Friday, September 27, 2013

पहले मेरी 12 साल की बच्ची के साथ आठ लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया फिर उसे तीन टुकड़ों में काटकर तेजाब से जला दिया..!


थाना फुगाना, गांव लाख। सात सितंबर की शाम को जाट पंचायत खत्म होने के बाद वे अपने घरों को लौट आये थे। उनके लौटने के साथ ही गांव में शोर शराबा और हलचल बढ़ गई थी। गांव के मंदिर से ऐलान किया गया कि सभी हिन्दू मंदिर में इकट्ठा हो जाएं। इस ऐलान के बाद जो जहां था, उसने अपनी तैयारी शुरू कर दी। हथियारबंदी के साथ साथ मुसलमानों के खिलाफ नारेबाजी बुलंद होने लगी। मोहम्मद मुकीम इसी लाख गांव के निवासी थे। नारेबाजी सुनकर वे गांव के प्रधान बिल्लू जाट के पास पहुंचे। उन्होंने बिल्लू जाट से अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई। बिल्लू जाट ने उनसे कहा कि सारे मुसलमान गांव छोड़ दें। महिलाएं और बच्चों को रहने दें, उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा।
शामली में एक राहत कैम्प में इस तरह गुजारा कर रहे हैं बच्चे
लेकिन बिल्लू जाट का यह आश्वासन बहुत आश्वस्त करनेवाला नहीं था। बिल्लू जाट के घर पर ही तैयारियां हो रही थीं। शीशियों में केरोसिन और तेजाब भरे जा रहे थे। 7 सितंबर की सारी रात शायद तैयारियों में ही बीत गई और आखिरकार 8 सितंबर की सुबह कहर टूट पड़ा। सुबह नौ बजे से मुसलमानों को खोजकर खत्म करने की जो मुहिम शुरू हुई तो मुकीम चार दिनों तक गन्ने के खेत में छिपे रहे। बीवी और बच्चे पीछे छूट गये थे। उन्हें नहीं मालूम कि इन चार दिनों में उनके साथ क्या हुआ। जब मालूम चला तो वे जीते जी मर गये। इन्हीं चार दिनों के दरम्यान उनकी 12 साल की बेटी के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और उसे तेजाब से जलाकर मार दिया गया। अब एक राहत शिविर में पत्नी के साथ पनाह लिए मुकीम बताते हैं आखिरी बार उन्होंने अपनी बेटी को आठ गुण्डों से घिरा देखा था। चार दिन बाद जब वे बाहर निकले तो उन्हें फुगाना क्षेत्र से एक लाश की शिनाख्त के लिए बुलाया गया। उन्होंने तीन टुकड़ों में काट दी गई अपनी बेटी की अधजली लाश को पहचान तो लिया लेकिन उस दिन से अपनी पहचान भूल चुके हैं। शिनाख्त के बाद पुलिस ने कागजी कार्रवाई पूरी करके उस सड़ती हुई लाश को तत्काल दफन करवा दिया। मुकीम और उनकी पत्नी वसीला दूसरे हजारों पीड़ितों की तरह ही अब शरणार्थी शिविर में रह रहे हैं और उन्हें नहीं पता है कि अब यहां से वे कहां जाएंगे।
मुकीम की बेटी के साथ जो हुआ वह अकेली ऐसी जघन्य घटना नहीं है जो कि मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान घटित हुई। लाख गांव के पीडि़तों से तफ्तीश के दौरान वहां पहुंचे रिहाई मंच के एक जांच दल ने पाया है कि इस गांव में इस तरह की और भी कई घटनाएं हुई हैं जहां महिलाओं खासकर कम उम्र की बच्चियों के साथ सामूहिक बलात्कार व हत्याएं हुई हैं, जिसे प्रशासन दबा रहा हैं। रिहाई मंच जांच दल में शामिल अवामी कांउसिल फॉर डेमोक्रेसी एंड पीस के असद हयात, राजीव यादव, शरद जायसवाल, गुंजन सिंह, लक्ष्मण प्रसाद और शाहनवाज आलम शामिल हैं। जांच दल से बातचीत में ग्राम फुगाना निवासी आस मोहम्मद की पत्नी के साथ गांव के ही सुधीर जाट, विनोद, सतिंदर ने उन पर हमला किया जिसमें उनके तीन बच्चे गुलजार(10), सादिक(8) और ऐरान(6) बिछड़ गए जिनका पता आज तक नहीं चला। उन्होंने बताया कि उन लोगों ने मेरे कपड़े फाड़ दिये और बुरी तरीके से दांत काटे तभी बगल से एक और लड़की भागी जिसकी तरफ वे लोग लपके और मैं वहां से किसी तरह बच कर भाग पायी। अब वे लोग भी मुकीम की ही तरह कैराना कैम्प में रह रहे हैं।
