Sunday, February 24, 2013

हिन्दुत्वादियों के कुछ दोहरे चरित्र के उदाहरण



1. अगर मुस्लिम विकास के नाम पर वोट दे तो "डरपोक और लालची" अगर हिन्दू दे तो "प्रगतिशील, देशभक्त " |
2. अगर मुस्लिम लड़की हिन्दू लड़के से शादी करे तो "इस्लाम मे महिलाओं की स्थिति ख़राब" अगर हिन्दू लड़की मुस्लिम लड़के से शादी करे तो "लव जेहाद" |
3. अगर मुस्लिम धर्म के नाम पर वोट दे तो "सम्प्रदायिक" अगर हिन्दू दे तो "भारतीय संस्कृति का रक्षक " |
4. अगर मुस्लिम केवल एक पार्टी को वोट दे तो " वोट-बैंक" अगर हिन्दू दे तो " हिन्दुओं की एकता " |
5. अगर युद्ध मे मुस्लिम जीते तो "अत्याचारी" अगर हिन्दू जीते तो "पराकर्मी " |
6. अगर मुस्लिम कोई अच्छा और नेक काम करे तो "भारत का हर नागरिक हिन्दू होता है "अगर कोई बुरा काम करे तो "हर बुरा इंसान मुस्लिम क्यों होता है" |
7. अगर मुस्लिम गरीब, अशिक्षित हो तो " ज्यादा बच्चे पैदा करने का परिणाम " अगर हिन्दू हो तो " कांग्रेस की गलत नीतियाँ " |
8. अगर मुस्लिम भारत के कानून पर आपति करे तो "देशद्रोही" अगर हिन्दू करे तो "समाज सुधारक और परिवर्तनशील" |
9. अगर मुस्लिम एक से ज्यादा शादी करे तो "अय्याश" अगर हिन्दू करे तो "रासलीला" |
10.
अगर मुस्लिम प्रतिक्रिया दे तो " दंगाई " अगर हिन्दू दे तो " इतिहास का संतुलन" |
यह लिस्ट बहुत लम्बी है | सोचते जाये और इसे बढ़ाते जाये
मैने हिन्दुत्वादियों के कुछ दोहरे चरित्र का वर्णन किया है हिन्दुओं के नही | समझदार लोगों को हिन्दू और हिन्दुत्व का फर्क मालूम है | जिन्हें यह मालूम नही है पहले इस फर्क को समझे फिर मेरी बात अच्छी तरह समझ आयेगी| हिन्दुत्व धर्म हिन्दू धर्म को तोड कर बनाया गया है | और अब तो हिन्दुत्व धर्म को तोड़कर एक नया धर्म मोदीत्व धर्म बन चुका है |
विकास के नाम पर क्या कोई कांग्रेस को वोट नही दे सकता | मोदीजी को 48% वोट मिले बाकी 52% क्या आपके हिसाब से विकास नही चाहते थे| हिमाचल मे कांग्रेस जीते है इसका मतलब हिमाचल की जनता विकास नही चाहती | मोदीजी को विकास पर इतना ही भरोसा है तो क्यों नही अपनी छवि मे परिवर्तन लाने की कोशिश करते है जिस तरह कांग्रेस ने 1984 के बाद किया |
क्या कांग्रेस के शासन मे गुजरात का विकास नही हुआ था | हाइवे बनाया कांग्रेस ने मोदीजी ने तो केवल कोलतार बिछाया है | सरदार सरोवर बाँध बनाया कांग्रेस ने मोदीजी ने केवल बिजली निकाली | उदारवाद लागू किया कांग्रेस( मन मोहन सिंह ) ने मोदीजी ने केवल विदेशी कम्पनियों को जगह दी | परमाणु हथियार बनाया कांग्रेस ने बीजेपी ने केवल परीक्षण किया |खुदरा विदेशी निवेश लागू किया कांग्रेस ने अपनी सरकार को दाव पर लगा के और मुझे पुर भरोसा हैकी मोदीजी गुजरात मे इसे लागू करेंगे |
24% मुस्लिम ने मोदीजी को विकास के लिये वोट दिया | हो सकता है 76% मुस्लिम ने भी कांग्रेस को विकास के लिये ही वोट दिया हो | हर वोटर का आपना विचार है कि कौन सी पार्टी विकास करने के लिये ज्यादा उपयुक्त है | मुझे इस बात पर संदेह है कि हिन्दुत्व और मोदीत्व धर्म के अनुयायी लोकतंत्र पर आस्था रखते है | आखिरकार चुनाव से पहले ही किसी को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बना देना क्या साबित करता है |मैने हिन्दुत्वादियों के कुछ दोहरे चरित्र का वर्णन किया है हिन्दुओं के नही | समझदार लोगों को हिन्दू और हिन्दुत्व का फर्क मालूम है | जिन्हें यह मालूम नही है पहले इस फर्क को समझे फिर मेरी बात अच्छी तरह समझ आयेगी| हिन्दुत्व धर्म हिन्दू धर्म को तोड कर बनाया गया है | और अब तो हिन्दुत्व धर्म को तोड़कर एक नया धर्म मोदीत्व धर्म बन चुका है |
-Gunjan Agarwal

फिर फंसेगे बेगुनाह… फिर मरेंगे आम लोग… फिर बंटेगा वीरता चक्र…


हैदराबाद में धमाके हुए हैं और तफतीश भी शुरू हो चुकी है. वही पुराना, बासी, पैबंद-दार और घीसा-पीटा जांच का फार्मूला एक बार फिर से दोहराया जाएगा. शुरूआत हो चुकी है… पढ़ते जाईए… देखते जाईए और समझते जाईए…
BeyondHeadlines
1- पुलिस को आनन फानन में वह बाजार पता चल जाएगा जहां से साइकिल खरीदी गई थी. (ये अलग बात है कि साइकिल की न तो कोई आर सी होती है, नहीं लाइसेंस प्लेट और नहीं चालक का कोई लाइसेंस.)
2- गजब तो ये कि साइकिल की दुकान वाले को साइकिल खरीदने वाले का चेहरा भी हू ब हू याद होगा. चाहे साइकिल महीनो पहले ही क्यों न खरीदी गई हो. वो आतंकियों का स्केच भी हू ब हू तैयार करा देगा और यह स्केच किसी कुख्यात आतंकी चेहरे से मिलता जुलता भी होगा. (ये अलग बात है कि हम जिस दुकान से पानी की बोतल या अखबार खरीदते हैं, उस दुकानदार का चेहरा भी हमें शायद ही याद रहता हो.)
3- अब सुरक्षा एजेंसियां आनन फानन में छापा मारेंगी. संदेहास्पद लोग पकड़े जाएंगे. उनके पास ये चीजें जरूर बरामद होंगी- उर्दू का एक अखबार, पाकिस्तान का झंडा, इंडियन मुजाहिदीन या सिमी का साहित्य, पाकिस्तान मेड असलहा, विदेशी करेंसी… (मानो आतंक के आका आतंकियों को हर ब्लास्ट से पहले एक विशेष प्रकार की किट से लैस कर के भेजते हैं. ब्लास्ट की जगह अलग हो सकती है. ब्लास्ट का समय अलग हो सकता है, मगर ये किट जिसे सुरक्षा एजेंसियां बरामद करती हैं, हमेशा एक सी होती है. कभी नहीं बदलती.)
4- इतना नहीं पुलिस को आनन-फानन में माड्यूल का भी पता चल जाएगा. ये माड्यूल इन्हीं में से एक होगा. पुणे बेकरी ब्लास्ट. मुंबई झावेरी बाजार ब्लास्ट. यूपी संकटमोचन मंदिर ब्लास्ट. जयपुर जौहरी बाजार ब्लास्ट, दिल्ली सीपी-गफ्फार मार्केट धमाके…. माड्यूल का पता धमाके में इस्तेमाल की गई चीजों से चलेगा. जैसे साइकिल, बाल रिंग, शार्पनेल, टाइमर आदि और इसी से साबित हो जाएगा कि धमाके सिमी ने किए हैं, हूजी ने या फिर इंडियन मुजाहिदीन ने ( ऐसा लगता है कि जैसे कापीराइट एक्ट के तहत हर आतंकी संगठन ने अपने अपने धमाकों में इस्तेमाल होने की जाने वाली चीजों का रजिस्ट्रेशन करा लिया हो और एक आतंकी संगठन कानूनन दूसरे आतंकी संगठन के माड्यूल में इस्तेमाल की गई चीजों का इस्तेमाल नहीं कर सकता, नहीं तो शायद पटियाला कोर्ट दिल्ली में कापीराइट एक्ट के तहत इस मामले में दावा भी दायर किया जा सकता है.)
5- ब्लास्ट कोई भी हो, कहीं भी हो, कैसा भी हो, खुफिया एजेंसियों के सूत्रों से मास्टर माइंड का नाम आधे घंटे के भीतर ही फ्लैश होना शुरु हो जाएगा और वो इन्हीं में से कोई एक होगा. रियाज भटकल. इकबाल भटकल. यासीन भटकल… अहमद सिद्धी बप्पा उर्फ शाहरूख उर्फ यासीन अहमद. इलियास कश्मीरी. हाफिज सइद. लखवी… (मानो ये मास्टर माइंड कारनामे को अंजाम देते ही भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को फोन कर रिपोर्ट करते हों कि सरकार काम हो गया, अब आप नाम आगे बढ़ा सकते हैं.)
6- ब्लास्ट के 24 घंटों के भीतर ही इन जगहों पर छापे जरूर पडेंगे. आजमगढ़- उत्तर प्रदेश… दरभंगा- बिहार… नांदेड़ और बीड़- महाराष्ट्र. संदिग्ध आतंकी या तो इन्हीं जगहों से बरामद होंगे या उनका लिंक इन्हीं जगहों से मिलेगा. (मानो यूपीएससी की वेबसाइट पर “अपकमिंग वैकेंसी” के कॉलम में योग्य उम्मीदवारों की एक सूची लगी हो और उनमें इनका नाम दिया गया हो.)
गृहमंत्री महोदय, कृपया ध्यान दें- एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर हमारी सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों की इसी दिमागी मौज मस्ती के चलते, असली आतंकी तो पकड़ में आते ही नहीं, हां गरीब कमजोर बेगुनाहों को जेलों में ठूंसकर हर साल 26 जनवरी को वीरता पुरुस्कार जरूर हथिया लिए जाते हैं, नहीं तो अमेरिका में 9/11 के हमले के बाद किसी की कूवत नहीं हो पाई कि सार्वजनिक जगहों पर एक छुरछुरी भी फोड़ सके.
Abhishek Upadhayay for beyondheadlines 

