पत्नी ने हौसला नहीं खोया है। उनका लंबा और कठिन संघर्ष इस तथ्य को रेखांकित करता है कि किसी भी अपराध या अत्याचार के पीड़ित में न्याय पाने की जबरदस्त उत्कंठा होती है। इसे बदला लेने की इच्छा नहीं समझा जाना चाहिए क्योंकि बदला लेने के अन्य तरीके भी उपलब्ध हैं। यदि पीड़ितों को न्याय मिलता है और आक्रांताओं को सजा, तो इससे न केवल ऐसी घटनाओं की पुनरावॢत्ति पर रोक लगती है वरन पीड़ित भी इस अपराधबोध से मुक्त हो जाते हैं कि उन्होंने हिंसा के शिकार हुए अपने निर्दोष प्रियजनों के लिए कुछ नहीं किया।
इस संदर्भ में गुजरात एकमात्र उदाहरण नहीं है। सन 1984 में निरपराध सिक्खों पर जो बीती वह भी उतनी ही पीड़ादायक थी। सिक्खविरोधी दंगों के अपराधियों को भी आज तक सजा नहीं मिल सकी है। उनमें से अधिकांश शक्तिशाली राजनेता हैं। हाशिमपुरा में सन 1987 में जो कुछ हुआ था वह इससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण था। लगभग 40 युवा लड़कों को उनके घरों से खींचकर ट्रक में भर, मेरठ के बाहरी हिस्से में ले जाया गया। वहां उन सबको गोली मारकर उनके मॢत शरीर एक नहर में फेंक दिए गए। इस घटना को 25 साल गुजर चुके हैं परंतु एक भी अपराधी को सजा नहीं मिली है।
यह सब देख सुनकर कभी-कभी ऐसा लगता है कि हमारे प्रजातंत्र में कानून का राज है भी है या नहीं। हमारी प्रशासनिक मशीनरी का पूर्वाग्रहपूर्ण रूख और न्यायपालिका की सुस्त चाल हमारी व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। हमारे देश का कानून और व्यवस्था लागू करने वाले तंत्र का पूरी तरह साम्प्रदायिकीकरण हो चुका है। इससे भी दुर्भाग्यजनक यह है कि हमारे सियासी आका इस तथ्य से वाकिफ होने के बावजूद, हालात को बेहतर बनाने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं। कुछ राजनैतिक दल खुलओम जातिगत और साम्प्रदायिक हिंसा को प्रोत्साहन देते हैं और उनका कुछ नहीं बिगड़ता।
अगर ईमानदारी और तत्परता से न्याय हो तो राजनेता और पुलिसकर्मी मनमानी नहीं कर सकेंगे और कम से कम गुजरात जैसी व्यापक साम्प्रदायिक हिंसा भविष्य में नहीं होगी। यही कारण है कि साम्प्रदायिक हिंसा के पीड़ितों के साथ न्याय होना आवश्यक है। अगर ऐसा नहीं होता तो हमारे प्रजातंत्र को घुन लग जाएगा और कानून और व्यवस्था पूरी तरह ठप्प हो जाएगी।
जो लोग बीती ताहिं बिसार दे की बात कह रहे हैं उन्हें उसके दूरगामी परिणामों पर विचार करना चाहिए। हमें उनकी मंशा पर संदेह नहीं है। हो सकता है कि उनका लक्ष्य मात्र इतना हो कि मुस्लिम समुदाय पुराने घावों को भूलकर आधुनिक शिक्षा पाए और प्रगति करे। यद्यपि शिक्षा, प्रगति और समॢद्धि महत्वपूर्ण हैं तथापि न्याय की उपेक्षा घातक सिद्ध होगी। न्याय पाने की कोशिशों को हिकारत की दृष्टि से देखना खतरनाक होगा।
अगर पीड़ितों को न्याय मिल जाता है तो वे जिस मानसिक त्रास से रोज गुजर रहे हैं उससे उन्हें मुक्ति मिलेगी और उनकी खुशहाली की राह प्रशस्त होगी।

मुस्लिम वैवाहिक कानून में सुधार की पहल


तथाकथित फतवों के नाम पर मुस्लिम महिलाओं पर जो ज्यादतियां होती हैं उनसे निज़ात दिलाने के लिए और उन्हें इस्लाम और कुरान के नियमों के अनुसार समाज में बराबरी का स्थान दिलाने के लिए वैवाहिक परिवार कानून का प्रारूप तैयार किया गया है। कानून का प्रारूप अनेक न्यायविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मिलकर तैयार किया है। इस प्रारूप पर राष्ट्रीय विमर्श जारी है। विमर्श की इसी श्रृंखला में एक आयोजन भोपाल में किया गया था। प्रारूप में निकाह, मैहर के साथ तलाक पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। तलाक के नाम पर मुस्लिम महिलाओं पर भारी जुल्म किया जाता है। अनेक मामलों में मोबाईल पर एस.एम.एस. द्वारा किये गये तलाक को जायज ठहराया जाता है।

प्रारूप में बताया गया है कि तलाक का वह तरीका सर्वोत्तम तरीका है जो तीन महीने के पीरियड में दिया जाता है। इस बीच यदि पति पत्नी के संबंध सुधर जाते हैं और समझौता हो जाता है तो दोनों फिर साधारण जीवन बिता सकते हैं। प्रारूप में तलाक की अनेक प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया है। ये प्रक्रियाये हैं तलाक-हसन, तलाके-तफवीह, तलाके मुबारता। प्रारूप में बताया गया है कि तलाक देना सिर्फ पुरूष का अधिकार नहीं है जैसा आमतौर पर समझा जाता है। पत्नी भी तलाक मांग सकती है। पत्नी द्वारा तलाक मांगने को “खुल“ कहा जाता है।

