Friday, January 25, 2013

कश्मीर पर तो राष्ट्रवादियों को भी सोचना चाहिए



(पीयूडीआर ने जम्मू-कश्मीर में सैनिकों द्वारा उत्पीड़न पर ‘इम्प्यूटिनी फॉर एलिजिड परपेट्रेटर्स एंड क्वेस्ट फॉर जस्टिस इन जम्मू एंड कश्मीर’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें 214 घटनाओं के हवाले से स्थिति की भयावहता स्पष्ट की गई है। रिपोर्ट के आख़िरी पन्नों में परिशिष्ट के रूप में कुछ दस्तावेजों को भी स्कैन कर लगाया गया है। कश्मीर की राजनीतिक स्थितियों पर अरुंधति लिखती रही हैं, पीयूडीआर की इस रिपोर्ट के मौके पर उन्होंने गांधी शांति प्रतिष्ठान में जो भाषण दिया, पेश है उसका हिंदी तर्जुमा)

मैं ये कहना चाह रही हूं कि कश्मीर में सैनिकों द्वारा जो उत्पीड़न हो रहे हैं वो किसी सैनिक का निजी विचलन नहीं है बल्कि ये सांस्थानिक योजना है। .....अल्जीरिया जब फ्रांस का उपनिवेश था तो उस समय एक फ्रांसीसी सैनिक ने कहा कि ये मेरा काम है कि मैं अल्जीरिया में मानवाधिकार को तोड़ूं, यहां के लोगों को धमकाकर रखूं, लोगों को यातनाएं दूं। मुझे ऐसी ही पाठ पढ़ाई गई है! इसलिए मानवाधिकार हनन का मसला किसी का निजी मामला भर नहीं है, ये सांस्थानिक है और ऐसी स्थिति में इस तथ्य पर नज़र दौड़ाइए कि कैसे भारतीय सेना ये कहती है कि कश्मीर में वे सेना द्वारा हुए मानवाधिकार हनन की जांच खुद अपनी संस्था के मार्फ़त करवाएगी! इसे किस रूप में लिया जाना चाहिए?
.....कश्मीर की हालत बेहद ख़स्ता है और इस लिहाज से पीयूडीआर ने जो काम किया है उसकी हमें ज़रूरत है। कश्मीर के बारे में लोगों के पास अब सूचनाएं आने लगी हैं। इसलिए कई दफ़ा सुधिजन ये कहने लग जाते हैं, अरे यार, क्या होगा इन आंकड़ों और बातों का, क्या फ़ायदा होने जा रहा? लेकिन ऐसे मुश्किल हालात में काम करने वालों को लगातार काम करते रहना चाहिए क्योंकि इन कामों के पुलिंदों में असर छुपा होता है।
मुझे नर्मदा घाटी की एक बात याद आ रही है: एक गांव में आदिवासी लोग अपने खेत में रोपनी कर रहे थे। वो गांव डूब क्षेत्र में आने वाला था, तो मैंने पूछा कि जब फ़सल डूबनी ही है तो वो क्यों रोपनी कर रहे हैं? गांव वालों ने जवाब दिया कि वो जानते हैं कि फ़सल डूब जाएगी, लेकिन वे और कर क्या सकते हैं। फ़सल रोपना उनका काम है और वो ऐसा करेंगे। इसलिए डुबोने वालों को अपना काम करने दीजिए, आप अपना काम करते रहिए।
बहरहाल, ये रिपोर्ट महज इन आंकड़ों की सूची और घटनाओं का संग्रहण नहीं है कि कितने लोग कश्मीर में मारे गए और कितनों को यातनाएं मिलीं, बल्कि ये हमारे सामने कहीं ज़्यादा गंभीर सवाल उछालती है। ये हमें बताती है कि वास्तव में सैन्य कब्जेदारी का नतीजा किस रूप में सामने आ रहा है। सैन्य अत्याचार की इन घटनाओं को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। ऐसा नहीं है कि एक सेना का जवान आया और यातना बरसा गया, एक सेना का जवान आया और ख़ून बहा गया, वास्तव में ये सांस्थानिक मसला है। ये घटनाएं भटकाव या अपवाद को रेखांकित नहीं करतीं। उनको उन्हीं खातिर तैयार किया गया है और वे जो वहां कर रहे हैं वही उनका कर्तव्य है!
मैं कई बार कश्मीर गई हूं और मैंने देखा है वहां के लोगों की आंखों में क्या है? आफ़्सपा जैसे क़ानून के साए में जी रहे कश्मीर में अत्याचार के कैसे-कैसे वारदात अंजाम दिए जाते हैं ये इधर के लोगों की कल्पना से परे हैं। कश्मीर के (तकरीबन) किसी भी घर में चले जाइए वहां दस्तावेज़ों से भरा प्लास्टिक का थैला आपको मिल जाएगा। लोग आपको बताएंगे,- मैंने यहां एफआईआर किया, वहां अर्जी डाली, फिर ऊपर गया, अदालतों के चक्कर काटे, लेकिन कुछ नहीं हुआ। ऐसी निराशा हर घर में पसरी मिलेगी। दस्तावेज़ों के पुलिंदों के बावज़ूद कुछ नहीं हो रहा! पूरी अवाम के साथ ये किस तरह का बरताव है?

