Saturday, November 02, 2013

अल्पसंख्यक मंत्रालय को बंद कर देना चाहिए


vxvcvsकिसी देश की नीतियों को वहां की सरकार और उसके मंत्रालय ही लागू करते हैं. भारत में भी ऐसा ही होता है, लेकिन अगर कोई मंत्रालय सशक्त न हो और काम भी न करे, तो क्या करना चाहिए? इसका सीधा जवाब तो यही है कि ऐसे मंत्रालय को बंद कर देना चाहिए. कुछ ऐसा ही हाल है भारत के अल्पसंख्यक मंत्रालय का, जिसके ऊपर शुरू से ही इस प्रकार के आरोप लगते रहे हैं कि इसने सरकार की अधिकतर नीतियों को लागू नहीं किया है.  अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री के रहमान ख़ान यूपीए सरकार के सबसे बेबस मंत्री के रूप में उभरकर सामने आए हैं. उन्होंने भारत के अल्पसंख्यकों के कल्याण को लेकर झूठ बोलने के अलावा अब तक कोई काम नहीं किया है. यही कारण है कि अब आम जनों और विद्बानों की ओर से ऐसा कहा जा रहा है कि अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को बंद कर दिया जाना चाहिए.
मौजूदा दौर में दुनिया भर में धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यकों को विशेष संरक्षण प्राप्त है. संयुक्त राष्ट्र भी अल्पसंख्यकों को सुरक्षा मुहैया कराने पर ज़ोर देता है. विभिन्न देशों के संविधानों में भी इसका ध्यान रखा गया है. जहां तक हमारे देश का सवाल है, कांग्रेस ने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद  संविधान में अल्पसंख्यकों के तमाम अधिकार और सुरक्षा के उल्लेख के बावजूद कोई गंभीर प्रयास नहीं किया. मार्च 1977 में मोरारजी देसाई की अगुवाई में बनी जनता पार्टी की सरकार को इस बात का श्रेय जाता है कि उसने अल्पसंख्यक मामलों के राष्ट्रीय आयोग के गठन की घोषणा की. इसके बाद पी वी नरसिम्हा रॉव की अगुवाई में 30 सितंबर, 1994 को कांग्रेस की अल्पसंख्यक सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास व आर्थिक कॉर्पोरेशन का गठन किया. फिर 2004 के आम चुनावों में सफलता के बाद कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों के लिए राष्ट्रीय आयोग बनाया और एक साल बाद मुसलमानों की स्थिति जानने के लिए सच्चर कमेटी का गठन किया और 29 जनवरी, 2006 को विशेष रूप से अल्पसंख्यक मंत्रालय की घोषणा की.
विश्‍लेषण से पता चलता है कि कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए कभी भी अल्पसंख्यकों के लिए कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया और 1977 में अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग के बाद इसे केवल राजनीतिक हथकंडे के रूप में इस्तेमाल किया. इसका उदाहरण अल्पसंख्यक मामलों के राष्ट्रीय आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम, अल्पसंख्यक मंत्रालय और सच्चर कमेटी के क्रियान्वयन में मिलता है. सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय से काट कर बनाए गए अल्पसंख्यक मंत्रालय ने अब तक बजट आबंटित करने और स्कॉलरशिप बांटने के अलावा कोई नया काम नहीं किया है. यह काम तो सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय भी कर सकता था, फिर अल्पसंख्यक मंत्रालय का क्या औचित्य है?  अल्पसंख्यक मंत्रालय को भले ही केन्द्रीय मंत्रालय का दर्जा प्राप्त है, लेकिन वह अपने अधिकतर कार्यक्रमों को लागू करने के लिए या तो राज्य सरकारों पर निर्भर है या फिर स्वयंसेवी  संगठनों पर. उसके पास ऐसा कोई तंत्र नहीं है, जिससे यह मालूम हो सके कि उसने अल्पसंख्यक कल्याण से संबंधित जिन विकास कार्यों को लागू करने के लिए केन्द्र सरकार की ओर से बजट पास करवाए हैं, उन पर उचित ढंग से क्रियान्वयन हो भी रहा है या नहीं. 2001 की जनगणना के अनुसार, देश में अल्पसंख्यकों की कुल आबादी लगभग 18.4 प्रतिशत है, जिनमें से मुसलमानों की आबादी 13.4 प्रतिशत, ईसाइयों की 2.3 प्रतिशत, सिक्खों की 1.9 प्रतिशत, बौद्धों की 0.8 प्रतिशत और पारसियों की आबादी 0.007 प्रतिशत है. कांग्रेस अल्पसंख्यकों के नाम पर अगर केवल मुसलमानों का ही नाम लेती है, तो इसका एकमात्र उद्देश्य चुनावों में मुस्लिम वोट हथियाना है. आंकड़ों से पता चलता है कि लोकसभा की 35 ऐसी सीटें हैं, जहां पर मुसलमानों की आबादी 30 प्रतिशत से अधिक है, जबकि 38 सीटों पर मुसलमानों की आबादी 21 से 30 प्रतिशत के बीच है और 145 सीटों पर मुसलमानों की आबादी 11 से 20 प्रतिशत के बीच है. जब भी आम चुनाव नज़दीक आते हैं, कांग्रेस मुसलमानों का वोट हथियाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने लगती है. 
लोकसभा चुनाव नजदीक देख कांग्रेस ने फिर से मुसलमानों से झूठ बोलना शुरू कर दिया है.  केन्द्रीय मंत्री के रहमान कह रहे हैं कि उनके मंत्रालय ने सच्चर कमेटी की 76 अनुशंसाओं में से 73 को लागू कर दिया है. चौथी दुनिया ने जब प़डताल की तो पता  चला कि आरंभिक 22 अनुशंसाओं में 12 अनुशंसाओं को यूपीए सरकार ने अभी तक लागू नहीं किया है. यूपीए सरकार के मंत्री लगातार झूठ बोल रहे हैं. सरकार ने अपनी ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) में अल्पसंख्यक मंत्रालय को 7 हज़ार करोड़ रुपये आबंटित किए थे, मंत्रालय का दावा है कि उसने उन रुपयों में से 6,824 करोड़ रुपये ख़र्च कर दिए हैं, जबकि सच्चाई यह है कि मंत्रालय ने राज्यों को जो राशि आबंटित की थी, उनमें से अधिकतर राशि ख़र्च ही नहीं की गई. हाल ही में जारी सोशल डेवलपमेंट रिपोर्ट 2012 के अनुसार, 2007-12 के दौरान राज्य सरकारों ने अल्पसंख्यकों से संबंधित केन्द्र की ओर से जारी की गई राशि में से आधी राशि भी ख़र्च नहीं की. 12 राज्यों ने अल्पसंख्यकों से संबंधित 50 प्रतिशत से भी कम ख़र्च किया, जिनमें बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और असम जैसे राज्य सूची में ऊपर हैं. कुछ राज्य ऐसे भी हैं, जहां पर इसमें से केवल 20 प्रतिशत राशि ही ख़र्च की गई. सच्चाई यह है कि अल्पसंख्यक मंत्रालय ने वर्ष 2008-09 में केन्द्र सरकार को 33.63 करोड़, 2009-10 में 31.50 करोड़ और 2010-11 में 587 करोड़ रुपये इसलिए वापस लौटा दिए, क्योंकि उन पैसों को ख़र्च ही नहीं किया जा सका. अल्पसंख्यक मंत्रालय की असमर्थता को देखते हुए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की संसदीय स्टैंडिंग कमेटी ने कड़ी आपत्ति जताई थी. अल्पसंख्यकों की बहुलता वाले 90 ज़िलों में बहु क्षेत्रीय विकास के तहत विभिन्न योजनाओं पर ख़र्च करने के लिए केन्द्र की ओर से इस मंत्रालय को जो 462.26 करोड़ रुपये दिए गए थे, वह भी उसने केन्द्र को लौटा दिए गए. इस प्रकार पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप की 24 करोड़ रुपये की राशि, मैट्रिक स्कॉलरशिप की 33 करोड़, मैरिट कोमेंस स्कॉलरशिप की 26 करोड़ और वक़्फ़ बोर्ड के कंप्यूटरीकरण की 9.3 करोड़ रुपये की राशि को अल्पसंख्यक मंत्रालय ख़र्च करने में असफल रहा और नतीजतन इस पूरी राशि को इसे केन्द्र को वापस करना पड़ा. ऐसी स्थिति में अल्पसंख्यकों, विशेषत: मुसलमानों के विकास के बारे में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के सभी दावे खोखले ही साबित हो रहे हैं. सच्चर कमेटी ने सबसे अधिक ज़ोर मुसलमानों की शिक्षा व पिछड़ेपन को दूर करने पर दिया था, लेकिन 7 वर्ष बाद भी मुस्लिम समाज की शिक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं. सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के लिए अलग से किसी प्रकार के आरक्षण की व्यवस्था भी अब तक नहीं की जा सकी है.