प्रारूप के अनुसार निकाह मुस्लिम विवाह की वह प्रक्रिया है जिसका लिखित सुबूत होना चाहिए। लिखित सुबूत में विवाह संबंधी सभी शर्तों को शामिल किया जाएगा। विवाह के इस समझौते की तीन प्रतियां तैयार की जाएंगी। जिनमें से एक दुल्हन को दी जाएगी, एक दूल्हे को दी जाएगी और एक उस मस्जिद में रखी जाएगी जिसमें वैवाहिक कार्यक्रम संपन्न होगा। विवाह का लिखित सुबूत होने से भविष्य में किसी प्रकार की अनिश्चितता पैदा नहीं होगी। यह आम अनुभव है कि लिखित सुबूत के अभाव से सबसे ज्यादा मुसीबत का सामना महिला को ही करना पड़ता है।

प्रारूप में निकाह की विस्तृत व्याख्या की गई है। निकाह एक पुरूष और महिला के बीच हुआ एक ऐसा समझौता है जिसमें महिला से उतने ही कर्तव्यों की अपेक्षा होती है जितने उसे अधिकार दिये जाते हैं। एक बात जिस पर बार-बार जोर दिया गया है वह यह है कि पति अकेला परिवार का मुखिया नहीं है वरन् दोनों पति-पत्नी मिलजुलकर पारिवारिक उत्तरदायित्व का वहन करते हैं। परिवार संबंधी निर्णय लेने में भी दोनों की बराबर की भागीदारी होती है। पति-पत्नी दोनों का निवास कहां हो इसका निर्णय करने का बराबर का अधिकार दोनों प्राप्त है। विवाह के बाद उपलब्ध संपत्ति पर दोनों का बराबर अधिकार है। घर की जिम्मेदारी निभाना भी दोनों का कर्तव्य है। दोनों को परिवार का प्रतिनिधित्व करने का बराबर अधिकार प्राप्त है।

प्रारूप में इस बात पर जोर दिया गया है कि विवाह का पंजीकरण अनिवार्य रूप से होना चाहिए। राज्य सरकार को काजी या अन्य अधिकारी की नियुक्ति करना चाहिए जो विवाह का पंजीकरण करेगा। राज्य सरकार को ऐसे व्यक्ति को पंजीकरण के लिए नियुक्त करना चाहिए जो भारत का नागरिक हो, जिसमें आवश्यक योग्यता हो और जिसका धर्म इस्लाम हो। राज्य सरकार निकाह का पंजीकरण करने के लिए लाइसेंस जारी करेगी और ऐसा अधिकारी निकाह रजिस्ट्रार कहलाएगा। निकाह रजिस्ट्रार  के पास निकाहनामा का फार्म होगा, निकाह दर्ज करने के लिए उसके पास रजिस्टर होगा। राज्य सरकार के पास निकाहों का रिकार्ड रहेगा। निकाहनामा में दंपत्ति से संबंधित सभी जानकारी दर्ज रहेगी। इन जानकारियों में मियां-बीबी का स्टेटस, तलाक, विधवा- विधुर या दूसरी शादी जो भी स्थिति हो दर्ज रहेगी। निकाह में वधू की सहमति आवश्यक है। यदि सहमति प्राप्त नहीं की गई हो तो निकाह वैध नहीं समझा जाएगा।

प्रारूप में यह व्यवस्था की गई कि काजी स्वयं स्पष्ट रूप से सुने कि दुल्हन ने विवाह के लिए सहमति दी। सहमति किसी और रिश्तेदार माँ, दादी या बहन के माध्यम से प्राप्त नहीं की जानी चाहिए। सहमति दो गवाहों की उपस्थिति में प्राप्त की जानी चाहिए। सहमति देते समय दुल्हन को दूल्हे का नाम भी लेना चाहिए और मैहर की रकम का भी स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। दुल्हन स्वतः इस बात का फैसला करेगी कि वह मैहर किस रूप में लेगी - नगद, अचल संपत्ति, सोना या चाँदीं। विवाह की आयु वह होगी जो उस देश के कानून में निर्धारित है।

गुजारा भत्ता एक ऐसा मुद्दा है जिस पर भारी मतभेद हैं। प्रारूप में इस बात का प्रावधान किया गया है कि यदि पति सही ढंग से पत्नी का पालन-पोषण नहीं करता है तो उसकी पत्नी और एक से ज्यादा पत्नी हो तो उन्हें अधिकार होगा कानून का सहारा लेने के साथ ही आरबीटेशन काउंसिल से भी हस्तक्षेप की मांग कर सकती है। उसके बाद काउंसिल गुजारा भत्ते की रकम तय करेगी जिसे पति को देना पड़ेगा। यदि पति-पत्नी दोनों में से कोई भी चाहे तो गुजारा भत्ता की रकम में बढौत्री की मांग भी कर सकते हैं। यह मांग जिलाधीश से की जा सकती है जिसका निर्णय अंतिम होगा। यदि तयशुदा रकम का भुगतान नहीं होता है तो उसे पति की संपत्ति से वसूला जा सकता है।

इस्लाम में बहुविवाह जायज है परंतु कुरान में उसके लिए अत्यधिक सख्त शर्तों का प्रावधान है। उन समस्त शर्तों का उल्लेख प्रारूप में किया गया है। जिनके बिना एक से ज्यादा विवाह संभव नहीं है।

प्रारूप में मध्यस्तता के लिए एक काउंसिल के गठन का प्रावधान किया गया है। विवाह संबंधी सभी विवाद काउंसिल द्वारा सुलझाये जायेंगे। यह काउंसिल ही तय करेगी कि एक से ज्यादा विवाह आवश्यक है कि नहीं।

इस वैवाहिक कानून से मुस्लिम महिलाओं को काफी राहत मिलेगी। वहीं इस बात की पूरी संभावना है कि मुस्लिम पुरूषों का एक बड़ा हिस्सा इसे स्वीकार नहीं करेगा। इस बात के संकेत भोपाल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान मिले। कार्यक्रम के दौरान कुछ मुस्लिम युवक हाल में घुस आये और प्रारूप की आवश्यकता पर ही प्रश्न उठाया। उन्होंने इतना हो-हल्ला किया कि पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।