Wednesday, February 20, 2013

अफजल को सजा जुर्म नहीं, उसके पहचान की मिली



afzal_guru_reutersयह सच है कि अफजल गुरु को देश के सर्वोच्च न्यायालय से सजा हुई थी। लेकिन इसी सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में माना है कि पिछले दिनों कम से कम 14 मामले ऐसे रहे जिनमें फांसी की गलत सजा सुनाई गई। देश के 14 महत्वपूर्ण जजों ने इसीलिए बाकायदा पत्र लिखकर राष्ट्रपति से अपील की कि इन फैसलों को उम्रकैद में बदला जाए।
अफजल के मामले में ऐसी कोई अपील नहीं हुई हालांकि उसके मामले की असंगतियां सबसे प्रखरता से दिखती रहीं। अदालत ने भी माना कि पुलिस ने मामले की ठीक से जांच नहीं की। इंदिरा जयसिंह और नंदिता हक्सर जैसी वकीलों ने कहा कि अगर अफजल को कायदे का वकील मिल गया होता तो उसे फांसी नहीं होती। उसे वकील तक नहीं मिला क्योंकि वकीलों ने तय कर रखा था कि संसद पर हमले के आरोपितों को वे कोई कानूनी मदद नहीं देंगे। एक तरह से यह पुलिस के लिए सुनहरा मौका था कि वह जिसे चाहती उसे संसद भवन का आरोपित बना डालती। इन सबके बावजूद सरकार ने राष्ट्रपति को यही सलाह दी कि वे उसकी माफी याचिका खारिज कर दें। जाहिर है, अफजल को सजा उस जुर्म की नहीं मिली जो उसने किया, उस पहचान की मिली जो उस पर थोप दी गई- एक आतंकवादी की पहचान, जिसने देश की संप्रभुता पर हमला किया। यह पहचान उस पर चिपकाना इसलिए भी आसान हो गया कि वह मुसलमान था, कश्मीरी था और ऐसा भटका हुआ नौजवान था जिसने आत्मसमर्पण किया था।

यह सवाल बेमानी नहीं है कि अफजल गुरु को लेकर नफरत भरी जो राष्ट्रवादी आंधी दिखती रही, क्या उसके पीछे उसकी इस पहचान का भी हाथ था। वरना जो बीजेपी यह मासूम तर्क देती है कि आतंकवादियों से बिल्कुल आतंकवादियों की तरह निपटा जाना चाहिए, उनका मजहब नहीं देखा जाना चाहिए, वही पंजाब में अदालत द्वारा सजायाफ्ता एक ऐसे आतंकवादी को बचाने के काम में अकाली दल के साथ शामिल होती है जो खुलेआम कहता है कि वह न भारतीय लोकतंत्र पर भरोसा करता है और न भारतीय न्यायतंत्र पर। यह मामला बलवंत सिंह राजोआना का है जो बेअंत सिंह की हत्या का मुख्य अभियुक्त है। उसे न अपने किए पर कोई पछतावा है और न ही अपने रवैये पर कोई संदेह। लेकिन अफजल के मामले में देरी की शिकायत कर रही बीजेपी राजोआना के मामले में जैसे आंखें मूंदे बैठी है।

इस मामले में सरकार का घुटनाटेकू या अवसरवादी रवैया ज्यादा अफसोसनाक रहा। जिस दौर में फांसी पर पुनर्विचार की बहस सबसे तीखी है, उस समय अफजल को फांसी पर चढ़ा दिया गया। क्या इसलिए कि सरकार को बीजेपी के उग्र राष्ट्रवाद का एक सटीक राजनीतिक जवाब देना था? या इसलिए कि 2014 के चुनाव आने से पहले उसे महंगाई, भ्रष्टाचार और गैरबराबरी का मुकाबला करने में अपनी नाकामी की तरफ से जनता का ध्यान खींचना था?

अफजल की फांसी से वे लोग पुनर्जीवित नहीं होने वाले हैं जिन्हें 13 दिसंबर, 2001 की सुबह संसद परिसर पर हमले के दौरान अपनी जान गंवानी पड़ी। मृत्यु अंततः सब कुछ हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर देती है। लेकिन राजनीति मातम की भी दुकान लगा लेती है। जो परिवार आतंकवाद या ऐसे किसी भी हादसे के शिकार होते हैं, उनके दिमाग में प्रतिशोध कूट-कूट कर भरा जाता है, इस प्रतिशोध में दिखने वाली अमानवीयता को देशभक्ति के मुलम्मे से ढका जाता है, उनके जख्मों को हरा रखा जाता है ताकि उनका राजनीतिक इस्तेमाल हो सके।

अंततः इन सबसे एक ऐसे अंधराष्ट्रवाद का निर्माण होता है जो बेईमान और तानाशाह प्रवृत्तियों को सबसे ज्यादा रास आता है क्योंकि इसके बाद हर असुविधाजनक सवाल गद्दारी में बदल जाता है, हर संशय को देशद्रोह करार दिया जाता है और हर असहमति पर एक सजा नियत कर दी जाती है, जिसे कोई भी सड़कछाप संगठन अमल में लाने को तैयार रहता है और व्यवस्था उसके संरक्षण में जुटी रहती है।

अफजल के मामले में भी यही होता दिख रहा है। जिन लोगों ने इस फांसी का विरोध करने की लोकतांत्रिक कोशिश की, उनके चेहरों पर पुलिस की मौजूदगी में कालिख पोती गई। अमन-चैन कायम रखने के नाम पर नागरिकों को नजरबंद किया गया, एक पूरे राज्य का केबल-मोबाइल नेटवर्क ठप कर दिया गया, वहां कर्फ्यू लगा दिया गया। कैसे कोई यह पूछने की हिम्मत दिखाए कि इस फैसले से कश्मीर करीब आया या कुछ और दूर चला गया? कैसे कोई इस दावे पर सवाल उठाए कि यह आतंकवाद के खिलाफ एक बड़ी जीत है? कैसे कोई याद दिलाए कि हमारे लोकतंत्र में न्याय के वास्तविक तकाजे अभी बाकी हैं? कैसे कोई पूछे कि 1984 की सिख विरोधी हिंसा में मारे गए 3000 लोगों और 2002 के गुजरात में मारे गए 2000 लोगों की मौत का भी कोई इंसाफ होगा या नहीं?