कैराना कैम्प में रहने वाली फुगाना गांव की ही शबनम का कहना है कि 8 सितम्बर को सुबह 9-10 बजे के करीब नारों का शोर सुनकर हम सब वहां से भागे और पास के लोई गांव में एक घर में छुप गए लेकिन मेरे दादा बूढ़े होने के चलते पीछे छूट गए। जिन्हें हमने अपने गांव के ही विनोद, चसमबीर, अरविंद, हरपाल और अन्य द्वारा गड़ासे से तीन टुकड़े काट कर मारे जाते हुए देखा। फुगना थाने के गांव लिसाढ़ (जहां दो दर्जन से ज्यादा मुसलमान मारे गए) की एक महिला ने बताया कि अख्तरी (65) को जब जिंदा जलाया गया तब उनकी गोद में उनकी पोती भी थी, और वो भी गोद में चिपके-चिपके ही जल गयी, जिन्हें दफनाते वक्त बच्ची को गोद से अलग नहीं किया गया। उस्मानपुर की इमराना की 12 वर्षीय बेटी रजिया जो गांव के मदरसे में पढ़ रही थी। इमराना बताती है कि मदरसे पर बहुत सारे जाटों ने गड़ासे और तलवारों के साथ हमला किया। किसी तरह से रजिया अपने दो भाईयों जावेद(10) और परवेज(8) के साथ भागी और गन्ने के खेतों में पूरा दिन और पूरी रात छुपे रहे। रिहाई मंच जांच दल को पीडि़तों ने बताया कि कई गांवों में मदरसों पर हमला किया गया। जिसमें पढ़ने वाले कई बच्चे-बच्चियां आज तक गायब हैं।
जो लोग अब शरणार्णी शिविरों में उनकी जान तो बच गई है लेकिन शरणार्थी शिविरों में भी हालात अच्छे नहीं है। मलकपुर राहत कैम्प में ही 9 हजार सांप्रदायिक हिंसा पीडि़त मुसलमान खुले आसमान के नीचे बांस की खपच्चियों पर प्लास्टिक बांधकर बारिश के बीच रहने को मजबूर हैं। इस शरमार्थी शिविर में ही अब तक 50 बच्चे जन्म ले चुके हैं और अभी भी 250 महिलाएं गर्भवती हैं। उस कैंप में रह रहे लोगों के लिए दो हफ्ते से अधिक समय में भी यूपी सरकार कोई बुनियादी सुविधा की व्यवस्था नहीं कर पायी है लेकिन वन विभाग ने वन विभाग की जमीन पर बने शरणार्थी शिविर में रह रहे लोगों पर जमीन कब्जा करने का मुकदमा दर्ज करवा दिया है। कैराना रेन्ज के वन अधिकारी नरेन्द्र कुमार पाल ने कैराना थाने में शरणार्थियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाकर उन्हें जमीन खाली करने के लिए कहा है।
रिहाई मंच की ओर से गये इस जांच दल का आरोप है कि समाजवादी पार्टी की सरकार भले ही मुसलमानों के रहनुमाई का बात कर रही हो लेकिन हकीकत में मुसलमानों के कत्लेआम में वह भी बराबर की हिस्सेदार रही है। 5 सितम्बर को लिसाढ़ गांव में आयोजित जाट बिरादरी के गठवारा खाप पंचायत जिसे 52 गांवों के मुखिया और क्षेत्र के दबंग हरिकिशन बाबा ने बुलायी थी उसमें कांग्रेस के पूर्व राज्य सभा सांसद व स्थानीय कांग्रेस विधायक पंकज मलिक के पिता हरिंदर मलिक भी मौजूद थे। इसी पंचायत जिसमें मुसलमानों के जनसंहार की रणनीति बनी उसका संचालन शामली जिला के समाजवादी पार्टी सचिव डॉक्टर विनोद मलिक ने किया जिसमें हुकूम सिंह और तरूण अग्रवाल समेत कई भाजपा नेता भी शामिल थे। हरिकिशन समेत सभी नेताओं पर धारा 120 बी के तहत आपराधिक षडयंत्र रचने का मुकदमा दर्ज है लेकिन आज तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया।
(शामली के कांधला, कैराना, मलकपुर, खुरगान सांप्रदायिक हिंसा पीडि़त कैंप से रिहाई मंच जांच दल की रिपोर्ट का संपादित हिस्सा)