Thursday, May 03, 2012

भारतीय समाज को बेहतर बनाने के लिए आईओएस का 25 वर्षों का प्रयास


भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक बिरादरी का दर्जा रखता है. देश के संविधान ने दूसरे वर्गों के साथ-साथ इस देश के मुसलमानों को भी बराबर के अधिकार दिए हैं, लेकिन आज़ादी के 60 साल से भी ज़्यादा का वक़्त गुज़र जाने के बाद भी, आज मुसलमानों को अपना हक़ मांगना पड़ रहा है. ये अपने आप में हमारे देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर एक सवालिया निशान है. इसका सीधा अर्थ यही निकलता है कि देश में अब तक बनने वाली सरकारें मुसलमानों को उनका संवैधानिक अधिकार दिलाने में असफल रही हैं. देश के अंदर क्रिमिनल जस्टिस का यह हाल है कि पुलिस खुलेआम मानवीय अधिकारों की अवहेलना कर रही है और मुसलमानों को सबसे ज़्यादा परेशान कर रही है, लेकिन पुलिस के इन अत्याचारों पर रोक लगाने के लिए क़ानून कोई काम नहीं आ रहा है. वोट पाने की खातिर राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों को रिझाने के लिए बहुत से क़ानून बनाती हैं, लेकिन वे सरकारी अधिकारी जिन पर इस क़ानून को लागू करने की ज़िम्मेदारी है, वे या तो इसमें कोताही करते हैं, या फिर अल्पसंख्यकों ख़ासकर मुसलमानों के लिए जारी किए गए फंड को लूटने में लगे रहते हैं और उनको सज़ा नहीं होती. केंद्रीय सरकार की तऱफ से जब मुसलमानों के पिछड़ेपन का कारण जानने की कोशिश होती है और पता चलता है कि पिछले 60 सालों से सरकार की तऱफ से लगातार अनदेखी के कारण आज इस देश का मुसलमान जीवन के हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है, उसकी शिक्षा का कोई अच्छा प्रबंध नहीं है. हर जगह भेदभाव की वजह से उसे सरकारी या निजी संस्थाओं में नौकरी नहीं मिलती. अगर वह अपना कोई कारोबार करने की कोशिश करता है तो सांप्रदायिक दंगे कराकर आर्थिक तौर पर उसे पिछड़ा बना दिया जाता है. मुसलमान होने की वजह से उसे बैंकों से क़र्ज़ नहीं मिलता, अपनी बेटियों की शादी का खर्च सहन करने के लिए उसे अपने खेत तक बेचने पड़ते हैं.  इसलिए उसके पास अब कृषि लायक़ भूमि भी नहीं बची है, जहां से वह अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके और अब तरक्क़ी के सारे रास्ते बंद होने के बाद वह मेहनत मज़दूरी के कामों में लगा हुआ है, जहां उसकी ज़िंदगी दलितों से भी बदतर है. इन कारणों को जान लेने के बाद सरकारी स्तर पर मुसलमानों के शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए कुछ नीतियां बनाई जाती हैं. लेकिन चूंकि सत्ता पक्ष की नीयत साफ़ नहीं है, इसलिए काम कम किया जाता है और उसका ढिंढोरा ज़्यादा पीटा जाता है, ताकि मुसलामनों को बेवक़ू़फ बनाकर उनका वोट हासिल किया जा सके. ऐसे में भला मुसलमानों को दूसरे वर्गों के बराबर कैसे खड़ा किया जा सकता है और इक्कीसवीं शताब्दी में भारत सुपर पॉवर बनने के सपने को कैसे पूरा कर सकता है? यही वे सवाल और चिंताएं हैं, जिन पर सोच-विचार करने के लिए डॉ. मंज़ूर आलम की अध्यक्षता में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ ऑब्जेक्टिव स्टडीज़ यानी आईओएस पिछले 25 वर्षों से कार्यरत है. वैसे तो मुस्लिमों की समस्याओं पर चिंतन-मनन करने के लिए सैकड़ों मुस्लिम और ग़ैर मुस्लिम संस्थाएं काम कर रही हैं, लेकिन आईओएस की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह संस्था स़िर्फ मुसलमानों की बात नहीं करती, बल्कि देश में रहने वाली तमाम बिरादरियों में सौहार्द्र बनाए रखने की बात करती है और साथ ही उसकी यह भी कोशिश है कि मुसलमानों को इस बात के लिए कैसे तैयार किया जाए कि उन्हें इस देश से स़िर्फ लेना ही नहीं है, बल्कि बहुत कुछ देना भी है.