यह सब पूछना देशद्रोह है- यह बताना भी कि अपने आप को सख्त राज्य साबित करने में जुटी सरकार दरअसल अपनी असली चुनौतियों से आंख चुरा रही है। आतंकवाद से लड़ने के लिए पुलिस तंत्र, खुफिया तंत्र और न्याय तंत्र में जो बदलाव जरूरी हैं उनका दूर-दूर तक कुछ अता-पता नहीं है। हम एक तार-तार सुरक्षा वाली व्यवस्था में रह रहे हैं जिसका फायदा कोई भी उठा सकता है। इस व्यवस्था को सुधारने की जगह, उसे अचूक और अभेद्य बनाने की जगह, सरकार अफजल को फांसी पर चढ़ाकर वाहवाही लूटने में लगी है।

हकीकत यह है कि भारत न सख्त राज्य है न नरम राज्य, यह एक नाकाबिल राज्य है जो अपना निकम्मापन ढकने के लिए फांसी का इस्तेमाल कर रहा है।

(प्रियदर्शन एनडीटीवी इंडिया में वरिष्‍ठ संपादक। जनसत्ता में सहायक संपादक रहे। कहानियां और कविताएं लिखते हैं। अखबारों में यदा-कदा वैचारिक टिप्‍पणियां भी। तहलका में नियमित स्‍तंभ लेखन । यह लेख तहलका हिंदी से साभार। उनसे priyadarshan.parag@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

Saturday, February 16, 2013

कानून की किताबें अलग रखकर हर मामले पर जनमत संग्रह करायें



protest of afzal-guru-hangingफ्रांस में साल 1903 के कैप्टन एल्फर्ड ड्रेफस के मुकदमे का उदाहरण कोई वकील देना नहीं पसंद करता। पाकिस्तान में कोई भी वकील साल 1989 के बाद जुल्फिकार अली भुट्टो के मुकदमे को अदालत में संदर्भ के रुप में पेश नहीं करता। इसी तरह क्या अफजल गुरु के फैसले को कोई भी चोटी का भारतीय वकील किसी भी अदालत के सामने कानूनी मिसाल के रुप में दे कर किसी भी अभियुक्त के लिए मौत की मांग करेगा?

उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में कैप्टन ड्रेफस पर आरोप था कि उसने राष्ट्रीय रहस्य जर्मनों के दे किए। बाद में पता चला कि यह काम वास्तव एक अन्य अधिकारी ने किया था जिसे बचाने के लिए सैन्य अदालत ने ड्रेफस को आजीवन कारावास की सजा सुना दी थी। पांच साल बाद जब सच सामने आया तो ड्रेफस को सम्मान के साथ सेना में उनके पद पर बहाल कर दिया गया। इस प्रकार फ्रांसीसी सेना के एक दल की यहूदी विरोधी भावना को संतुष्ट करने की कोशिश को उदार फ्रांसीसी समाज ने खिड़की से बाहर फेंक दिया।

बीसवीं सदी के सातवें दशक में जुल्फिकार अली भुट्टो को इस तथ्य के बावजूद मौत की सजा सुनाई गई कि भुट्टो अपराध में सीधे शामिल नहीं थे। अदालत का फैसला सर्वसम्मत नहीं बल्कि विभाजित था। फिर भी उस समय की लोकतंत्र विरोधी सैन्य सरकार ने जनता की आत्मा की संतुष्टि के लिए भुट्टो को फांसी पर लटका दिया गया। लेकिन आज तक इस फैसले की फूली लाश पाकिस्तान की राष्ट्रीय अंतरात्मा पर बोझ बनी तैर रही है।

मोहम्मद अफजल गुरु को 13 दिसंबर, 2001 को भारतीय संसद पर हमले के दो दिन बाद हमले में सीधे शरीक ना होने के बावजूद पकड़ा गया था। उनके साथ एसएआर गिलानी, शौकत गुरू और उसकी पत्नी अफशां को भी हिरासत में लिया गया था। पुलिस ने अफजल के कब्जे से पैसे, एक लैपटॉप और मोबाइल फोन भी खोज लिया लेकिन उन्हें सीलबंद करना भूल गई। लैपटॉप में सिवाय गृह मंत्री के जाली अनुमति पत्र और संसद में प्रवेश के अवैध पासों के अलावा कुछ नहीं निकला। शायद आरोपी ने सब कुछ डिलिट कर दिया था सिवाय सबसे महत्वपूर्ण सबूतों के।

जाने क्यों अफजल को पूरे हिंदुस्तान से उसकी पसंद का एक वकील भी नहीं मिला। सरकार की ओर से एक जूनियर वकील दिया गया, उसने भी अपने मुवक्किल को कभी गंभीरता से नहीं लिया। एक आम आदमी से अफजल के आतंकवाद की ओर आकर्षित होने, फिर प्रायश्चित करने, प्रायश्चित करने के बावजूद सुरक्षा बलों के हाथों बार-बार दुव्र्यवहार का शिकार होने और दुव्र्यवहार के बावजूद एक पढ़े-लिखे नागरिक की तरह जीवन गुजारने की गंभीर प्रयासों की कहानी पर ऊपर से नीचे तक किसी भी अदालत ने कान धरने की कोशिश नहीं की।

जिस मामले में न्याय के सभी आवश्यकताओं के पूरा होने के संदेह पर दो भारतीय राष्ट्रपतियों को अफजल गुरु की फांसी को रोक रखा। अंततः तीसरे राष्ट्रपति ने अनुमति दे दी। इस तरह सुप्रीम कोर्ट के फैसले की यह पंक्तियां जीत गईं कि हालांकि आरोपी के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है बावजूद इसके समाज की सामूहिक अंतरात्मा तभी संतुष्ट होगी जब दोषी को सजा-ए-मौत दी जाए।

अब अगर इक्कीसवीं सदी की अदालतें भी न्याय की आवश्यकताओं से अधिक समाज के सामूहिक अंतरात्मा को संतुष्ट करने में रुचि ले रही हैं तो फिर मध्यकाल में चर्च की धार्मिक अदालतों ने यूरोप में लाखों महिलाओं को चुड़ैल और लाखों पुरुषों को धर्म से विमुख बताकर जीवित जला दिया उन्हें क्या बोलें। वह अदालतें भी समाज का सामूहिक अंतरात्मा ही संतुष्ट कर रही थीं।

रूस और पूर्वी यूरोप में पिछले बारह सौ साल में हर सौ डेढ़ सौ साल बाद यहूदी अल्पसंख्यकों के नस्ली सफाए की क्यों निंदा की जाए। यह नेक काम भी बहुमत की सामूहिक अंतरात्मा को संतुष्ट करने के लिए ही हो रहा होगा।

संभव है कि गुजरात में जो कुछ हुआ इससे भी राज्य के सामाजिक बहुमत के लोगों का दिल ठंडा हुआ होगा।

तो फिर कानून की किताबें भी अलग रख दीजिए और हर मामले पर जनमत संग्रह कराएं। बहुमत अगर कह दे कि फांसी दो तो फांसी दे दो। सिर्फ इतने से काम के लिए गाऊन पहनने, कठघरे बनवाने, कानूनी की किताबें जमा करने और सुनवाई दर सुनवाई क्यों करना?

(वुसतुल्लाह खान पाकिस्तान के रहनेवाले हैं। बीबीसी उर्दू सेवा के जाने माने रिपोर्टर वुसतुल्लाह खान राजनीति और जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अपनी विशेष टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। उनकी यह टिप्पणी बीबीसी हिंदी के ब्लॉग से साभार)

Thursday, February 14, 2013

अफज़ल गुरु से एक मुलाकात



हिंदी मीडिया में पहली बार प्रकाशित
तिहाड़ जेल से अफ़ज़ल गुरु का लिया गया पहला साक्षात्कार
अफज़ल गुरु से विनोद के जोसे की विशेष बातचीत

आप पेशेवर रूप से पूछेंगे तो मैं कहूंगा कि मेरा बेटा एक डॉक्टर बने, क्योंकि यह मेरा अधूरा सपना है. लेकिन मैं अपने बच्चे के लिए जो सबसे जरूरी मानता हूं वो यह कि वो निर्भय हो. मैं चाहता हूं कि वो अन्याय के खिलाफ बोले और मुझे उम्मीद है कि वो ऐसा करेगा. आखिर मेरे बेटे और बीबी से बेहतर अन्याय को कौन जान सकता है...अनुवाद- अजय प्रकाश और विश्वदीपक