...सवाल ये है कि हम इस रिपोर्ट का क्या करें, हमें कश्मीर के बारे में क्या करना चाहिए? चलिए एक सामान्य उदार भारतीय के लिए इसके मायने ढूंढते हैं। आप देखिए न, अन्ना हज़ारे के साथ और दिल्ली बलात्कार कांड के विरोध में हुए आंदोलन में डूबते-उतराते लोग कहां खड़े हैं? कौन बोल रहा है कश्मीर पर? उनके पोजिशन और मुद्दे साफ़ हैं। कश्मीर से उनको क्या लेना-देना? लेकिन एक उदार राजनीति के व्यक्ति को भी इस मुद्दे पर साथ होना चाहिए। मैं तो कहूंगी कि राष्ट्रवादियों को भी सोचना चाहिए कि कश्मीर के मुद्दे उनके लिए क्यों महत्वपूर्ण है! मैं कारण बताती हूं। आज़ादी के 60 साल बाद तक पुलिस, भारतीय सेना, सीआरपीएफ़ और बीएसफ़ ने नागालैंड, मणिपुर और कश्मीर में कब्जेदारी की बदौलत जिस तरह से अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई है और इस दौरान उन्होंने जो भूमिका निभाई है, उसने सांस्थानिक रूप ले लिया। राष्ट्रवादियों को बस मैं ये बताना चाहती हूं कि रक्षा बलों ने जो कसरत उन इलाकों में की है वे अब भारत की “मुख्यभूमि’ में उनका इस्तेमाल करने लग गई हैं। छत्तीसगढ़ में यही कार्रवाई हो रही है और धीरे-धीरे इसकी परास बढ़ती जा रही है.....
....रक्षा बलों द्वारा दी जाने वाली यातनाओं पर तो सवाल भी नहीं उठते। बड़ी आबादी यातना देने वालों की पांत के साथ खुद को नत्थी पाती है, इस महसूसियत में एक तरह का वर्चस्व का पुट शामिल होता है, इसलिए ये मज़ा देता है। मुझे संसद भवन पर हुए हमले के तुरंत बाद हुए एक टीवी शो की याद आ रही है जो शायद सीएनएन-आईबीएन पर प्रसारित हुआ था, उसमें एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कह रहे थे“हां, ये सच है कि अफ़जल गुरू को मैंने यातनाएं दी है, मैंने उसकी गुदा में पेट्रोल डाला है, मैंने उसको बेतरह पीटा है, लेकिन अफसोस उसने कुछ नहीं कबूला।” उस चर्चा में कई राजनीतिक विश्लेषक, टिप्पणीकार और पत्रकार भी थे, शायद राजदीप सरदेसाई शो को एंकर कर रहे थे, लेकिन किसी ने पुलिस अधिकारी की आपकबूली पर एक वाक्य नहीं बोला। पुलिस अधिकारी ने दावा ठोका कि उसने राष्ट्रहित में ऐसा किया है।....इसलिए मेरा ये मानना है कि ये रिपोर्ट ऐसे कॉरपोरेट मीडिया के लिए नहीं है और न ही उन लोगों के लिए है जिन्हें ऐसी यातनाओं को देखने-सुनते में मज़ा हासिल होता है।