पिछले साल मार्च में आईओएस ने अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर लिए. इसे यादगार बनाने के लिए और सिल्वर जुबली के उपलक्ष्य में देश के अलग-अलग शहरों में 14 सेमिनार करवाए गए, जिनमें हर जाति, धर्म, संप्रदाय और वर्ग के पढ़े-लिखे लोगों ने भाग लिया. इसी प्रोग्राम के तहत 13 से 15 अप्रैल, 2012 तक दिल्ली के  कांस्टिट्यूशन क्लब में भी एक संगोष्ठी का इंतज़ाम किया गया, जिसमें बहुत से बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया. अपने-अपने क्षेत्रों के माहिर इन लोगों ने अल्पसंख्यकों के अधिकार और उनकी पहचान पर अपनी बात रखी और बताया कि तेज़ी से बदलती हुई दुनिया में उन्हें किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है और इसके लिए उन्हें कैसे तैयारी करनी है.
अल्पसंख्यकों के अधिकार और पहचान
वैश्विक परिदृश्य में चुनौतियां और संभावनाएं की थीम पर दिल्ली में होने वाली संगोष्ठी के उद्‌घाटन समारोह के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने कहा कि किसी भी देश में अल्पसंख्यकों को जब तक इत्मीनान न हो कि उनके साथ अच्छा बर्ताव होगा, उन्हें बराबरी की हिस्सेदारी मिलेगी और उनके साथ इंसा़फ होगा, तब तक कोई भी देश विकास की ओर अग्रसर नहीं हो सकता. जस्टिस सच्चर ने कहा कि हमारे सेकुलर ढांचे में आज ज़ंग लग चुका है, जिसकी बदतरीन मिसाल मेरठ के 1987 के दंगों में पीएसी द्वारा 41 बेगुनाह लोगों को मारकर नदी में बहा देना है. उन्होंने कहा कि इससे ज़्यादा दुखद बात क्या होगी कि 25 साल बीत जाने के बाद भी इस घटना केदोषियों को कोई सज़ा नहीं मिली है और पीड़ित परिवार इंसा़फ की तलाश में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के  पूर्व चीफ जस्टिस, एएम अहमदी ने कहा कि इस देश में विभिन्न धर्मों के मानने वालों के  दरम्यान सहनशीलता की बजाय सौहार्द्र की भावना को बढ़ावा देना चाहिए. अगर ऐसा हो गया तो देश का अल्पसंख्यक समाज खुद-ब-खुद आगे ब़ढेगा. साथ ही उन्हें इत्मीनान और चैन भी हासिल होगा. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन मार्कंडेय काटजू ने कहा कि आज़ाद भारत में सेकुलरिज्म को मुग़ल सम्राट अकबर के सुलह-ए-कुल के फलस़फे से परिभाषित किया गया है और शायद यही वजह थी कि भारत को हिंदू राष्ट्र का नहीं, बल्कि सेकुलर राष्ट्र का दर्जा मिला. केंद्रीय राज्य मंत्री हरीश रावत ने कहा कि हिंदुस्तान को एक सुपर पॉवर बनता हुआ देखने के लिए देश के ट्रेन रूपी हर डिब्बे को मज़बूत करना होगा और इस काम को करते समय अल्पसंख्यकों पर फोकस करना पड़ेगा, क्योंकि वे हर मैदान में पिछड़े हुए हैं. लेकिन उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि मुसलमानों के विकास के लिए जब केंद्रीय बजट से 65 करो़ड रुपये दिए जाते हैं तो उसका उपयोग न करके उसे वापस क्यों लौटा दिया जाता है?
नेशनल माइनॉरिटी कमीशन के चेयरमैन वज़ाहत हबीबुल्लाह ने बेक़सूर मुस्लिम युवाओं पर पुलिस द्वारा किए जा रहे अत्याचार और उनकी बेधड़क गिरफ़्तारी पर चिंता जताते हुए कहा कि यह बहुत बड़ी समस्या है और ऐसे अधिकारियों के खिला़फ कार्यवाही होनी चाहिए. आईओएस के चेयरमैन डॉ. मंज़ूर आलम और एडवोकेट सलार एम खान सहित वहां पर उपस्थित दूसरे बुद्धिजीवियों ने भी इस पर सहमति जताई. इस सिलसिले में डॉ. मंज़ूर आलम ने दलितों का हवाला देते हुए कहा कि दलितों की स्थिति मुसलमानों से बेहतर हुई है, लेकिन उनकी लाचारी में कोई कमी नहीं आई है, क्योंकि दलितों का खून उत्तर प्रदेश में लगातार बहाया जाता रहा है, और खुद मायावती सरकार में भी दलित सुरक्षित नहीं थे. इस प्रकार देखा जाए तो दलित खुद मुसलमानों, सिक्खों, ईसाइयों और उन आदिवासियों की तरह हैं, जिनकी सुरक्षा में देश या तो नाकाम रहा है या फिर देश ने उन्हें सुरक्षा प्रदान करने से मना कर दिया है. राज्यसभा के उप सभापति के. रहमान खान ने कहा कि मुस्लिम समाज आज अलग-अलग टुकड़ों में विभाजित है और उसे खुद पता नहीं है कि उसे सरकार और संविधान से कौन से अधिकार प्राप्त करने हैं और न ही उसके पास आगे के लिए कोई रोड मैप है. इसलिए अभी मुसलमानों को अच्छी तरह से अपना होम वर्क करने की ज़रूरत है.
इस कांफ्रेंस में विभिन्न धर्मों के धर्म गुरुओं ने भी भाग लिया, जिनमें ईसाई धर्मगुरु फादर डोमनिक इमानुएल, सिक्ख धर्मगुरु डॉ. महेंदर सिंह, हिंदू धर्मगुरु स्वामी ओमकरानंद सरस्वती और बुद्ध धर्मगुरु जेशे दुर्जी दमदल के नाम प्रमुख हैं.