तिहाड़ जेल में करीब 4.30 बजे मेरी मुलाकात की बारी आई. एक वर्दीधारी ने मेरा ऊपर से नीचे तक परीक्षण किया. जब मेटल डिटेक्टर चीं-चीं की आवाज करने लगा तब मुझे बेल्ट, स्टील की घड़ी और चाबियों को निकालने के लिए कहा गया. उस वक्त ड्यूटी में तैनात तामिलनाडु स्पेशल पुलिस का वह जवान मेरी जाँच के बाद संतुष्ट लग रहा था. अब मुझे अंदर जाने की इजाजत दे दी गई थी. ये चौथी बार था जब तिहाड़ सेंट्र्ल जेल के अति खतरनाक वार्ड के जेल नंबर तीन में जाने के लिए सुरक्षा जांच की गई थी. मैं उस वक्त मोहम्मद अफजल से मिलने जा रहा था, जो उस दौर की चर्चाओं में सर्वाधिक था.
मैं एक ऐसे कमरे में दाखिल हुआ, जहां कई क्यूबिकल बने हुए थे. एक मोटा कांच और लोहे की सलाखें कैदियों को मुलाकातियों से अलग करती थीं. दीवार पर चस्पां एक माइक्रोफोन के जरिए मुलाकाती और कैदी एक दूसरे के संपर्क में आते थे. हालांकि माइक्रोफोन की आवाज घटिया थी. मुलाकाती और कैदी को एक दूसरे की बात समझने के लिए दीवार से कान लगाना पड़ता था. मैंने देखा कि क्यूबिकल से दूसरी ओर मोहम्मद अफजल पहले से ही खड़ा था. उसके चेहरे पर गरिमा और शांति की झलक थी. दुबली पतली काया, नाटे कद और जेब में रेनाल्ड का पेन रखे हुए अफजल की उम्र उस वक्त पैंतीस के आसपास रही होगी.

अफजल ने उस दिन सफेद कुर्ता पायजामा पहन रखा था.बेहद विनम्रता से भरी हुए एक स्पष्ट आवाज ने मेरा स्वागत किया- 'कैसे हैं श्रीमान.'मैंने कहा, “अच्छा हूं”. क्या मुझे बदले में मौत के दरवाजे पर खड़े उस इंसान से भी यही सवाल पूछना चाहिए. कुछ देर के लिए मैं सोच में पड़ गया, लेकिन अगले ही पल मैंने पूछ ही लिया. “शुक्रिया! मैं एकदम ठीक हूं”-- उसने जवाब दिया. अफजल से मेरी ये मुलाकात उस दिन करीब एक घंटा और (पंद्रह दिन के अंतराल के बाद) दूसरी मुलाकात तक चली. हम दोनों को पूछने और जानने की जल्दी थी. मैं लगातार अपनी छोटी डायरी में लिखता रहता था. उसे देखकर ऐसा लगा जैसे वो दुनिया से बहुत कुछ कहना चाहता था. लेकिन बारंबार वो लोगों से अपनी बात न कह पाने की असहायता जाहिर करता था. पेश है उससे बातचीत के अंश -
afzal-guru
एक अफजल के कई चेहरे हैं. मैं किस अफजल से मिल रहा हूं?
क्या वाकई ऐसा है. जहां तक मेरा सवाल है मैं एक ही अफजल को जानता हूं. और वो मैं ही हूं. दूसरा अफजल कौन है. (थोड़ी चुप्पी के बाद) अफजल एक युवा है, उत्साह से भरा हुआ है, बुद्धिमान और आदर्शवादी युवक है.नब्बे के दशक में जैसा कि कश्मीर घाटी के हजारों युवक उस दौर की राजनीतिक घटनाओं से प्रभावित हो रहे थे वो (अफजल) भी हुआ. वो जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का सदस्य था और सीमा पर दूसरी ओर चला गया था. लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद वो भ्रम का शिकार हो गया और उसने सीमा पार की और वापस इस तरफ आ गया. और एक सामान्य जिंदगी जीने की कोशिश करने लगा, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. वो मुझे बार-बार उठाते रहे. प्रताड़ित करके मेरा भुर्ता बना दिया, बिजली के झटके दिए गए, ठंडे पानी में जमा दिया गया, मिर्च सुंघाया गया...और एक फर्जी केस में फंसा दिया गया. मुझे न तो वकील मिला, न ही निष्पक्ष तरीके से मेरा ट्रायल किया गया. और आखिर में मुझे मौत की सजा सुना दी गई. पुलिस के झूठे दावों को मीडिया ने खूब प्रचारित किया और सुप्रीम कोर्ट की भाषा में जिसे देश की सामूहिक चेतना कहते हैं वो मीडिया की ही तैयार की हुई है. देश की उसी सामूहिक चेतना को संतुष्ट करने के लिए मुझे मौत की सजा सुनाई गई. मैं वही मोहम्मद अफजल हूं, जिससे आप मुलाकात कर रहे हैं.
(फिर थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बोलना जारी) मुझे शक है कि बाहर की दुनिया को इस अफजल के बारे में कुछ भी पता है या नहीं. मैं आपसे ही पूछना चाहता हूं कि क्या मुझे मेरी कहानी कहने का मौका दिया गया? क्या आपको भी लगता है कि न्याय हुआ है? क्या आप एक इंसान को बिना वकील दिए हुए ही फांसी पर टांगना पसंद करेंगे?बिना निष्पक्ष कार्रवाई के, बिना ये जाने हुए कि उसकी जिंदगी में क्या कुछ हुआ? क्या लोकतंत्र का यही मतलब है?

क्या हम आपकी उस जिंदगी के बारे में बात करें जो केस शुरू होने से पहले थी?
वो दौर कश्मीर में भयानक उथल पुथल का था, जब मैं बड़ा हो रहा था. मकबूब भट्ट को सूली पर चढ़ाया जा चुका था. स्थिति काफी विस्फोटक थी. कश्मीर के लोगों ने शांति के रास्ते से चुनाव लड़कर कश्मीर का मसला सुलझाने की कोशिश की थी. कश्मीर मसले के अंतिम समाधान के लिए, कश्मीर के लोगों की भावनाओं को बयान करने के लिए मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट बनाया गया था. लेकिन दिल्ली में बैठी सरकार एमयूएफ को मिल रहे समर्थन से भयभीत हो गई थी. और इसका अंजाम ये हुआ कि लोगों ने चुनाव में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया. लेकिन जिन नेताओं ने चुनाव में भारी मतों से जीत हासिल की उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. उनका अपमान किया गया और उन्हें जेल में डाल दिया गया. इसी घटना के बाद उन्हीं नेताओं ने हथियार बंद संघर्ष का आह्वान किया. हजारों युवाओं ने हथियार बंद विद्रोह का रास्ता चुना. झेलम मेडिकल कॉलेज, श्रीनगर में मैंने अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ दी. मैं उन लोगों में से भी था, जिन्होंने जेकेएलएफ के सदस्य के तौर पर सीमा पार की थी, लेकिन जब मैंने देखा कि पाकिस्तान के नेता भी कश्मीर के मसले पर उसी तरह का (दोहरा) रवैया रखते हैं जैसे भारत के तो मैं भ्रम का शिकार हो गया. कुछ सप्ताह बाद मैं वापस आ गया. मैंने सुरक्षा कर्मियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. मुझे बीएसएफ ने आत्मसमर्पण किए हुए आतंकी का सर्टिफिकेट भी दिया. मैंने अपनी सामान्य जिंदगी शुरू कर दी. मैं डॉक्टर तो नहीं बन सका लेकिन मैं दवाओं का डीलर जरूर बन गया. इसके बदले में मुझे कमीशन मिलता था. (हंसी)
अपनी छोटी सी ही कमाई के सहारे मैंने एक स्कूटर खरीद ली और मैंने शादी भी कर ली. इस दौरान एक भी दिन ऐसा नहीं बीता जब राष्ट्रीय राइफल्स और एसटीएफ के जवानों ने मुझे प्रताड़ित न किया हो. अगर कश्मीर में कहीं भी आंतकी हमला होता तो वो नागरिकों को पकड़ते और उन्हें प्रताड़ित करते. मुझ जैसे आतंकवादियों ने जिसने समर्पण कर दिया था, उनकी स्थिति तो और भी खराब थी. वो हमें कई हफ्तों के लिए बंद कर देते, झूठे केस में फंसा देने की धमकी देते और हम तभी छूटते जब हम उन्हें घूस के रूप में मोटी रकम देते. मेरे साथ तो ऐसा कई बार हुआ है. 22 राष्ट्रीय राइफल्स के मेजर राम मोहन रॉय ने तो मेरे गुप्तांगों तक में करंट लगवाया. कई बार मुझसे वो लोग उनके पखाने और कैंपस तक साफ करवाते थे. हुमहामा में मौजूद एसटीएफ के प्रताड़ना शिविर से बचने के लिए तो मैंने बकायदा एक बार सुरक्षा कर्मियों को घूस तक दिया था. डीएसपी विनय गुप्ता और दविंदर सिंह की देख रेख में मुझे प्रताड़ित किया गया. प्रताड़ित करने में माहिर इंस्पेक्टर शांति सिंह ने एक बार मुझे तीन घंटे तक प्रताड़ित किया. और वो तब तक ऐसा करता रहा जब तक मैं एक लाख बतौर घूस देने के लिए तैयार नहीं हो गया. रकम पूरी करने के लिए मेरी पत्नी ने अपने जेवर बेच दिए. मुझे अपनी स्कूटर भी बेचनी पड़ी. जब मैं प्रताड़ना शिविर से बाहर निकला तब तक मैं मानसिक और आर्थिक रूप से टूट चुका था. छह महीने तक मैं घर के बाहर नहीं निकल सका क्योंकि मैं अंग भंग हो गया था. मैं अपनी पत्नी के साथ बिस्तर पर भी नहीं जा सकता था क्योंकि मेरे गुप्तांगों को बिजली के झटके दिए गए थे. इसके इलाज के लिए मुझे दवाईयां खानी पड़ी...
(जब अफजल ये सब बता रहा था तो उसके चेहरे की शांति भंग हो चुकी थी. ऐसा लगता था जैसे उसके पास मुझे बताने के लिए ज्यादा से ज्यादा बातें हैं, लेकिन मेरे टैक्स के पैसे से चलने वाली सुरक्षा एजेंसियों की प्रताड़ना की इतनी कहानियां सुनने मैं असमर्थ था. मैंने बीच में ही उसे टोक दिया...)

