Sunday, February 03, 2013

मैं खान हूं।



मैं कलाकार हूं। वक्त मेरे दिन को तय नहीं करता, जितनी दृढ़ता से छवियां करती हैं। छवियां मेरे जीवन पर राज करती हैं। घटनायें और यादें तस्वीर के रूप में खुद मेरे जेहन में अंकित हो जाती हैं। मेरी कला का मूल है- छवियां गढ़ने की क्षमता, जो देखनेवाले की भावनात्मक छवि के साथ मिल जाती है।
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मैं खान हूं। यह नाम ही मेरे जेहन में खुद कई प्रकार की छवियां उभारता है। जैसे घोड़े पर बैठा एक आदमी। सिर पर पगड़ी के नीचे से उसके बाल लहरा रहे हैं। एक सांचे में गढ़ दिया गया कट्टरपंथी। जो न नाचता है, न शराब पीता है, न ईशनिंदा करता है। शांत मोहक चेहरा। लेकिन जिसके अंदर हिंसक पागलपन सुलग रहा है। एक ऐसा पागलपन जो उसे ईश्वर के नाम पर खुद को खत्म कर देने को प्रेरित कर सकता है। तभी मेरे जेहन में अमेरिकी एयरपोर्ट के पीछे बने कमरे में मुझे ले जाने की तस्वीर उभरती है। कुछ कपड़े उतारना, जांच करना और बाद में कई सवाल। मुझे कुछ इस तरह का तर्क दिया गया कि आपका नाम हमारे सिस्टम में आ रहा है, इसके लिए माफी। फिर मेरे जेहन में अपने देश में खुद की छवि उभरती है। वहां मुझे मेगास्टार कहा जाता है। प्रशंसक प्यार और गर्व से मेरी प्रशंसा करते हैं।

मैं खान हूं। मैं कह सकता हूं कि इन सभी छवियों में मैं फिट हूं। सीमित ज्ञान और पहले से ज्ञात मानकों के आधार पर हम घटना, चीज और लोगों की परिभाषा तय करने में राहत महसूस करते हैं। इन परिभाषाओं से स्वाभाविक तौर पर उपजी संभावनाएं हमें अपनी सीमाओं के दायरे में सुरक्षित होने का आभास देती हैं। हम खुद-ब-खुद छवि का एक छोटा बक्सा बनाते हंै। ऐसा ही एक बक्सा मौजूदा समय में अपने ढक्कन को कस रहा है।

इसी बक्से में लाखों लोगों के जेहन में मेरे धर्म की छवि है। मेरे देश में मुस्लिम समाज को जब भी अपना पक्ष रखने की जरूरत होती है, मेरा सामना इससे होता है। जब कभी इस्लाम के नाम पर हिंसा की घटना होती है, मुझे मुसलिम होने के नाते इसकी भत्र्सना करने के लिए बुलाया जाता है। अपने समाज का प्रतिनिधित्व करने के लिए मुझे एक आवाज के तौर पर चुना जाता है, ताकि दूसरे समाज को प्रतिक्रिया देने से रोका जा सके।

मैं कभी-कभार, जाने-अनजाने कुछ राजनेताओं द्वारा भारत में मुस्लिमों की देशभक्ति पर संदेह और अन्य दूसरी गलतियों का एक प्रतीक बनाने के लिए चुन लिया जाता हूं। ऐसे भी मौके आये जब मुझ पर अपने देश की बजाय पड़ोसी मुल्क के प्रति वफादार होने का आरोप लगाया गया। हालांकि मैं भारतीय हूं और मेरे पिता ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी।

मैंने अपने बेटे और बेटी का अखिल भारतीय और अखिल धार्मिक नाम रखा। आर्यन और सुहाना। खान विरासत में मेरे द्वारा दिया गया है और वे इससे बच नहीं सकते। कभी-कभार वे पूछते हैं कि उनका धर्म क्या है और मैं दार्शनिक अंदाज में उनसे कहता हूं कि आप पहले भारतीय हैं और आपका धर्म मानवता है या पुराना गाना कि ‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा- इंसान की औलाद है इंसान बनेगा’। अमेरिकी जमीन पर जहां मुझे कई बार सम्मानित करने के लिए बुलाया गया, मेरे जेहन में कई विचार उभरे, जो एक खास संदर्भ में होते थे। एयरपोर्ट पर रोकने की घटना मेरे साथ कई बार हो चुकी है।

आतंकवादियों के आखिरी नाम से मेरा नाम मिलने के कारण अपनी गलत पहचान से मैं इतना परेशान हो गया कि मैंने ‘माय नेम इज खान’ फिल्म बनायी ताकि अपनी बात साबित कर सकूं। मेरे आखिरी नाम को लेकर अमेरिकी एयरपोर्ट पर मुझसे घंटों पूछताछ की गयी। कभी-कभार मैं सोचता हूं कि क्या ऐसा ही सलूक सभी के साथ होता होगा, जिसका आखिरी नाम मैकवे या टिमोथी हो?