Thursday, September 12, 2013

सपा की राजनीती धर्मनिरपेक्ष या धर्मसापेक्ष


मुजफ्फरनगर जल रहा है. शामली और सुल्तानपुर के दंगों की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि दिल्ली से 120 किलोमीटर दूर बसा उत्तर प्रदेश का औद्योगिक शहर जल उठा. वजह थी एक लड़की से छेड़छाड़ पर दो समुदायों का आमने-सामने आ जाना.
uttar-pradesh-police
समाजवादी पार्टी की धर्मनिरपेक्ष सरकार के डेढ़ वर्ष के अल्प कार्यकाल का यह 13वां बड़ा दंगा था. वैसे समाजवाद की अवधारणा को परे छोड़ धर्मनिरपेक्षता का आवरण ओढ़कर अखिलेश सरकार की सत्ता में 40 से अधिक दंगे यह तो दर्शाते ही हैं कि उत्तर प्रदेश वाकई धर्मनिरपेक्षता का सापेक्ष उदाहरण पेश कर रहा है.

एक हफ्ते पहले मुजफ्फरनगर में फैली दंगे की आग एक पत्रकार समेत 28 लोगों को लील चुकी है. दंगे की विभीषिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शहरी इलाके को छोड़कर आसपास के गांवों में भी सेना तथा आरएसी को मोर्चा संभालना पड़ रहा है. यहां तक कि उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में भी पुलिस प्रशासन को अतिरिक्त सतर्कता बरतने के आदेश हैं.

राजनीति में अपेक्षाकृत कम अनुभवी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जब दंगे की विभीषिका को समझने और संभालने में नाकाम रहे, तो मुलायम सिंह को आगे आकर मोर्चा संभालना पड़ा. हालांकि स्थिति अभी भी जस की तस है और दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश देने पड़े हैं. 15 मार्च 2012 को जब अखिलेश ने सूबे के सबसे युवा मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी, तो कमोबेश सभी राजनीतिक विश्लेषकों का यह अनुमान था कि अखिलेश अपनी सोच और ताजगी से सपा पर लगा वह दाग तो धो ही देंगे जिसमें यह कहा जाता रहा है कि सपा सरकार के कार्यकाल में गुंडागर्दी और यादववाद को बढ़ावा मिलता है.

सूबे की जनता ने भले ही मायावती के कुशासन से त्रस्त होकर सपा को सत्ता सौंपी हो, किन्तु उसे ज़रा भी भान नहीं था कि इस बार परिस्थितियां बदली हुई हैं. लोकसभा चुनाव को अब अधिक समय नहीं बचा है. सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतियों को अंजाम देने में लगे हैं; ऐसे में प्रदेश के छोटे-बड़े संवेदनशील शहरों में दंगे होना किसी दूरगामी रणनीति का पड़ाव तो नहीं हैं?

भाजपा की ओर से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को पार्टी की चुनाव प्रचार समिति का मुखिया बनाकर संघ ने यह संकेत देने की कोशिश की कि अब हिंदुत्व की राजनीति को एक बार फिर से जीवित किया जाएगा. इसी रणनीति के तहत मोदी ने भी अपने ख़ास सिपहसालार अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया, ताकि हिंदुत्व की बुझती लौ तथा बहुसंख्यक समुदाय की आस्था को शाह दोबारा भड़का सकें.

उनका अयोध्या जाना और राममंदिर के पक्ष में बोलना, चौरासी कोसी यात्रा का असमय ऐलान और उस पर हुई राजनीति काफी हद तक संघ और मोदी के मन मुताबिक़ ही थी. फिर जहां तक सपा की बात है तो सभी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में 18 फीसद से अधिक वोट बैंक मुस्लिमों के पास है, जो सपा और कांग्रेस दोनों में बंटा हुआ है. यदि आगामी लोकसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को सूबे में सपना परचम फहराना है, तो उसे किसी एक समुदाय का थोक वोट बैंक चाहिए.