अगर आप केस के बारे में बात कर सकें तो बताएं...वो कौन सी घटनाएं थीं, जिनके बाद संसद पर हमला हुआ ?
आखिरकार एसटीएफ कैंप में (प्रताड़ना के बाद) मैं ये सीख चुका था कि आप चाहे एसटीएफ का सहयोग करें या विरोध आप या आपके परिवार वालों को परेशान होना ही है. मेरे पास शायद ही कोई विकल्प था. डीसीपी दविंदर सिंह ने मुझसे कश्मीर में कहा कि तुम्हें दिल्ली में एक छोटा सा काम करना है. ये उसके लिए "छोटा सा काम" था. दविंदर सिंह ने मुझे कहा कि मुझे एक आदमी को दिल्ली लेकर जाना है और उसके लिए किराए का ठिकाना खोजना था. मैं उस आदमी से पहली बार मिला था. चूंकि वो कश्मीरी नहीं बोल रहा था, इसलिए मुझे लगा कि वो आदमी बाहरी था. उसी ने मुझे बताया कि उसका नाम मोहम्मद था. (पुलिस ने मोहम्मद की पहचान संसद पर हमला करने वाले पांचों आतंकिवादियों के नेता के अगुवा के तौर पर की है. पांचों आतंकवादी हमले में मारे गए थे.) जब हम दिल्ली में थे, तब मुझे और मोहम्मद दोनों को दविंदर सिंह फोन करता था. मैंने नोटिस किया कि मोहम्मद दिल्ली में कई लोगों से मिलता था. जब उसने एक कार खरीद ली तब उसने मुझे उपहार के तौर पर 35 हजार रुपये दिए. इसके बाद मैं ईद का त्यौहार मनाने कश्मीर चला गया. जब मैं श्री नगर बस स्टैंड से सोपोर रवाना होने वाला था, तब मुझे गिरफ्तार कर लिया गया और परिमपोरा थाने ले जाया गया. वहां मुझे प्रताड़ित किया गया. इसके बाद वो लोग मुझे एसटीएफ हेडक्वार्टर ले गए और वहां से मुझे दिल्ली लाए. दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के प्रताड़ना शिविर में मैंने उन लोगों को वो सब कुछ बताया जो मोहम्मद के बारे में मुझे पता था. लेकिन वो लोग मुझे ये मनवाने पर अड़े थे कि मेरा चचेरा भाई शौकत, उसकी पत्नी नवजोत और एसएआर गिलानी के साथ मैं ही संसद हमले का जिम्मेदार था.
वो चाहते थे कि ये बात मैं पूरी दृढ़ता से मीडिया के सामने कहूं. हालांकि मैंने इसका विरोध किया. लेकिन मेरे पास कोई विकल्प ही नहीं था. मेरा परिवार उन लोगों की गिरफ्त में था. मुझसे सादे कागज में दस्तखत कराए गए और कहा गया कि मुझे मीडिया से बात करनी है. मुझसे जबरन वही बातें कहलवाई गईं जो पुलिस मुझे पहले से ही रटा चुकी थी. इसमें संसद पर हमले की जिम्मेदारी लेना भी शामिल था. जब एक पत्रकार ने मुझसे एसएआर गिलानी के बारे में पूछा तो मैंने कहा कि वो निर्दोष है. तब एसीपी राजबीर सिंह भरी मीडिया के सामने चिल्ला उठा. वो लोग मुझसे इस बात के लिए नाराज थे कि मैंने उनकी सिखाई हुई बातों से अलग भी कुछ कह दिया था. उस वक्त राजबीर सिंह ने पत्रकारों से गिलानी को निर्दोष ठहराने वाली मेरी बाइट न चलाने के लिए भी कहा था.
अगले दिन राजबीर सिंह ने मुझे मेरी बीबी से बात करने की इजाजत दी. साथ ही उन्होंने धमकी भी दी कि अगर तुम अपनी बीबी का जीवित देखना चाहते हो तो हम जैसा कहते हैं वैसा करो. ऐसे में मेरे सामने एक ही विकल्प था कि मुझपर लगाये गये आरोपों को मैं स्वीकार कर लूं. दिल्ली स्पेशल सेल की टीम ने मुझसे यह भी कहा कि जैसा हम चाहते हैं तुम आरोपों को उसी तरह स्वीकार कर लेते हो तो तुम्हारे मुकदमे को हम कमजोर कर देंगे और मुझे जल्द ही रिहा कर दिया जायेगा. उसके बाद वे मुझे कई उन जगहों और बाजारों में ले गये जहां से मोहम्मद ने सामान खरीदे थे. इन सबको बाद में पुलिस ने सबूत बतौर पर पेश किया.
मैं कह सकता हूं कि जब दिल्ली पुलिस संसद हमले के मुख्य साजिशकर्ता को पकड़ने में नाकाम रही, तो उसने अपना मुंह छुपाने के लिए मेरा इस्तेमाल किया और मैं बलि का बकरा बना. पुलिस ने लोगों को मूर्ख बनाया. लोगों को आज भी नहीं पता कि संसद पर हमले की योजना किसकी थी. मैं पहले एक मामले में कश्मीर एसटीएफ की जाल में फंसाया गया और फिर उसी का दोहराव दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने किया.
मीडिया लगातार उस टेप को प्रसारित कर रहा है, पुलिस अधिकारी पुरस्कृत हो रहे हैं और मैं मौत का सजायाफ्ता.