मैं किसी की भावनाओं को चोट नहीं पहुंचाना चाहता। लेकिन, सच कहा जाना चाहिए। हमलावर और जिंदगी छीननेवाले अपने दिमाग का अनुसरण करते हैं। इसका किसी के नाम, उसके स्थान, उसके मजहब से कोई लेना-देना नहीं होता है।

मुझे मेरे धर्म की शिक्षा पेशावर के एक खूबसूरत पठान ‘पापा’ ने दी। जहां उनके और मेरे परिवार के लोग आज भी रहते हैं। वे अहिंसक पठान आंदोलन ‘खुदाई खिदमतगार’ के सदस्य रहे थे और खान अब्दुल गफ्फार खान और गांधीजी दोनों के ही अनुयायी थे। उनसे मैंने इसलाम की जो पहली सीख ली वह थी औरतों और बच्चों का सम्मान करना और हर इंसान की गरिमा को बनाये रखना।

मैंने सीखा कि दूसरों के गुण, उनकी मर्यादा, उनकी दृष्टि, उनके विश्वास और दर्शन का उसी तरह सम्मान करना चाहिए, जिस तरह से मैं अपना करता हूं और उन्हें खुले दिल से स्वीकार किया जाना चाहिए। मैंने अल्लाह की शक्ति और दयालुता पर यकीन करना सीखा। साथ ही इंसानों के साथ सौम्य और दयालु होना भी। हां, तो मैं एक खान हूं। लेकिन मुझमें मेरे अपने अस्तित्व को लेकर कोई बनी-बनायी धारणा नहीं है। मुझे लाखों-लाख भारतीयों की मोहब्बत मिली है। पिछले बीस वर्षों से मुझे यह स्नेह मिल रहा है, इस तथ्य के बावजूद कि मैं अल्पसंख्यक समुदाय से हूं। मुझे राष्ट्रीय और सांस्कृतिक सरहदों के आर-पार लोगों की बेपनाह मोहब्बत मिली है। मेरे जीवन ने मुझमें यह गहरी समझ पैदा की है कि प्यार आपसदारी का मामला है। विचार की संकीर्णता इसके आड़े नहीं आती।

अपने सुपरस्टारडम के नीचे मैं एक साधारण इंसान हूं। मेरे मुसलमान होने का मेरी पत्नी के हिंदू होने से किसी किस्म का संघर्ष नहीं होता। हमारी एक बेटी है, जो घिरनी की तरह नाचती है और अपने नृत्य की खुद कोरियोग्राफी करती है। वह पश्चिमी गाने गाती है, जो मेरी समझ में नहीं आते। वह एक अदाकारा बनना चाहती है। किसी मुस्लिम देश में जहां सिर को ढकने की खूबसूरत, लेकिन अक्सर गलत समझी जानेवाली प्रथा का पालन किया जाता है, वह भी अपने सिर को ढंकने की जिद करती है।

मेरा मानना है कि हमारा धर्म नितांत व्यक्तिगत चयन का मामला है। न कि उसे सामाजिक रूप से अपनी पहचान के तौर पर घोषित करने का। आखिर क्यों न वह प्रेम जिसे हम साझा करते हैं, वही हमारी पहचान का आधार बने, बनिस्बत कि हमारे नाम के आखिरी हिस्से के। प्रेम देने के लिए किसी का सुपरस्टार होना जरूरी नहीं है। इसके लिए सिर्फ एक दिल होना चाहिए। और जहां तक मैं जानता हूं दुनिया में ऐसी कोई शक्ति नहीं है, जो किसी को दिल से वंचित कर सके।

मैं एक खान हूं। और इसका मतलब सिर्फ ऐसा इंसान होने से ही है। भले ही मेरे इर्द-गिर्द एक बनी-बनायी छवि खड़ी कर दी गयी हो। एक खान होने का मतलब सिर्फ यही है कि प्रेम पाओ और बदले में प्रेम दो।

(‘आउटलुकः टर्निग प्वाइंट, द ग्लोबल एजेंडा 2013’ में छपे शाहरुख खान के लेख का अंश। इस लेख को आधार बना कर पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने 28 जनवरी को आपत्तिजनक टिप्पणी की थी और फिर दोनों देशों की ओर से जो बयानबाजी हुई उसके बाद आपसी रिश्ते और तल्ख हो गये।)

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