फिलहाल सूबे में जो स्थिति है, उसे देखकर तो ऐसा जान पड़ता है कि वोटों के ध्रुवीकरण की जद्दोजहद में सपा-भाजपा में परदे के पीछे कोई बड़ा खेल हुआ है. इस वर्ष मार्च में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह की तारीफ में कसीदे गढ़े थे. यहां तक कि उन्होंने लीक से हटकर लगे हाथ समाजवाद और राष्ट्रवाद के लिए समान पहलुओं को भी बताया. उन्होंने समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की एक समान विचारधारा को भी साथ आने के संकेत के तहत सार्वजनिक किया.

सीमा सुरक्षा, देशभक्ति और भाषा के मसले पर निश्चित रूप से लोहिया का समाजवाद और गोलवरकर का राष्ट्रवाद बहुत अलग नहीं है, लेकिन आज के दौर में लोहिया के समाजवाद और गोलवरकर के राष्ट्रवाद की अहमियत है ही कितनी? फिर लोहिया के समाजवाद की जितनी धज्जियां मुलायम सिंह ने उड़ाई हैं, उतनी किसी ने नहीं. ठीक उसी तरह भाजपा को भी राष्ट्रवाद तभी याद आता है जब उसका वोट बैंक उससे छिटक रहा हो.

मुलायम और राजनाथ; कमोबेश दोनों का राजनीतिक उत्थान अयोध्या से हुआ है. एक हिन्दुओं का रहनुमा बना, तो दूसरा मुस्लिमों का चहेता. दोनों का अपना निश्चित वोट बैंक है और दोनों की राजनीतिक शैली भी भिन्न है. ऐसे में इस दोस्ती का कुछ तो अंजाम होगा और शायद वह इस रूप में प्रकट भी हो रहा है. राजनाथ की तारीफ से मुलायम उनके कितना नजदीक पहुंचे यह तो पता नहीं, किन्तु राजनाथ का दिल मुलायम के प्रति ज़रूर पिघला होगा.

राजनाथ के बारे में कहा जाता है कि वे संघ को भी अपने दरवाजे पर नतमस्तक करवा सकते हैं और सूबे में भाजपा की दुर्गति भी उन्हीं की कारगुजारियों से हुई है. हो सकता है इस लिहाज से दोनों बड़े नेताओं की अघोषित गुटबाजी का नतीजा सूबे का आम आदमी दंगों की विभीषिका के रूप में भुगत रहा हो? चूंकि दंगों को राजनीतिक पृष्ठभूमि ही भड़काती है, लिहाजा इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आने वाला समय उत्तर प्रदेश की जनता के लिए दुष्कर होने वाला है.

वोट बैंक की राजनीति के तहत ही सपा सरकार ने आईएएस दुर्गाशक्ति नागपाल को हटाया और अब इस वोट बैंक की राजनीति उसकी अक्षमताओं को उजागर कर रही है. वरना मुजफ्फरनगर का प्रशासन तिल का ताड़ बनता हुआ नहीं देखता रहता. यह निश्चित रूप से प्रशासन और सरकार की नाकामी और राजनीति का विद्रूप रूप है.

इन विपरीत परिस्थितियों में अखिलेश के युवा कांधों पर जिम्मेदारियों का जो बोझ पड़ा है, वह संकेत दे रहा है कि राजनीति में युवा होना ही मायने नहीं रखता बल्कि राज करने की नीति का भान भी होना चाहिए. ऐसा लगता था कि अखिलेश को अपने पिता मुलायम सिंह की राजनीतिक समझ का लाभ मिलेगा, मगर हुआ इसका उल्टा. मुलायम को दिल्ली रास आई और अखिलेश पर आजम खान व रामगोपाल यादव हावी हो गए.

चूंकि बतौर मुख्यमंत्री अखिलेश का नाम ही हर सफलता-विफलता के लिए जिम्मेदार होता, अतः मंत्रियों से लेकर सपा के वर्तमान कर्णधारों तक की कथित सफलता व सही मायनों में विफलता का ठीकरा अखिलेश के ही सर फूटा. अखिलेश लाख सफाई देते फिरें कि स्थितियां सामान्य होने में अभी वक़्त लगेगा, किन्तु वे यह तो तय करें कि इन स्थितियों को ठीक कौन करेगा? क्या आजम खान, रामगोपाल यादव तथा मुलायम सिंह की तिगडी अखिलेश को अपनी छाया से मुक्ति देगी, ताकि वे अपनी ऊर्जा का सही मायनों में दोहन कर सूबे के विकास के प्रति गंभीर हों?