आपको अबतक कानूनी मदद क्यों नहीं मिल सकी?
मुझे कभी मौका मिलता तब तो. मैंने ट्रायल के छह महीने तक अपने परिवार वालों को नहीं देखा. और जब एक बार सुनवाई के दौरान पटियाला कोर्ट में देखा भी, तो बहुत कम समय के लिए. मुझे कोई नहीं मिला जो मेरे लिए एक अदद वकील का इंतजाम करता. इस देश में किसी को भी कानूनी अधिकार पाने का मौलिक हक है, इस उम्मीद से मैंने चार वकीलों को नाम बताया, जिनसे मुझे उम्मीद थी कि वह मेरा केस लड़ सकते हैं. लेकिन एसएन ढिंगरा ने बताया कि सभी चार वकीलों ने मेरा मुकदमा लड़ने से इनकार कर दिया है. मेरे लिए अदालत ने जो वकील नियुक्त किया, वह मुकदमे की सुनवाई के दौरान कुछ पेंचीदे दस्तावेज पेश करने लगीं, वह भी मुझसे पूछे बिना कि मामले का सच क्या है? उन्होंने मेरे मुकदमे की ठीक से पैरवी नहीं की और मेरी पैरवी छोड़ इस मामले के दूसरे आरोपी का मुकदमा लड़ने लगीं. फिर अदालत ने एक एमीकस क्यूरी (अदालत का मददगार) की नियुक्ति की, जो मेरा बचाव नहीं करते थे, बल्कि इस मामले में अदालत को मदद देते थे. मेरे लिए नियुक्त एमीकस क्यूरी मुझसे कभी नहीं मिले. उन्होंने मुझसे हमेशा एक दुश्मन की तरह बर्ताव किया, वे बेहद सांप्रदायिक थे. मैं कह सकता हूं कि ट्रायल की स्थिति में मेरा पक्ष सिरे से रखा ही नहीं गया.
इस मामले की सच्चाई यही है कि ऐसे संवदेनशील केस में पैरवी के लिए एक वकील नहीं था. किसी मुकदमे में वकील के न होने का क्या मतलब होता है, यह कोई भी समझ सकता है. अगर सरकार मुझे फांसी पर ही लटकाना चाहती है तो ऐसे लंबी उबाऊ कानूनी प्रक्रिया का मेरे लिए कोई मतलब नहीं है.

आप दुनिया से क्या अपील करना चाहते हैं?
मेरे पास कुछ खास अपील करने को नहीं है. मुझे जो कहना है वह भारत के राष्ट्रपति को भेजी याचिका में कह दिया है. मैं सिर्फ सीधी सी बात यह कहना चाहता हूं कि अंधराष्ट्रवाद और गलत समझदारी के फेर में पड़कर अपने ही देश के नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को नहीं छीनना चाहिए. इस मामले के दूसरे आरोपी एसएआर गिलानी (अब बरी) की उस बात को मैं याद दिलाना चाहता हूं, जब उन्हें ट्रायल कोर्ट ने फांसी की सजा मुकर्रर की. उन्होंने कहा था, शांति, न्याय से बहाल होती है. जहां न्याय नहीं है वहां शांति नहीं होगी.’ कुल मिलाकर मैं भी यही कहना चाहता हूं. अगर वह चाहते हैं तो मुझे फांसी पर लटका दें, लेकिन याद रखें कि यह भारतीय न्यायिक और राजनीतिक तंत्र पर एक काला धब्बा होगा.

जेल में आपकी क्या स्थिति है?
मुझे अत्यधिक निगरानी के बीच अकेले एक कालकोठरी में रखा गया है. मैं अपनी कालकोठरी से दोहपर में बहुत कम समय के लिए बाहर आ पाता हूं. रेडियो, टेलीविजन की मेरे लिए मनाही है. यहां तक कि मुझे अखबार फाड़कर पढ़ने को दिया जाता है. अखबारों में मेरे बारे में जो खबर छपती है, उसे पूरे तौर पर फाड़ दिया जाता है.

भविष्य की अनिश्चितता के बीच समाज को लेकर आपकी मुख्य चिंताएं क्या हैं?
हां, बहुत सारी चीजों से मेरे सरोकार जुड़े हुए हैं. भारत की विभिन्न जेलों में कश्मीर से ताल्लुक रखने वाले लोग बिना वकीलों के, बगैर ट्रायल के बंद हैं. उन्हें कोई कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं है. कश्मीरी नागरिकों की हालत भी इससे अलग नहीं है. घाटी अपने आप में एक खुली जेल है. हर रोज फर्जी मुठभेड़ की खबरें आती रहती हैं, लेकिन यह सिर्फ कुछेक उदाहरण भर हैं. कश्मीर के पास सबकुछ है, मगर आप उसे एक शिष्ट समाज के रूप में देखना ही नहीं चाहते. कश्मीरी नागरिक यंत्रणाओं-प्रताड़नाओं के बीच जीते हैं, उन्हें मुश्किल से न्याय मिल पाता है.
इन सबके अलावा और भी बहुत सारी बातें मेरे दिगाम में आती हैं. विस्थापित हो रहे किसानों की समस्या और दिल्ली में सील कर दिये गये दुकानदारों की हालत भी मुझे परेशानन करती हैं. देश में बहुत तरीके से अन्याय हो रहे हैं, जिन्हें देखा जा सकता है, चिन्हित किया जा सकता है, लेकिन इसके खिलाफ कुछ किया नहीं जा सकता. कल्पना नहीं कर सकते कि कितने हजारों लोगों की जिन्दगी, उनके परिवार इसकी जद में आ रहे हैं. ये तमाम चीजें मुझे परेशान करती हैं.
थोड़ा सोचते हुए-
दुनिया में हो रहे भूमंडलीय विकास के बारे में भी मैं सोचता हूं. मैंने सद्दाम की फांसी के बारे में सुना तो मुझे बहुत दुख हुआ. ये सोचकर स्तब्ध रह गया कि क्या अन्याय इतना सरेआम और बेशर्मी से किया जा सकता है. दुनिया की महान सभ्यता ‘मेसोपोटामिया’ की भूमि ईराक, जिसने हमें साठ मिनट का घंटा दिया, चौबीस घंटे और 360 डिग्री का ज्ञान दिया उसे अमेरिका ने धूल-धूसरित कर दिया. अमेरिका तमाम सभ्यताओं और मूल्यों को नष्ट कर रहा है. आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका का यह तथाकथित युद्ध सिर्फ नफरत फैलाने और तबाही के लिए है.

आजकल आप कौन सी किताबों को पढ़ रहे हैं?
मैंने हाल ही में अरूंधति रॉय की किताब पढ़ी हैं. अब में सात्र का अस्तित्ववाद का सिद्धांत पढ़ रहा हूं. जेल की लाइब्रेरी में बहुत कम और साधारण किताबें हैं. इसलिए मैंने एसपीडीपीआर (सोसायटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ़ डिटेंनिज एंड प्रिजनर्स राइट) के सदस्यों से किताबों के लिए अपील की है.

एसपीडीआर आपके समर्थन में एक अभियान है न?
जी हाँ. उन हजारों लोगों का मैं तहेदिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जो मुझ पर हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़े हैं. इनमें वकील, छात्र, लेखक, बुद्धिजीवी और समाज के अन्य तबकों के तमाम लोग शामिल हैं. मेरी गिरफ्तारी दिसंबर 2001 के कई महीनों बाद तक मुझे लगता रहा कि शायद मेरे मामले में न्यायप्रिय लोग खड़े नहीं होंगे. लेकिन जब एसएआर गिलानी को इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने बरी कर दिया तो लोगों ने पुलिसिया कहानी पर सवाल उठाने शुरू कर दिये. जैसे-जैसे लोगों को इस कहानी का झूठ पता चला वे न्याय के पक्ष में खड़े हो आवाज उठाने लगे. अब लोग मेरे पक्ष में खुलकर आ रहे हैं और कह रहे हैं कि अफजल के साथ अन्याय हुआ है. यही सच भी है.

आपके परिजन मुकदमे को लेकर विरोधाभासी बयान दे रहे हैं?
मेरी बीबी लगातार कह रही है कि मुझे गलत ढंग से फंसाया गया है. उसने बहुत नजदीक से देखा है कि एसटीएफ मुझे किस तरह यंत्रणा देती थी. एसटीएफ ने मुझे कभी चैन से जीने नहीं दिया. मेरी बीबी यह भी अच्छी तरह जानती है कि इस मामले में मुझे किस तरह फंसाया गया. वह चाहती है कि मैं अपने बेटे गालिब को अपनी आंखों के सामने बढ़ते हुए देखूं. मेरे एक बड़े भाई भी हैं जो बखूबी जानते हैं कि एसटीएफ ने किस तरह मुझे दबाव में रखा और वे लगातार इसका विरोध करते रहे हैं. लेकिन अब वो मेरे मामले में कोई अलग बयान दें तो मैं क्या कह सकता हूं?
देखिये, कश्मीर में जो काउंटर इनसर्जेंसी के नाम पर ऑपरेशन किये जा रहे हैं उसने बहुत गंदा स्वरूप ले लिया है, जो भाई को भाई और पड़ोसी को पड़ोसी के खिलाफ खड़ा कर रहा है. अपने गंदे इरादों से वे एक समाज को तोड़ रहे हैं. जहां तक मेरे समर्थन में किये जा रहे अभियानों का सवाल है तो मैंने सिर्फ एसपीडीपीआर से ही सहयोग की अपील की है और उन्हें ही अधिकृत मानता हूं. यह संस्था एसएआर गिलानी और कार्यकर्ताओं के एक समूह द्वारा चलायी जाती है.