ये उन लोगों के लिए है जो वाकई इन यातनाओं को संदर्भ सहित जानने-समझने की चाह रखते हैं, जो ये समझना चाहते हैं कि बीते छह दशकों में कश्मीर में वाकई हुआ क्या है? बड़ी आबादी की राजनीति को खारिज करने से उपजे सवाल को लेकर कई लोग असहज और परेशान हो जाते हैं। लेकिन ये ढोंग नहीं है, राजनीति है। मैं एक बात और कहना चाहती हूं कि आज यदि एक कश्मीरी पंडित 200 लोगों का संदर्भ देकर एक किताब लिखता है तो लोग उसको हाथों-हाथ लेते हैं, कश्मीर का एक भयावह चेहरा लोगों के सामने नमूदार होने लगता है। लेकिन आज ही अगर आप हज़ारों पेज के दस्तावेज़ के साथ उसी कश्मीर पर सैंकड़ों पेज का किताब लिखेंगे तो लोग तवज्जो तक नहीं देंगे। यही राजनीति है। राजनीति यही है कि बहुसंख्य आबादी को क्या रास आ रहा है और लोग किस मुद्दे के साथ तादात्मय बना पा रहे हैं। लेकिन ऐसे काम लगातार होते रहना चाहिए, कश्मीर पर ये बढ़िया रिपोर्ट है, जिसे ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए।

Friday, January 04, 2013

बारा रबीअव्वल – गम या खुशी?



बर्रा सगीर (हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश) मे हर साल 12 रबीअव्वल को बड़ी धूम-धाम से रसूल अकरम सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का यौम ए विलादत मनाया जाता हैं, जगह-जगह जुलूस निकलते हैं, गली-गली चरागा होता हैं, खाने-पकाने का भी खूब इन्तज़ाम होता हैं और ये सब एक जश्न की सूरत मे हर साल नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की उम्मत बड़े ही एहतमाम के साथ करती हैं| और इस जश्न को ईद मिलादुन्नबी कहा जाता हैं|

इसमे कोई शक नही के ये तमाम काम नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की अकीदत और मोहब्बत मे होते हैं लेकिन काबिले गौर बात ये हैं के हमे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के साथ किस तरह की मोहब्बत रखनी चाहिए और हमे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने इस बारे मे क्या हुक्म दिया हैं| अगर नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत का मतलब ये हैं कि हम साल मे एक बार उनके विलादत का जश्न मना ले तो क्या हमने नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मोहब्बत क हक अदा कर दिया या नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत का मतलब ये के हम उनके लाये हुए इस दीन ए इस्लाम को अपनी ज़िन्दगी का आईना बना ले?

अगर हम नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के विलादत के जश्न को नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मोहब्बत का नाम दे तो ज़ाहिर और साबित तौर पर हम सहाबा, ताबाईन, तबाताबाईन और अईम्मा अरबाअ को नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की इस अकीदत और मोहब्बत से बेगाना पायेगें क्योकि जश्न विलादत का ये एह्तमाम सहाबा, ताबाईन, तबाताबाईन और अईम्मा मे से किसी ने भी नही किया न किसी ने नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के बाद इसका हुक्म दिया| अगर नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत का मतलब उनके लाये हुये दीन की पैरवी करना हैं तो आज हम दीन ए इस्लाम से बेगाने हैं क्योकि दीन ए इस्लाम को सहाबा के बाद अगर किसी ने समझा हैं तो ताबाईन और तबाताबाईन हैं लिहाज़ा हम जिस काम को आज दीन समझ कर कर रहे हैं उसका दीन ए इस्लाम से कोई वास्ता नही और इस लिहाज़ से हम गुनाह की ज़द मे हैं|

कोई इन्सान नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत और दीन ए इस्लाम का हक तब तक नही अदा कर सकता जब तक वो नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के लाये इस दीन की पैरवी न करे और उसे अमली तौर पर न करे| जैसा के सहाबा, ताबाईन और तबाताबाईन ने किया तो फ़िर सोचने की बात ये हैं के क्या जश्न ए मिलादुन्नबी से हमारा कोई वस्ता हैं या नही?

नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया-

दीन मे अपनी तरफ़ से इजाफ़ा मरदूद और नाकाबिले कबूल हैं| (बुखारी व मुस्लिम)

मज़ीद फ़रमाया के –

दीन मे इज़ाफ़ाशुदा काम (बिदअत) मरदूद ही नही बल्कि गुमराही हैं जो जहन्नम मे ले जाने वाली हैं| (बुखारी व मुस्लिम)

ईदमिलदुन्नबी मनाने से पहले ये तय करना ज़रूरी हैं नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत कब हुई? और आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने वफ़ात कब पाई क्योकि आज जिस तारिख पर ये जश्न होता हैं उसी दिन आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की वफ़ात भी हुई और विलादत भी हुई| लिहाज़ा आज मआशरे मे जिस दिन जश्न होता हैं वो विलादत और वफ़ात दोनो का ही दिन हैं|

इस बारे मे तमाम तारीख लिखने वालो और सीरत लिखने वालो का इस बारे मे इत्तेफ़ाक हैं के आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत पीर(सोमवार) को हुई| और बारे मे आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की एक हदीस मौजूद हैं|

हज़रत अबू कतादा रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से पीर(सोमवार) के बारे मे पूछा गया तो आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया – ये वो दिन हैं जिस दिन मैं पैदा हुआ और इसी दिन मैं मबऊस हुआ या मुझ पर वह्यी नाज़िल की गयी| (मुस्लिम)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि0 से रिवायत हैं के – नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम पीर(सोमवार) के दिन पैदा हुये और पीर(सोमवार) के दिन नबूअत का ऐलान किया| और पीर(सोमवार) के दिन ही वफ़ात पाई और पीर(सोमवार) के दिन नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम मक्का से मदीना की तरफ़ हिजरत के लिये रवाना हुये और पीर(सोमवार) के दिन ही मदीना पहुंचे और पीर(सोमवार) के दिन हुजरे असवद को उठाया| (हदायक अल नवार)

इन हदीसो की रोशनी मे साबित हैं की नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने पीर(सोमवार) के दिन विलादत पाई| अब रहा सवाल तारीख विलादत तो इस बारे मे खुद नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से तो कोई रिवायत नही अलबत्ता मशहूर मुफ़स्सिर और तारीखदान इब्ने कसीर रह0 ने अपनी तारिख अलबदायाह व अलनहायाह मे लिखा हैं के जमहूर अहले इल्म का इत्तेफ़ाक ये हैं आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम माहे रबीअव्वल मे पैदा हुये लेकिन ये के आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम इस माह के अव्वल, आखीर या किस तारिख को पैदा हुये? इस बारे मे तारिखदान और सीरत निगारो के कयी अलग-अलग राय हैं किसी ने 2 रबीअव्वल, किसी ने 8 रबीअव्वल, किसी ने 10 रबीअव्वल, किसी ने 12 रबीअव्वल , किसी ने 17 रबीअव्वल और किसी ने 18 रबीअव्वल और किसी ने 22 रबीअव्वल कहा हैं और इनमे से दो राय सबसे ज़्यादा बाएतबार हैं एक 8 और दूसरी 12 की| इमाम हमीदी ने इब्ने हज़म से 8 रबीअव्वल ही नकल किया हैं और कयी दूसरे अईम्मा ने इसी बात की तायद की हैं| इमाम तिबरानी और इमाम इब्ने खलदून ने 12 रबीअव्वल की तायद की हैं| और इमाम इब्ने जोज़ी ने अल वफ़ाबा हवालल मुस्तफ़ा मे 10 रबीअव्वल की तायद की हैं| जबकि माज़ी के दो करीबी अज़ीम सीरत निगारो मे अल्लामा काज़ी सुलेमान मन्सूरपुरी ने अपनी किताब रहमतुल्लिल आलामीन मे और अल्लामा सिबली ने सिरतुन्नबी मे 9 रबीअव्वल (20 अप्रेल 571 ईसवी) को तहकीक जदीद सही तारीख करार दिया हैं|

तारीख विलादत और मज़ीद बहस का मौअज़ू हैं जिसमे अलग-अलग उल्मा, अईम्मा, और तारिखनिगारो के कौल मौजूद हैं| बहरहाल सही तारीख का किसी को अन्दाज़ा नही| हालाकि तारीख वफ़ात का दिन 12 रबीअव्वल ये बिल्कुल सही हैं जो बारावफ़ात के नाम से आज तक मौजूद हैं| तो वफ़ात रसूल पर ये खुशीया नही| यही वो तारिख हैं जिस रोज़ हज़रत फ़ातिमा रज़ि0 यतीम हुई| यही वो तारीख हैं जिस रोज़ उम्मुल मोमिनीन बेवा हुई| गौर फ़िक्र की बात ये हैं के अगर आज किसी बेवा या यतीम के सामने उसके बाप या शौहर के मरने का जश्न मनाया जाये तो ये बात नाकाबिले बर्दाश्त कही जायेगी तो फ़िर नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की वफ़ात पर जश्न क्यो?