अखिलेश पर राजनीति से इतर पारिवारिक दबाव स्पष्ट दृष्टिगत होता है. पूरवर्ती सपा शासन की तुलना उनकी सरकार से होना ही अखिलेश का सर-दर्द बढ़ा रहा है. फिर 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा का विधानसभा वाला चमत्कारिक प्रदर्शन दोहराने की जिम्मेदारी भी अखिलेश पर है. मुलायम कितने भी अनुभवी हों, मगर राजनीति में एक सीमा होती है और मुलायम भी उस सीमा को नहीं लांघ सकते.

स्मरणशक्ति खोते जा रहे मुलायम को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करने का अघोषित जिम्मा भी अखिलेश सरकार की सफलता से सुनिश्चित होगा. यानी अखिलेश के लिए अभी चुनौतियों का मैदान सामने है और यदि वे इनसे पार नहीं पा सके तो यह उनकी और मुलायम की राजनीतिक हार होगी. फिर यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगा कि धरतीपुत्र का पुत्र कहीं हवा-हवाई नेता की राह पर तो अग्रसर नहीं है. ऐसा हुआ तो राजनीति में व्याप्त इस सोच को भी आघात लगेगा कि युवा ही राजनीति में बदलाव ला सकते हैं.

अखिलेश को जनता ने सुनहरा मौका दिया है कि वे पूरवर्ती शासन के पाप धोते हुए सूबे को विकास पथ पर अग्रसर करें और ऐसा न कर पाने के एवज में उनकी भद पिटना तय है जिसका परिणाम 2014 में तो दिखेगा ही, भावी विधानसभा चुनावों में भी उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी.

यह वक़्त निश्चित रूप से अखिलेश के लिए अग्निपरीक्षा का है, जिसमें तपकर ही वे मिसाल कायम कर सकते हैं वरना उनकी गिनती भी उन्हीं नेता पुत्रों में होगी जो राजनीति में पैराशूट के ज़रिये उतारे जाते हैं. अखिलेश को अब खुद के निर्णय को परिपक्वता के पैमाने पर तौलकर सूबे में शांति कायम करने की पहल करना होगी, वरना आज मुजफ्फरनगर जल रहा है और यही हाल रहा तो देश के सबसे बड़े सूबे को जलने से कोई नहीं रोक पायेगा?

~सिद्धार्थ शंकर गौतम

Tuesday, September 10, 2013

त्वरित कार्रवाई से टल सकता था दंगा


जब भी कहीं दंगे की चिनगारी भड़कती है, या यों कहें कि वह पहली घटना घटती है जो बाद में बड़े दंगे का कारण बन सकती है, उसी समय प्रशासन को सख्ती से कार्रवाई करनी चाहिए। दंगों और इन्हें भड़काने वाले तत्वों के मामले में सरकार के लिए सबसे सही नीति यही होती है कि वह इन्हें बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं करेगी, यानी शून्य सहिष्णुता की नीति। लेकिन ताजा मामले में शायद यह नहीं हुआ। घटना के बाद विरोध-प्रदर्शनों को जारी रखने की इजाजत एक बड़ी भूल साबित हुई। इसी कारण से अफवाहों का बाजार गरम हुआ और फर्जी वीडियो के प्रसार की बात भी सामने आई। यहां पर एक और बात जोड़ी जानी चाहिए कि जिस तरह दंगों का पहला कारण धर्म-जाति-संप्रदाय के आधार पर सामाजिक विभाजन है, तो दूसरा कारण प्रशासनिक ढांचे का राजनीतिकरण होना है। अक्सर स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था यह देखती है कि दंगे को रोकने से उनके राजनीतिक आका को नुकसान तो नहीं हो रहा है। इससे प्रशासनिक सुस्ती आती है और दंगा शुरुआती चरण से आगे बढ़ जाता है।
पुलिस व जिला प्रशासन, दोनों अपने कर्तव्य निभाने की जगह राजनीतिक आदेशों का पालन करने लगते हैं, जहां से उन्हें पदोन्नति और गैर-अनुचित लाभों की इच्छा रहती है। इसलिए भारतीय पुलिस व्यवस्था एक गैर-पेशेवर संस्था बनती जा रही है। इसकी आशंका कम ही रहती है कि स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन और स्थानीय खुफिया एजेंसी मौके की गंभीरता को भांप न पाएं। कई बार दंगों के बाद यह कहा जाता है कि खुफिया एजेंसी को सांप्रदायिक दंगों के भड़कने की जानकारी पहले से ही थी। खुफिया विभागों के पास इस काम के लिए कोई जादू की छड़ी नहीं है। वे स्थानीय पुलिस-प्रशासन की रिपोर्ट, तमाम ब्योरों को देख और माहौल भांपकर अंदेशा जताते हैं, जिनकी राज्य प्रशासन अनदेखी कर देता है। इसलिए भी सांप्रदायिक दंगे की खुफिया रिपोर्ट मिल जाने के बाद कोई फायदा नहीं होता।