अपनी बीबी तबस्सुम और बेटे गालिब के बारे में सोचते हैं तो दिमाग में क्या ख्याल आते हैं?
हमारी शादी का यह दसवां साल है, जिसमें से आधा मैंने जेल में बिताया है. इससे पहले भी कई बार भारतीय सुरक्षाबलों ने कश्मीर में मुझे उठाया और पीड़ित किया. तबस्सुम मेरी शारीरिक और मानसिक यंत्रणाओं से बखूबी वाकिफ है. यंत्रणा कैंपों से लौटने के बाद कई बार मेरी हालत खड़े होने लायक नहीं रहती थी. शारीरिक प्रताड़ना के दौरन मेरे लिंग पर तक बिजली के झटके दिये जाते थे. तबस्सुम ने हमेशा मुझे जीने का साहस दिया. हम लोग एक दिन भी चैन से नहीं रहते थे. हालांकि यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं, तमाम कश्मीरी जोड़ों की है. कश्मीरी घरों में भय का बने रहना जीवन का सबसे प्रभावी अहसास है. बच्चा हुआ तो हम बहुत खुश थे. हमने अपने बच्चे का नाम महान गजलकार मिर्जा गालिब के नाम पर रखा. हमारा सपना था कि हम गालिब को बढ़ता हुआ देखें. मैं बहुत कम समय उसके साथ बिता पाया. गालिब के दूसरे जन्मदिन के बाद मुझे पुलिस ने फंसा लिया.

अपने बेटे को आप किस रूप में बढ़ता हुआ देखना चाहते हैं?
अगर आप पेशेवर रूप से पूछेंगे तो मैं कहूंगा कि वो एक डॉक्टर बने, क्योंकि यह मेरा अधूरा सपना है. लेकिन मैं अपने बच्चे के लिए जो सबसे जरूरी मानता हूं वो यह कि वो निर्भय हो. मैं चाहता हूं कि वो अन्याय के खिलाफ बोले और मुझे उम्मीद है कि वो ऐसा करेगा. आखिर मेरे बेटे और बीबी से बेहतर अन्याय को कौन जान सकता है.

अगर कश्मीर समस्या के बारे में पूछें तो आप इसका क्या हल देखते हैं?
सबसे पहले सरकार को कश्मीरी आवाम के प्रति संवेदनशील होना होगा और कश्मीर का वास्तविक प्रतिनिधित्व करने वालों के साथ वार्ता करनी चाहिए. भरोसा कीजिये कश्मीर का वाजिब प्रतिनिधित्व करने वाले ही समस्या का हल निकाल सकते हैं. लेकिन अगर सरकार काउंटर इनसर्जेंसी के टैक्टिस के तौर पर शांति वार्ता का नाटक करेगी तो इस समस्या का कोई समाधान नहीं है. अब समय आ गया है कि इस मामले को गंभीरता से लिया जाये.

कौन हैं कश्मीर के वास्तविक प्रतिनिधि?
मैं किसी एक का नाम नहीं लेना चाहता. इनका चुनाव कश्मीरी आवाम की भावनाओं के मद्देनजर किया जा सकता है. साथ ही मैं भारतीय मीडिया से अपील करना चाहता हूं कि वो इस मामले में दुष्प्रचार न करे, आवाम को सच से परिचित कराये. गलत तथ्य, आधी-अधूरी खबरें, राजनीतिक प्रभाव वाले समाचार ये कुछ ऐसी चीजें हैं जो क’मीर में कट्टरपंथी और आतंकी ताकतों को खड़ा कर रहे हैं. इस तरह के पत्रकार खुफिया एजेंसियों के खेल में आसानी से शामिल हो जाते हैं और ऐसी असंवेदनशील पत्रकारिता आखिरकार समस्याओं को बढाती ही है. इसलिए सबसे जरूरी है कि मीडिया कश्मीर के बारे में गलत सूचनायें देनी बंद करे. भारतीय नागरिकों को कश्मीरी संघर्ष का इतिहास का सच जानने दिया जाये जिससे वे वहां की जमीनी हकीकत से रू-ब-रू हो सकें. अगर भारत सरकार कश्मीरी आवाम की इच्छा अनुरूप समस्याओं के हल की पहल नहीं करती है तो यह क्षेत्र हमेशा संघर्षों के हवाले रहेगा.
दूसरा, जब भारतीय न्यायतंत्र जेलों में बंद सैकड़ों कश्मीरियों को बिना वकील और बगैर फेयर ट्रायल के फांसी देने पर आमादा है तो कश्मीरी आवाम के बीच इसका क्या संदेश जायेगा. बुनियादी हकों को बहाल किये बगैर कश्मीर समस्या का समाधान कैसे संभव है? इसका एकमात्र उपाय है कि भारत-पाकिस्तान दोनों की ही लोकतांत्रिक संस्थायें मसलन संसद, न्यायपालिका, मीडिया, बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ इस मसले पर गंभीरता से पेश आयें.

संसद हमले में नौ सुरक्षाबलों के जवान मारे गये, आप उनके परिजनों से क्या कहना चाहेंगे?
जिन्होंने अपने परिजनों को गंवाया है, मैं उनकी तकलीफ को महसूस कर सकता हूं. लेकिन मैं यह भी महसूस करता हूं कि उन्हें बहकाकर मुझ जैसे एक निर्दोष आदमी की फांसी से संतुष्ट करने की कोशिश की जा रही है. मुझे एक मोहरे के बतौर राष्ट्रवाद के नाम पर बलि का बकरा बनाया जा रहा है. मैं अपील करूंगा कि वे इससे बाहर निकलें और मेरे नजरिये से भी सोचें.

आप अपने जीवन में अब तक की क्या उपलब्धि देखते हैं?
मेरी अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि मेरे मुकदमे से जुड़े अन्याय के खिलाफ चले अभियान की है, जिसके जरिये एसटीएफ का खौफ उजागर हो पाया. मुझे ख़ुशी है कि सुरक्षाबलों द्वारा नागरिकों पर किये जा रहे अत्याचार, फर्जी मुठभेड़ों, उनके गायब होने, उन्हें प्रताडि़त किये जाने आदि पर अब लोगों के बीच चर्चा हो रही है. कश्मीरी इन्हीं सब सच्चाइयों के बीच बढ़े-पले हैं. कश्मीर के बाहर के लोगों को कतई नहीं मालूम है कि भारतीय सुरक्षाबल वहां क्या कहर ढाते हैं. अगर बिना अपराध के वो हमें मार भी दें तो यह कोई सवाल नहीं है. एक क’मीरी को बिना वकील की पैरवी के फांसी पर भी लटका दिया जाये तो यह कोई बड़ी बात नहीं होगी.

आप खुद को किस रूप में याद किया जाना पसंद करेंगे?
कुछ देर सोचने के बाद-
अफजल के रूप में, मोहम्मद अफजल के रूप में. मैं कश्मीरी आवाम के लिए भी अफजल हूं और भारतीयों के लिए भी, लेकिन दोनों की निगाह में अलग-अलग. मैं कश्मीरी लोगों के न्याय पर पर सहज विश्वास कर सकता हूं. सिर्फ इसलिए नहीं की मैं उनके बीच से हूं बल्कि इसलिए कि वे सच से बखूबी वाकिफ हैं. उन्हें कभी भी इतिहास या पुरातन में गलतबयानी के जरिये बहकाया नहीं जा सकता है.

विनोद के जोसे अंग्रेजी पत्रिका 'कारवां' के कार्यकारी संपादक हैं. वर्ष 2006 में अफज़ल गुरू का यह साक्षात्कार सबसे पहले रीडिफ़-कॉम में प्रकाशित हुआ था. अब आप इस साक्षात्कार को कारवां की वेबसाइट पर अंग्रेजी में देख सकते हैं.