समाज को आईना दिखाती रिपोर्ट


हाल में यूनीसेफ द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में 22 फीसदी लड़कियां कम उम्र में ही मां बन जाती हैं और 43 फीसदी पांच साल से कम उम्र के बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकतर बच्चे कमज़ोर और एनीमिया से ग्रसित हैं. इन क्षेत्रों के 48 प्रतिशत बच्चों का वज़न उनकी उम्र के अनुपात में बहुत कम है. यूनिसेफ द्वारा चिल्ड्रन इन अर्बन वर्ल्ड नाम से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी ग़रीबों में यह आंकड़ा और भी चिंताजनक है, जहां गंभीर बीमारियों का स्तर गांव की तुलना में अधिक है. रिपोर्ट के अनुसार शहरों में रहने वालों की संख्या तक़रीबन 37 करोड़ है. इनमें अधिकतर संख्या गांव से पलायन करने वालों की है. इन शहरों में हर तीन में से एक व्यक्ति नाले अथवा रेलवे लाइन के किनारे रहता है.
देश के बड़े शहरों में कुल मिलाकर क़रीब पचास हज़ार ऐसी बस्तियां हैं, जहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है. ऐसी बस्तियों में रहने वाले बच्चों में बीमारियां अधिक होती हैं, क्योंकि न तो उन्हें उचित वातावरण मिल पाता है और न ही सही ढंग से इनका लालन-पालन होता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में कम उम्र के बच्चों की मौतों में 20 प्रतिशत भारत में होती है और इनमें सबसे अधिक अल्पसंख्यक तथा दलित समुदाय प्रभावित हैं. रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि सरकार ने जिस तरह से ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के लिए योजनाएं चला रखी हैं, वैसी ही योजनाएं शहरों में रहने वाले ग़रीब बच्चों के लिए भी शुरू की जानी चाहिए. दुनिया भर में बच्चों के विकास के लिए कार्य करने वाली इस संस्था ने अपनी रिपोर्ट के माध्यम से भारतीय समाज को आईना दिखाने का प्रयास किया है, जो सराहनीय है.
हिंदुस्तान सदियों से एक ऐसा देश रहा है, जो अपनी सांस्कृतिक विरासत और उन्नत सामाजिक चेतना के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, जहां महिलाओं और बच्चों को भगवान का दर्जा दिया जाता है. ऐसे में यदि यूनिसेफ हमें यह आईना दिखाता है तो यूं ही नहीं बल्कि इसके पीछे कुछ न कुछ वास्तविकता होगी. जिस देश में आज भी नारी की देवी के रूप में पूजा की जाती है, उसी देश की राजधानी में बलात्कार, अत्याचार और खुलेआम सेक्स के बाज़ार चलाए जाते हैं. शायद ही कोई ऐसा दिन होता है, जब समाचार पत्रों में किसी महिला के साथ गैंगरेप या शोषण की कोई खबर प्रकाशित नहीं होती है. जब देश की राजधानी का यह हाल है तो छोटे शहरों और क़स्बों की स्थिति क्या होती होगी, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है. क्योंकि इन सभी जगहों पर या तो मीडिया की पहुंच नहीं होती है अथवा समाज में बदनामी के डर से लोग मामले पर चुप्पी साध लेते हैं. यदि किसी ने हिम्मत दिखाकर शोषण और अत्याचार के खिला़फ आवाज़ बुलंद करने की कोशिश की और थाने में रिपोर्ट लिखानी चाही तो थानेदार साहब अपनी रिपोटेशन बचाने के लिए एफआईआर दर्ज करने से बचने की कोशिश करते हैं. कभी-कभी स्वयं अभिभावक सामाजिक प्रतिष्ठता के नाम पर अपनी बेटी को मार डालने से भी नहीं हिचकते हैं. इसकी ताज़ा मिसाल हाल में घटित हुई मेरठ की घटना है, जहां पिछले माह राजमिस्त्री का काम करने वाले एक पिता ने अपनी दो जवान बेटियों की गर्दन रेत कर स़िर्फ इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि उसे इन दोनों के चाल-चलन पर शक था और इसके कारण उसे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठता गिरती नज़र आ रही थी. अपनी इस करतूत पर उसे ज़रा भी अ़फसोस नहीं था. दिल्ली से सटे हरियाणा में आए दिन खाप पंचायत के फैसले नारी शोषण की कहानी बयां करते हैं, जहां ज़बरदस्ती पति-पत्नी को भाई-बहन साबित कर दिया जाता है.
यदि देश के नौनिहालों विशेषकर जन्म लेनी वाली बच्चियों की बात करें तो आज भी हमारा समाज लड़कियों के मुक़ाबले लड़कों को तरजीह देता है. दिल्ली की फलक और बंगलुरू की आ़फरीन इसकी मिसाल है, जिन्होंने ज़िंदगी की परिभाषा को समझने से पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह दिया. दोनों का क़सूर सिर्फ इतना था कि वे लड़कियां थीं. फलक को उसकी मां पर पिता द्वारा किए गए ज़ुल्म और फिर महिला व्यापार का धंधा चलाने वालों ने मौत के मुंह तक धकेला, तो वहीं तीन माह की आ़फरीन को स्वयं उसके पिता ने पटक-पटक कर स़िर्फ इसलिए मार डाला, क्योंकि उसे लड़की नहीं लड़का चाहिए था. दूसरा उदाहरण बिहार के दरभंगा शहर का है, जहां एक नामी अस्पताल के बग़ल के कूड़ेदान में एक नवजात बच्ची को फेंक दिया गया और कुत्ते उसे नोंच-नोंच कर खा गए. इस दौरान किसी ने भी पुलिस को बुलाने का कष्ट नहीं किया और न ही यह खबर मीडिया में बहस का विषय बनी, क्योंकि मामला दिल्ली अथवा इसके आसपास घटित नहीं हुआ था. शायद समाज को भी इस प्रकार की आदत सी हो गई है, जो इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने की जगह इसे दिनचर्या मान चुका है.
ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जो यह साबित करते हैं कि यहां कथनी और करनी में एक बड़ा अंतर है. हम नारी को देवी के रूप में सम्मान देने की बात तो करते हैं, परंतु उसे समान दर्जा नहीं देना चाहते हैं. हम बच्चों को भगवान का रूप तो मानते हैं, परंतु उनका ख्याल नहीं रखना चाहते हैं. यूनिसेफ की रिपोर्ट हमें कहीं न कहीं इसका आईना ही दिखाती है. इतनी सारी योजनाएं चलाई जा रही हैं. इसके बावजूद कुपोषित बच्चों के प्रतिशत में संतोषजनक गिरावट क्यों नहीं आ रही है? जब हमारे देश में बाल विवाह क़ानून लागू है, फिर कैसे बच्चियों की कम उम्र में शादी कर दी जाती है? यह सवाल भी हमारे बीच से उठा है तो जवाब भी हमारे बीच मौजूद है. शायद इसका सीधा जवाब यही है कि जब तक समाज जागरूक नहीं होगा, तब तक इस तरह के आंकड़े हमें शर्मिंदा करते रहेंगे.