सांप्रदायिक हिंसा की सूरत में स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन, स्थानीय एजेंसियां और राज्य प्रशासन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन ऐसे मौकों पर अक्सर राजनीतिक तबका दंगों को सुलझाने की बजाय हवा देता है। और यही वह गलती है, जहां से सांप्रदायिक हिंसा का स्वरूप बिगड़ने लगता है और एक सीमा के बाद इस पर किसी का बस नहीं रह जाता। अंतत: चिनगारी भड़काने वाले हाथ खुद झुलसने लगते हैं। इस समय जब 2014 का आम चुनाव सामने है, सांप्रदायिक दंगा एक और भी ज्यादा खतरनाक खबर बन जाता है। और अभी तक जो ब्योरा आया है, उससे तो यही लगता है कि दो लोगों के बीच के निजी झगड़े को सांप्रदायिक रूप दिया गया। अब इससे मुजफ्फरनगर के अलावा कई अन्य जिले भी प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे मौकों पर जरूरी होता है कि सरकार त्वरित कदम उठाए और विपक्षी दल संयमित व्यवहार करें। तभी संकट को टाला जा सकता है।

अब तो ऐसे मामलों में सोशल मीडिया की भूमिका पर भी नजर रखनी जरूरी है। दंगों के शुरुआती चरण में अक्सर सरकारें यह दलील देती है कि अधिकतम पुलिस बल के इस्तेमाल से सांप्रदायिक माहौल और तेजी से बिगड़ सकती है। बेशक यह एक तत्व हो सकता है। लेकिन इसकी आड़ में सांप्रदायिक-संवेदनशील क्षेत्र को कानूनविहीन कर देना कतई जायज कदम नहीं कहा जा सकता। केंद्र सरकार के लिखित दिशा-निर्देशों का अक्षरश: पालन हो, तो राज्यों में सांप्रदायिक दंगों की नौबत ही नहीं आएगी। इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्रलय के ‘सांप्रदायिक सद्भाव पर दिशा-निर्देश’ को अपने आपमें विस्तृत और संपूर्ण माना जाता है। इसमें स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि सांप्रदायिक दंगों की स्थिति में उपद्रवियों को रोकने के लिए राज्य सरकार तुरंत अधिकतम बल का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन राज्य सरकारें अक्सर ऐसा नहीं करती है। दिशा-निर्देश की प्रस्तावना में ही लिखा है कि ‘सांप्रदायिक सद्भाव कायम रखना और सांप्रदायिक हिंसा या दंगे को रोकना व इस तरह की किसी भी गड़बड़ी में पहले जैसी व्यवस्था को बहाल करने के लिए कदम उठाना तथा प्रभावित लोगों को सुरक्षा व राहत पहुंचाना राज्य सरकारों की पहली जिम्मेदारी है।’ इसके बाद ‘सुरक्षात्मक उपायों’ और ‘प्रशासनिक उपायों’ का विवरण है।