Sunday, February 03, 2013

मैं खान हूं।



मैं कलाकार हूं। वक्त मेरे दिन को तय नहीं करता, जितनी दृढ़ता से छवियां करती हैं। छवियां मेरे जीवन पर राज करती हैं। घटनायें और यादें तस्वीर के रूप में खुद मेरे जेहन में अंकित हो जाती हैं। मेरी कला का मूल है- छवियां गढ़ने की क्षमता, जो देखनेवाले की भावनात्मक छवि के साथ मिल जाती है।
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मैं खान हूं। यह नाम ही मेरे जेहन में खुद कई प्रकार की छवियां उभारता है। जैसे घोड़े पर बैठा एक आदमी। सिर पर पगड़ी के नीचे से उसके बाल लहरा रहे हैं। एक सांचे में गढ़ दिया गया कट्टरपंथी। जो न नाचता है, न शराब पीता है, न ईशनिंदा करता है। शांत मोहक चेहरा। लेकिन जिसके अंदर हिंसक पागलपन सुलग रहा है। एक ऐसा पागलपन जो उसे ईश्वर के नाम पर खुद को खत्म कर देने को प्रेरित कर सकता है। तभी मेरे जेहन में अमेरिकी एयरपोर्ट के पीछे बने कमरे में मुझे ले जाने की तस्वीर उभरती है। कुछ कपड़े उतारना, जांच करना और बाद में कई सवाल। मुझे कुछ इस तरह का तर्क दिया गया कि आपका नाम हमारे सिस्टम में आ रहा है, इसके लिए माफी। फिर मेरे जेहन में अपने देश में खुद की छवि उभरती है। वहां मुझे मेगास्टार कहा जाता है। प्रशंसक प्यार और गर्व से मेरी प्रशंसा करते हैं।

मैं खान हूं। मैं कह सकता हूं कि इन सभी छवियों में मैं फिट हूं। सीमित ज्ञान और पहले से ज्ञात मानकों के आधार पर हम घटना, चीज और लोगों की परिभाषा तय करने में राहत महसूस करते हैं। इन परिभाषाओं से स्वाभाविक तौर पर उपजी संभावनाएं हमें अपनी सीमाओं के दायरे में सुरक्षित होने का आभास देती हैं। हम खुद-ब-खुद छवि का एक छोटा बक्सा बनाते हंै। ऐसा ही एक बक्सा मौजूदा समय में अपने ढक्कन को कस रहा है।

इसी बक्से में लाखों लोगों के जेहन में मेरे धर्म की छवि है। मेरे देश में मुस्लिम समाज को जब भी अपना पक्ष रखने की जरूरत होती है, मेरा सामना इससे होता है। जब कभी इस्लाम के नाम पर हिंसा की घटना होती है, मुझे मुसलिम होने के नाते इसकी भत्र्सना करने के लिए बुलाया जाता है। अपने समाज का प्रतिनिधित्व करने के लिए मुझे एक आवाज के तौर पर चुना जाता है, ताकि दूसरे समाज को प्रतिक्रिया देने से रोका जा सके।

मैं कभी-कभार, जाने-अनजाने कुछ राजनेताओं द्वारा भारत में मुस्लिमों की देशभक्ति पर संदेह और अन्य दूसरी गलतियों का एक प्रतीक बनाने के लिए चुन लिया जाता हूं। ऐसे भी मौके आये जब मुझ पर अपने देश की बजाय पड़ोसी मुल्क के प्रति वफादार होने का आरोप लगाया गया। हालांकि मैं भारतीय हूं और मेरे पिता ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी।

मैंने अपने बेटे और बेटी का अखिल भारतीय और अखिल धार्मिक नाम रखा। आर्यन और सुहाना। खान विरासत में मेरे द्वारा दिया गया है और वे इससे बच नहीं सकते। कभी-कभार वे पूछते हैं कि उनका धर्म क्या है और मैं दार्शनिक अंदाज में उनसे कहता हूं कि आप पहले भारतीय हैं और आपका धर्म मानवता है या पुराना गाना कि ‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा- इंसान की औलाद है इंसान बनेगा’। अमेरिकी जमीन पर जहां मुझे कई बार सम्मानित करने के लिए बुलाया गया, मेरे जेहन में कई विचार उभरे, जो एक खास संदर्भ में होते थे। एयरपोर्ट पर रोकने की घटना मेरे साथ कई बार हो चुकी है।

आतंकवादियों के आखिरी नाम से मेरा नाम मिलने के कारण अपनी गलत पहचान से मैं इतना परेशान हो गया कि मैंने ‘माय नेम इज खान’ फिल्म बनायी ताकि अपनी बात साबित कर सकूं। मेरे आखिरी नाम को लेकर अमेरिकी एयरपोर्ट पर मुझसे घंटों पूछताछ की गयी। कभी-कभार मैं सोचता हूं कि क्या ऐसा ही सलूक सभी के साथ होता होगा, जिसका आखिरी नाम मैकवे या टिमोथी हो?

मैं किसी की भावनाओं को चोट नहीं पहुंचाना चाहता। लेकिन, सच कहा जाना चाहिए। हमलावर और जिंदगी छीननेवाले अपने दिमाग का अनुसरण करते हैं। इसका किसी के नाम, उसके स्थान, उसके मजहब से कोई लेना-देना नहीं होता है।

मुझे मेरे धर्म की शिक्षा पेशावर के एक खूबसूरत पठान ‘पापा’ ने दी। जहां उनके और मेरे परिवार के लोग आज भी रहते हैं। वे अहिंसक पठान आंदोलन ‘खुदाई खिदमतगार’ के सदस्य रहे थे और खान अब्दुल गफ्फार खान और गांधीजी दोनों के ही अनुयायी थे। उनसे मैंने इसलाम की जो पहली सीख ली वह थी औरतों और बच्चों का सम्मान करना और हर इंसान की गरिमा को बनाये रखना।

मैंने सीखा कि दूसरों के गुण, उनकी मर्यादा, उनकी दृष्टि, उनके विश्वास और दर्शन का उसी तरह सम्मान करना चाहिए, जिस तरह से मैं अपना करता हूं और उन्हें खुले दिल से स्वीकार किया जाना चाहिए। मैंने अल्लाह की शक्ति और दयालुता पर यकीन करना सीखा। साथ ही इंसानों के साथ सौम्य और दयालु होना भी। हां, तो मैं एक खान हूं। लेकिन मुझमें मेरे अपने अस्तित्व को लेकर कोई बनी-बनायी धारणा नहीं है। मुझे लाखों-लाख भारतीयों की मोहब्बत मिली है। पिछले बीस वर्षों से मुझे यह स्नेह मिल रहा है, इस तथ्य के बावजूद कि मैं अल्पसंख्यक समुदाय से हूं। मुझे राष्ट्रीय और सांस्कृतिक सरहदों के आर-पार लोगों की बेपनाह मोहब्बत मिली है। मेरे जीवन ने मुझमें यह गहरी समझ पैदा की है कि प्यार आपसदारी का मामला है। विचार की संकीर्णता इसके आड़े नहीं आती।

अपने सुपरस्टारडम के नीचे मैं एक साधारण इंसान हूं। मेरे मुसलमान होने का मेरी पत्नी के हिंदू होने से किसी किस्म का संघर्ष नहीं होता। हमारी एक बेटी है, जो घिरनी की तरह नाचती है और अपने नृत्य की खुद कोरियोग्राफी करती है। वह पश्चिमी गाने गाती है, जो मेरी समझ में नहीं आते। वह एक अदाकारा बनना चाहती है। किसी मुस्लिम देश में जहां सिर को ढकने की खूबसूरत, लेकिन अक्सर गलत समझी जानेवाली प्रथा का पालन किया जाता है, वह भी अपने सिर को ढंकने की जिद करती है।

मेरा मानना है कि हमारा धर्म नितांत व्यक्तिगत चयन का मामला है। न कि उसे सामाजिक रूप से अपनी पहचान के तौर पर घोषित करने का। आखिर क्यों न वह प्रेम जिसे हम साझा करते हैं, वही हमारी पहचान का आधार बने, बनिस्बत कि हमारे नाम के आखिरी हिस्से के। प्रेम देने के लिए किसी का सुपरस्टार होना जरूरी नहीं है। इसके लिए सिर्फ एक दिल होना चाहिए। और जहां तक मैं जानता हूं दुनिया में ऐसी कोई शक्ति नहीं है, जो किसी को दिल से वंचित कर सके।

मैं एक खान हूं। और इसका मतलब सिर्फ ऐसा इंसान होने से ही है। भले ही मेरे इर्द-गिर्द एक बनी-बनायी छवि खड़ी कर दी गयी हो। एक खान होने का मतलब सिर्फ यही है कि प्रेम पाओ और बदले में प्रेम दो।

(‘आउटलुकः टर्निग प्वाइंट, द ग्लोबल एजेंडा 2013’ में छपे शाहरुख खान के लेख का अंश। इस लेख को आधार बना कर पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने 28 जनवरी को आपत्तिजनक टिप्पणी की थी और फिर दोनों देशों की ओर से जो बयानबाजी हुई उसके बाद आपसी रिश्ते और तल्ख हो गये।)

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