महात्मा गांधी और सरदार पटेल की धर्मनिर्पेक्षता एक थी


आरएसएस और बीजेपी ने अपने फायदे के लिए देशभर में यह भ्रम फैला रखा है कि सरदार पटेल उन्हीं की तरह हिन्दूवादी थे. आरएसएस ने यह भ्रम तबसे फैलाना शुरू किया जबसे बाबरी मस्जिद विध्वंस को आरएसएस ने अपने एजेण्डे पर ले लिया था. लेकिन क्या सरदार वल्लभ भाई पटेल उसी तरह के हिन्दूवादी थे जैसे आरएसएस के लोग हैं. नहीं. यह निरा झूठ है. सरदार पटेल बहुत धर्मनिर्पेक्ष व्यक्ति थे. मधु लिमये ने "सरदार पटेल: सुव्यवस्थित राज्य के प्रणेता" में बताया है कि सरदार पटेल कैसे धर्मनिर्पेक्ष और समाजवादी विचारधारा के पैरोकार थे. मधु लिमय के जन्मदिन 1 मई पर शेष नारायण सिंह की खोजबीन-
मधु लिमये होते तो ९० साल के हो गए होते. मुझे मधु जी के करीब आने का मौक़ा १९७७ में मिला था जब वे लोकसभा के लिए चुनकर दिल्ली आये थे. लेकिन उसके बाद दुआ सलाम तो होती रही लेकिन अपनी रोजी रोटी की लड़ाई में मैं बहुत व्यस्त हो गया. जब आरएसएस ने बाबरी मस्जिद के मामले को गरमाया तो पता नहीं कब मधु जी से मिलना जुलना लगभग रोज़ ही का सिलसिला बन गया. इन दिनों वे सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुके थे और लगभग पूरा समय लिखने में लगा रहे थे.
बाबरी मस्जिद के बारे में आरएसएस और बीजेपी वाले उन दिनों सरदार पटेल के हवाले से अपनी बात कहते पाए जाते थे. हम लोग भी दबे रहते थे क्योंकि सरदार पटेल को कांग्रेसियों का एक वर्ग भी हिन्दूवादी बताने की कोशिश करता रहता था. उन्हीं दिनों मधु लिमये ने मुझे बताया था कि सरदार पटेल किसी भी तरह से हिन्दू साम्प्रदायिक नहीं थे. दिसंबर १९४९ में फैजाबाद के तत्कालीन कलेक्टर केके नायर की साज़िश के बाद बाबरी मस्जिद में भगवान् राम की मूर्तियाँ रख दी गयी थीं. केंद्र सरकार बहुत चिंतित थी. ९ जनवरी १९५० के दिन देश के गृहमंत्री ने रूप में सरदार पटेल ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पन्त को लिखा था. पत्र में साफ़ लिखा है कि "मैं समझता हूँ कि इस मामले दोनों सम्प्रदायों के बीच आपसी समझदारी से हल किया जाना चाहिए. इस तरह के मामलों में शक्ति के प्रयोग का कोई सवाल नहीं पैदा होता. मुझे यकीन है कि इस मामले को इतना गंभीर मामला नहीं बनने देना चाहिए और वर्तमान अनुचित विवादों को शान्ति पूर्ण तरीकों से सुलझाया जाना चाहिए."

मधु जी ने बताया कि सरदार पटेल इतने व्यावहारिक थे कि उन्होने मामले के भावनात्मक आयामों को समझा और इसमें मुसलमानों की सहमति प्राप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया. उसी दौर में मधु लिमये ने बताया था कि बीजेपी किसी भी हालत में सरदार पटेल को जवाहर लाल नेहरू का विरोधी नहीं साबित कर सकती क्योंकि महात्मा जी से सरदार की जो अंतिम बात हुई थी उसमें उन्होंने साफ़ कह दिया था कि जवाहर लाल से मिल जुल कर काम करना है. सरदार पटेल ने महात्मा जी की अंतिम इच्छा को हमेशा ही सम्मान दिया.

मधु लिमये हर बार कहा करते थे कि भारत की आज़ादी की लड़ाई जिन मूल्यों पर लड़ी गयी थी, उनमें धर्म निरपेक्षता एक अहम मूल्य था. धर्मनिरपेक्षता  भारत के संविधान का स्थायी भाव है, उसकी मुख्यधारा है. धर्मनिरपेक्ष राजनीति किसी के खिलाफ कोई नकारात्मक प्रक्रिया नहीं है। वह एक सकारात्मक गतिविधि है। मौजूदा राजनेताओं को इस बात पर विचार करना पड़ेगा और धर्मनिरपेक्षता को सत्ता में बने रहने की रणनीति के तौर पर नहीं राष्ट्र निर्माण और संविधान की सर्वोच्चता के जरूरी हथियार के रूप में संचालित करना पड़ेगा। क्योंकि आज भी धर्मनिरपेक्षता का मूल तत्व वही है जो 1909 में महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज में लिख दिया था..

धर्मनिरपेक्ष होना हमारे गणतंत्र के लिए बहुत ज़रूरी है. इस देश में जो भी संविधान की शपथ लेकर सरकारी पदों पर बैठता है वह स्वीकार करता है कि भारत के संविधान की हर बात उसे मंज़ूर है यानी उसके पास धर्मनिरपेक्षता छोड़ देने का विकल्प नहीं रह जाता. जहां तक आजादी की लड़ाई का सवाल है उसका तो उद्देश्य ही धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय का राज कायम करना था। महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज' में पहली बार देश की आजादी के सवाल को हिंदू-मुस्लिम एकता से जोड़ा है। गांधी जी एक महान कम्युनिकेटर थे, जटिल सी जटिल बात को बहुत साधारण तरीके से कह देते थे। हिंद स्वराज में उन्होंने लिखा है - ''अगर हिंदू माने कि सारा हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं से भरा होना चाहिए, तो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें, तो उसे भी सपना ही समझिए। फिर भी हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं, एक देशी, एक-मुल्की हैं, वे देशी-भाई हैं और उन्हें एक -दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा."

महात्मा जी ने अपनी बात कह दी और इसी सोच की बुनियाद पर उन्होंने 1920 के आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम एकता की जो मिसाल प्रस्तुत की, उससे अंग्रेजी राज्य की चूलें हिल गईं। आज़ादी की पूरी लड़ाई में महात्मा गांधी ने धर्मनिरपेक्षता की इसी धारा को आगे बढ़ाया। शौकत अली, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और जवाहरलाल नेहरू ने इस सोच को आजादी की लड़ाई का स्थाई भाव बनाया।लेकिन अंग्रेज़ी सरकार हिंदू मुस्लिम एकता को किसी कीमत पर कायम नहीं होने देना चाहती थी . महात्मा गाँधी के दो बहुत बड़े अनुयायी जवाहर लाल नेहरू और  कांग्रेस के दूसरे बड़े नेता, सरदार वल्लभ भाई पटेल ने धर्मनिरपेक्षता को इस देश के मिजाज़ से बिलकुल मिलाकर राष्ट्र की बुनियाद रखी.