अल्पसंख्यक मंत्रालय का ढांचा
यूपीए सरकार ने भारत के अल्पसंख्यकों के कल्याण से संबंधित कल्याणकारी कार्यक्रमों को उचित ढंग से क्रियान्वित करने के लिए 29 जनवरी, 2006 को एक नया मंत्रालय बनाया और उसका नाम रखा अल्पसंख्यक मंत्रालय. इसे सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय से अलग करके एक नया मंत्रालय बनाया गया. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुर्रहमान अंतुले को इसका पहला मंत्री बनाया गया, जो 2009 तक इस पद पर रहे. इसके बाद सलमान ख़ुर्शीद को अल्पसंख्यक मंत्री बनाया गया, जो 2012 तक इस पद पर रहे. वर्तमान मंत्री के रहमान ख़ान हैं, जिन्होंने 28 अक्टूबर, 2012 को अल्पसंख्यक मंत्री का पद संभाला था. वर्तमान में नैनोंग एरंग इसके राज्यमंत्री हैं. अल्पसंख्यक मंत्रालय के कुल पदाधिकारियों की वर्तमान संख्या 93 है, जिनमें एक सचिव, तीन संयुक्त सचिव और व आर्थिक सलाहकार (अतिरिक्त प्रभार) शामिल हैं. आश्‍चर्य की बात यह है कि 2006 में जिस समय यह मंत्रालय बनाया गया था और अब्दुरर्रहमान अंतुले को जब इसका मंत्री बनाया गया था, इस समय इसके लिए अलग से न तो कोई भवन था और न ही कोई स्थायी कार्यालय, बल्कि एआर अंतुले जंतर मंतर रोड पर स्थित अपने सरकारी आवास से इसे चलाते थे, लेकिन आज, जब इस मंत्रालय के पास अपना कार्यालय भी है और इसके स्टाफ में कुल 93 सरकारी अधिकारी भी मौजूद हैं, फिर भी रहमान ख़ान अपने मंत्रालय को ठीक ढंग से नहीं चला पा रहे हैं.

-डॉ. कमर तबरेज

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