दूसरे खुशी मनाने का ये अन्दाज़ जो माआशरे मे चला आ रहा हैं क्या वो सही हैं? क्या इसकी कोई गुन्जाइश भी दीन मे हैं? खुशी के मौके पर जुलूस निकालना, चिरागा करना, ढोल बजाना क्या दीन ए इस्लाम मे हैं क्या सहाबा ने किसी खुशी के मौके पर ये सब किया| यकीनन नही किया| जैसे के दीन ए इस्लाम मे दो ईद के मौके पर नमाज़ पढने और तकबीर व तहलीक ही का हुक्म दिया तो ईद मिलादुन्नबी के मौके पर ये सब खुराफ़ात कैसे की जा रही हैं| जैसा के तमाम दुनिया मे 25 दिसम्बर को ईसा अलै0 की विलादत का जश्न मनाया जाता हैं और खुराफ़ात होती हैं जैसे नाच-गाना, शराबनोशी वगैराह ठीक उसी तरह हम उनकी मुशाबहत करते हैं और नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत का जश्न मनाते हैं हालाकि ना ईसाईयो को अल्लाह ने ईसा अलै0 की विलादत मनाने का हुक्म दिया ना ही उनकी किताब इन्जील मे इस बारे मे कही हुक्म हैं| लिहाज़ा हम उनकी नकल करते हैं और किसी कौम की मुशाबहत करने के बारे मे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया-

जिसने किसी कौम की मुशाबहत इख्तयार करी वो इन्ही मे से समझा जायेगा| (अबू दाऊद)

बहरहाल जिस एतबार से भी देखा जाये जश्न मिलादुन्नबी की कोई शरयी हैसियत नही| ये मोहब्बत रसूल के नाम पर एक खोखला अकीदा हैं क्योकि मुसल्मानो के लिये यौमे विलादत से ज़्यादा अहम रिसालत हैं जिसके तहत अल्लाह ने इन्सान को अंधेरे से निकाल कर उजियाले की राह दिखाई| यौमे रिसालत से ही इन्सान को तौहीद मिली जिससे इन्सान को अपनी दुनिया और आखिरत की ज़िन्दगी सुधारने का मौका मिला|

अगर यौम ए विलादत को किसी मुसलमान को खुशी हैं तो यकीनन हर मुसल्मान को ये खुशी होनी चाहिए| लिहाज़ा मसला खुशी का नही बल्कि इज़हारे खुशी का हैं जिसकी बुनियाद पर मुसलमानो मे एक बिदाआत का रिवाज हैं| क्या इस बेबुनियाद इज़हारे खुशी को करके ही ये साबित होता हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत हैं जबकि सहाबा रज़ि0 ने अगर इसको नही किया तो नाऊज़ोबिल्लाह वो नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत नही करते थे और उनसे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की शान मे ये अमल छूट गया|

जबकि नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत करने वाली असल जमात सिर्फ़ और सिर्फ़ सहाबा रज़ि0 की थी जिन्होने अपने अमल और किरदार से नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मोहब्बत को साबित किया और इस उम्मत मुस्लिमा के लिये एक सबक दिया| आज मुसल्मान इस काम को जिस तरह कर रहा हैं नाऊज़ोबिल्लाह क्या अल्लाह ने अपने दीन को मुकम्मल नही किया जो आज लोग ये ईदमिलादुन्नबी मनाकर इसे पूरा कर रहे हैं| जबकि अल्लाह फ़रमाता हैं –

आज मैने दीन को तुम्हारे लिये मुकम्मल कर दिया| ( सूरह माईदा सूरह नं0 5 आयत नं0 3)

नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया –

हज़रत अबदुल्लाह बिन उमर रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया – अल्लाह ने कोई नबी नही मबऊस फ़रमाया, मगर इसका ये फ़रीज़ा था के वो अपनी उम्मत को हर वो खैर का काम बताये जो अल्लाह ने इसे सिखाया था, और उम्मत को हर वो शर से डराये जो अल्लाह ने इसको तालिम दी थी| (मुस्लिम)

क्या अल्लाह के इस हुक्म और नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के इस फ़रमान को पढने के बाद भी कोई ये कहेगा के दीन आज ईदमिलादुन्नबी मना कर पूरा हो रहा हैं| वो भी उस वक्त जब उसे खुद उसके पास इस बात का सबूत न हो के विलादत की असल तारिख क्या हैं जैसा के उपर गुज़रा के 12 रबीअव्वल वफ़ात नबी की तारीख हैं तो मुसलमान आज वफ़ात पर खुशी मनाते हैं|

आज नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत पर जश्न मनाने वाले एक तरफ़ तो तमाम नबी और बुज़ुर्गो को एक तरफ़ तो जिन्दा तसलीम करते हैं दूसरी तरफ़ अगर सचमुच नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम जिन्दा हैं तो सहाबा से नबी की शान मे एक अमल छूट गया| जबकि नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने 23 साल अपनी दावत तब्लीग जारी रखी उस लिहाज़ से सहाबा को 23 बार ये मौका मिला बावजूद इसके उन्होने नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मौजूदगी मे ये जश्ने विलादत क्यो न मनाया| नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का इरशाद हैं-

तमाम ज़मानो मे बेहतरीन ज़माना मेरा ज़माना हैं, फ़िर इन लोगो क जो इसके बाद वाले हैं और फ़िर इन लोगो क जो इन के बाद वाले हैं| (मुस्लिम)

इस हदीस से ये साबित होता हैं के नबी के बाद सहाबा का और सहाबा के बाद ताबाईन का ज़माना बेहतर हैं लिहाज़ा 12 रबीअव्वल को नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का जश्न विलादत इन तीन ज़मानो मे से किसी भी एक आदमी से भी साबित हैं लिहाज़ा अगर आज मुसलमान इस अमल को नबी की विलादत का जश्न समझ कर रहा हैं तो यकीनन गुमराही मे हैं|

जश्ने विलादत को लेकर एक और बातिल अकायद हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम इस महफ़िल मे हाज़िर होते हैं और इसीलिये लोग नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के इस्तक्बाल मे खड़े हो जाते और नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम को सलाम व खुशामदीन और मरहबा कहते हैं| ये एक ऐसा बातिल और जिहालत भरा अकीदा हैं क्योकि नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम अपनी कब्र मुबारक से कयामत से पहले नही निकलेगें और न किसी इन्सान से मिलेगें और न किसी मजलिस मे हाज़िर होगें बल्कि आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम अपनी कब्र मे कयामत कायम होने तक मुकिम रहेगें| जैसा के अल्लाह कुरान मे फ़रमाता हैं-

इसके बाद फ़िर तुम सब यकिनन मर जाने वाअले हो, फ़िर कयामत के दिन बिलाशुबहा तुम सब उठाये जाओगे| (सूरह मोमिनून सूरह नं0 23 आयत नं0 15-16)

नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का इर्शाद हैं –

कयामत के दिन सबसे पहले मैं कब्र से उठूगां, और मैं ही सबसे पहले शफ़ाअत करूगां और सबसे पहले मेरी ही शफ़ाअत कुबूल होगी| (मुस्लिम)

कुरान और हदीस की रोशनी मे ये पता चलता हैं की तमाम इन्सान और अंबिया सिर्फ़ कयामत के रोज़ ही उठेगें उससे पहले नही| और इस बारे मे तमाम उल्मा का इजमा हैं और इस बारे मे कोई इख्तलाफ़ नही|

गौर फ़िक्र की बात ये हैं के अगर विलादत नबवी जश्न का मसला अगर अल्लाह और उसके रसूल के नज़दीक पंसदीदा अमल होता तो वो शरियत बन जाती जबकी ऐसा नही हैं क्योकि जश्न मिलादुन्नबी किसी एक सहाबा या ताबाईन से साबित ही नही और जो चीज़ नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम या सहाबा या खुल्फ़ाए राशीदीन या ताबाईन से साबित नही उसकी कोई शरई हैसियत नही बल्कि वो बिदात हैं|
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