मधु जी बताया करते थे कि कांग्रेसियों के ही एक वर्ग ने सरदार को हिंदू संप्रदायवादी साबित करने की कई बार कोशिश की लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। भारत सरकार के गृहमंत्री सरदार पटेल ने 16 दिसंबर 1948 को घोषित किया कि सरकार भारत को ''सही अर्थों में धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाने के लिए कृत संकल्प है।" (हिंदुस्तान टाइम्स - 17-12-1948)। सरदार पटेल को इतिहास मुसलमानों के एक रक्षक के रूप में भी याद रखेगा। सितंबर 1947 में सरदार को पता लगा कि अमृतसर से गुजरने वाले मुसलमानों के काफिले पर वहां के सिख हमला करने वाले हैं। सरदार पटेल अमृतसर गए और वहां करीब दो लाख लोगों की भीड़ जमा हो गई जिनके रिश्तेदारों को पश्चिमी पंजाब में मार डाला गया था। उनके साथ पूरा सरकारी अमला था और उनकी बहन भी थीं। भीड़ बदले के लिए तड़प रही थी और कांग्रेस से नाराज थी। सरदार ने इस भीड़ को संबोधित किया और कहा, ''इसी शहर के जलियांवाला बाग की माटी में आज़ादी हासिल करने के लिए हिंदुओं, सिखों और मुसलमानों का खून एक दूसरे से मिला था। मैं आपके पास एक ख़ास अपील लेकर आया हूं। इस शहर से गुजर रहे मुस्लिम शरणार्थियों की सुरक्षा का जिम्मा लीजिए. एक हफ्ते तक अपने हाथ बांधे रहिए और देखिए क्या होता है। मुस्लिम शरणार्थियों को सुरक्षा दीजिए और अपने लोगों की डयूटी लगाइए कि वे उन्हें सीमा तक पहुंचा कर आएं।"

सरदार पटेल की इस अपील के बाद पंजाब में हिंसा नहीं हुई। कहीं किसी शरणार्थी पर हमला नहीं हुआ। कांग्रेस के दूसरे नेता जवाहरलाल नेहरू थे। उनकी धर्मनिरपेक्षता की कहानियां चारों तरफ सुनी जा सकती हैं। उन्होंने लोकतंत्र की जो संस्थाएं विकसित कीं, सभी में सामाजिक बराबरी और सामाजिक सद्भाव की बातें विद्यमान रहती थीं। प्रेस से उनके रिश्ते हमेशा अच्छे रहे इसलिए उनके धर्मनिरपेक्ष चिंतन को सभी जानते हैं और उस पर कभी कोई सवाल नहीं उठता.
बाद में इन चर्चाओं के दौरान हुई बहुत सारी बातों को मधु लिमये ने अपनी किताब ,"सरदार पटेल: सुव्यवस्थित राज्य के प्रणेता" में विस्तार से लिखी भी हैं. १९९४ में जब मैंने इस किताब की समीक्षा लिखी तो मधु जी बहुत खुश हुए थे और उन्होंने संसद के पुस्तकालय से मेरे लेख की फोटोकापी लाकर मुझे दी और कहा कि सरदार पटेल के बारे के जो लेख तुमने लिखा है वह बहुत अच्छा है.

लोग गिरते रहे और बिहार पुलिस गोली चलाती रही


लोग गिरते रहे और बिहार पुलिस गोली चलाती रही
औरंगाबाद में सुशासनी पुलिस ने जालियांवाला बाग कांड को दुहराया। निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलायी। लोग गिरते रहे और पुलिस गोली चलाती रही। इस पर तुर्रा यह कि इस घटना में कितने लोग मारे गये या फ़िर कितने लोग गंभीर रुप से घायल हुए “न्याय के साथ विकास” करने का दावा करने वाली सरकार के पास नहीं है।

घटना के संबंध में मिली जानकारी के अनुसार अभी हाल ही में रणवीर सेना ने एक बार फ़िर अपनी उपस्थिति का अहसास दिलाते हुए धीरेंद्र महतो नामक एक मुखिया को मौत के घाट उतार दिया। इस घटना के विरोध में औरंगाबाद में तमाम विपक्षी पार्टियों ने सामूहिक रुप रणवीर सेना की बढती सक्रियता और प्रशासन की चुप्पी के विरोध में धरना का आयोजन किया। धरना का कार्यक्रम शांतिपूर्व्क चल रहा था। इस बीच पुलिस ने धरना दे रहे लोगों को सड़क खाली करने को कहा। लोग नहीं माने और वे सरकार के खिलाफ़ नारे लगाने लगे। पुलिस ने आपा खोते हुए धरना दे रहे लोगों को अलग-थलग करने के लिये रबर की गोलियां बरसाना शुर कर दिया। लोग चोट खाते रहे और फ़िर भी डटे रहे। पुलिस ने फ़ायरिंग करना शुरु कर दिया। लोग इधर-उधर भागने लगे और दर्जनों लोगों को गोलियां लगीं।

निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाने के बाद पुलिस ने धरना में शामिल लोगों को गिरफ़्तार करना शुरु किया और उसने करीब 23 लोगों को गिरफ़्तार किया। गिरफ़्तार किये गये लोगों में भाकपा(माले) के पूर्व विधायक राजा राम सिंह भी शामिल हैं। घटना के संबंध में भाकपा माले नेता संतोष सहर ने अपना बिहार को दूरभाष पर जानकारी देते हुए बताया कि बिहार सरकार की यह कार्रवाई जनआंदोलनों को जबरदस्ती कुचलने की नीति का सजीव प्रमाण है। जबकि इस संबंध में जब अपना बिहार ने औरंगाबाद के एसपी से फ़ोन पर जानना चाहा तब उन्होंने कहा कि घटना के पुलिस द्वारा की गयी कार्रवाई के बारे में वे स्थानीय मीडिया को बता चुके हैं और अब वे किसी भी अन्य मीडिया संस्थान को कोई जानकारी नहीं देंगे।

उधर सासाराम और डेहरी में बम विस्फ़ोट की जानकारी मिली है। हालांकि अभी तक यह पता नहीं चल सका है कि बम विस्फ़ोट किसने किया। इस संबंध में जब अपना बिहार ने रोहतास एसपी से पूछा तो उन्होंने बताया कि सासाराम में पटाखे की दूकान में आग लगी गई थी। जब अपना बिहार ने घटना के बाद पुलिस द्वारा की गयी कार्रवाई के बारे में जानना चाहा तो रोहतास जिले के एसपी ने अपना सरकारी मोबाइल स्वीच आफ़ कर दिया।

बहरहाल, औरंगाबाद और रोहतास में घटित इन घटनाओं ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि इन इलाकों में रणवीर सेना एक बार फ़िर से अपना खोया गौरव हासिल करना चाहती है और बिहार पुलिस को इससे कोई गुरेज नहीं है। औरंगाबाद में जालियांवाला बाग कांड की पुनरावृति कर इसका प्रमाण तो दे ही दिया गया है।

आ केहू खराब नइखे, सबे ठीक बा...


nitish-kumar
जब भी किसी राज्य की सरकार बदलती है, समाज की आबोहवा करवट लेती है। भले ही इस करवट से कांटे चुभे या मखमली गद्दे सा अहसास हो, परिर्वतन स्वाभाविक है। बिहार में नीतीश से पहले राजद का शासन था। जब लालू प्रसाद का शासनकाल आया था तब भी कमोबेश वैसे ही सकारात्मक बदलाव की सुगबुगाहट थी, जैसे नीतीश कुमार की सत्ता में आने पर हुई।

लालू के पहले चरण के शासनकाल में दबी-कुचली पिछड़ी जाति का आत्मविश्वास बढ़ा। उन्हें एहसास हुआ कि वे भी शासकों की जमात में शामिल हो सकते हैं, लेकिन धीरे-धीरे लालू के शासन से लोग बोर होने लगे। प्रदेश की विकास की रफ्तार जड़ हो गई। लोग उबने लगे। नई तकनीक से देश-दुनिया में बदलाव का दौर चला। बिहार की जड़ मनोदशा में भी बदलने की सुगबुगाहट हुई। जनता ने रंग दिखाया। राजद की सत्ता उखाड़कर नीतीश को कमान सौंपी।

नीतीश के पहले दौर के शासन और अब के माहौल में खासा अंतर है। विकास की तेज रफ्तार पकड़ कर देश दुनिया में नया कीर्तिमान रचने वाले राज्य की वर्तमान हालात जानने के लिए अप्रैल माह के अंतिम सप्ताह में घटित कुछ घटनाओं को देखिये।

गोपालगंज जिले के जादोपुर थाना क्षेत्र के बगहां गांव में पूर्व से चल रहे भूमि विवाद को लेकर कुछ लोगों ने एक अधेड़ की पीटकर हत्या कर दी। एक अन्य घटना में गोपालगंज जिले के ही हथुआ थाना क्षेत्र के जुड़ौनी नाम की जगह पर एक छात्र को रौंदने वाले जीपचालक को भीड़ ने मार-मार कर अधमरा कर दिया। जीप में आग लगा दी। अधमरे जीप चालक के हाथ-पांव बांधकर जलती जीप में फेंक दिया। तड़पते चालक ने आग से निकल कर भागने की कोशिश की तो भीड़ ने फिर उसे दुबारा आग में फेंक दिया। एक तीसरी घटना देखिये-गोपालगंज के ही प्रसिद्ध थावे दुर्गा मंदिर परिसर में आयोजित पारिवारिक कार्यक्रम में भाग लेने आई एक महिला का उसके दो मासूम बच्चों के साथ अपहरण कर लिया गया।

जिस तरह चावल के एक दाने से पूरे भात के पकने का अनुमान लगाया जा सकता है, उसी तरह से बिहार के एक जिले की इन घटनाओं से 'सुशासन' में प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खुल जाती है। बिहार पर केन्द्रित 'अपना बिहार' नामक समाचार वेबसाइट पर प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार 25 अप्रैल को विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार के अनुसार अलग-अलग घटनाओं में कुल 19 हत्या, 29 लूट और चोरी और दो बलात्कार की घटनाएं हुर्इं। जरा गौर करें, जिस समाज में एक ही दिन में 19 हत्या हो, भीड़ कानून को हाथ में लेकर एक व्यक्ति के हाथ-पांव बांध कर जिंदा आगे के हवाले कर दे, संपत्ति के लिए अधेड़ को पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दे, क्या ये मजबूत होते 'सुशासन' के लक्षण हैं।

सुनियोजित और संगठित आपराधिक कांडों के आंकड़े भले ही बिहार में कम हुए हैं, लेकिन आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने वाली क्रूरता जनमानस से निकली नहीं है। इन दिनों सबसे ज्यादा पचड़े किसी न किसी तरह से संपत्ति मामले को लेकर हैं।

लालू राज में बिहार की बदतर सड़कें कुशासन की गवाह होती थीं। अब यही सड़कें नीतीश के विकास की गाधा गाती हैं। इन सड़कों को रौंदने के लिए ढेरों नये वाहन उतर आए। आटो इंडस्ट्री को चोखा मुनाफा हुआ। सरकार की झोली में राजस्व भी आया, लेकिन सड़कों पर रौंदने वाले वाहनों के अनुशासन पर नियंत्रण कहां है। जितनी तेजी से सड़कें बनी हैं नीतीश के शासन में, उतनी ही तेजी से सड़क दुर्घटनाएं बढ़ीं हैं।

बिजली की समस्या बिहार के लिए सदाबहार रही। नीतीश के सुशासन में टुकड़ों-टुकड़ों में 6-8 घंटे जल्दी बिजली राहत तो देती है, लेकिन अभी यह बिजली किसी उद्योग को शुरू करने का भरोसे लायक विश्वास नहीं जगाती। विज्ञापन और सत्ता से अन्य लाभ के लालच में भले ही बिहार का मीडिया नीतीश के यशोगान में लगा है, लेकिन गांव के अनुभवी अनपढ़ बुजुर्गों से नीतीश और लालू के राज की तुलना में कौन अच्छा है, पूछने पर चतुराई भरा जवाब मिलता है- ...आ केहू खराब नइखे, सबे ठीक बा...।

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