सांप्रदायिक दंगे को नियंत्रित करने से अधिक महत्वपूर्ण है, उसे होने ही न देना। और इस बारे में केंद्र सरकार का निर्देश है कि जिला प्रशासन नियमित अंतराल पर जिले में सांप्रदायिक स्थिति का आकलन करे और उसका पूरा ब्योरा तैयार रखे। साथ ही, वह सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील इलाकों की पहचान करे, और उस क्षेत्र की आबादी, संदेह के कारणों, विवाद की वजहों और अतीत की घटनाओं का विस्तृत लेखा-जोखा बनाए। हर पुलिस थाने के पास ताजा ब्योरा जरूर हो। थाने के वरिष्ठ पुलिसकर्मियों की नजर इन संवेदनशील इलाकों पर लगातार बनी रहनी चाहिए। अगर थोड़ी भी जरूरत हो, तो अलग से चौकी बने और अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाए। ऐसे कई उपाय इसमें गिनाए गए हैं। इसके अलावा, प्रशासनिक उपायों में इस बात पर विशेष जोर है कि राज्य और जिला, दोनों स्तर पर विशेष संकट प्रबंधन योजना होनी चाहिए। ‘पर्सनल पॉलिसी’ में यह उल्लेख है कि संवेदनशील क्षेत्रों में पुलिस बलों की नियुक्ति वहां के सामाजिक ढांचे के अनुरूप हो, जिससे उनकी विश्वसनीयता बनी रहे और यह हर तबके को लोगों के बीच भरोसे को बनाने में मददगार हो।

आज हम जिस तरह की ‘जटिल व्यवस्था’ में रह रहे हैं, उसमें कभी-कभार कोई छोटी आपराधिक घटना भी भयंकर रूप ले सकती हैं। व्यवस्था की इस जटिलता का कारण हमारी मानसिक स्थिति भी हो सकती है और सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक स्थिति भी। इन घटनाओं के भयावह हो जाने के कई कारण होते हैं। कभी साधारण-सी घटनाएं सामाजिक सद्भाव का माहौल बिगड़ने से जटिल बन जाती हैं, तो कभी ऐसी पेचीदा घटनाओं के पीछे कोई साजिश होती है। ऐसी घटनाओं की पहचान और उनके बीच वर्गीकरण करना स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन और स्थानीय खुफिया एजेंसी का दायित्व होता है। राज्य-प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि वह उस बड़ी घटना पर तुरंत काबू पाए, ताकि जान-माल का नुकसान न के बराबर हो। अगर आपराधिक घटनाएं सांप्रदायिक दंगे का रूप लेती है, तो उसका सबसे बड़ा कारण है कि वह समाज जाति-धर्म-संप्रदाय के आधार पर बंटा हुआ है। भारतीय समाज में जाति-धर्म-संप्रदाय के स्तर पर विभाजन बहुत पुराना है और इस आधार पर अतीत में दंगे हुए हैं। लेकिन जिस तरह का सामाजिक-आर्थिक और वैज्ञानिक विकास आज के दौर में हुआ है, उसमें तमाम तरह के व्यापक सुधार हुए हैं और ऐसे में, किसी भी सांप्रदायिक दंगे के भड़कने का मतलब यह होता है कि घटना प्रशासनिक विफलता का परिणाम है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

~वेद मारवाह, पूर्व निदेशक, नेशनल सिक्युरिटी गार्ड

Monday, September 09, 2013

मुजफ्फरनगर दंगा था पुनर्नियोजित


उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जनपद में हुए दंगे और इसमें बेमौत मारे गये लोगों की हत्या के लिये सूबे में सत्तासीन अखिलेश सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए विभिन्न सामाजिक संगठनों ने जबर्दस्त विरोध किया है. विरोध में उत्तर प्रदेश के विभिन्न संगठनों ने एक धरना भी आयोजित किया.
धरने में बोलते हुए रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुएब ने कहा है कि पिछली 27 तारीख से ही मुजफ्फरनगर में जिस तरह से सांप्रदायिक ताकतें सपा के प्रशासनिक संरक्षण में सांप्रदायिक व सामंती तत्वों को बढ़ावा दिया, उसके नतीजे में 31 से अधिक बेगुनाहों को जान से हाथ धोना पड़ा। यह पूरा दंगा पूर्व नियोजित षडयंत्र का परिणाम है और यह षडयंत्र लुक छिप के नहीं, बल्कि पंचायतें लगाकर खुलेआम एक समुदाय विशेष के खिलाफ आगे गोलबंदी की गई और उसके बाद संगठित हमला। ऐसे में मुजफ्फरनगर जिले के प्रशासनिक अमले से लेकर यूपी के एडीजी लॉ एण्ड ऑर्डर अरुण कुमार तक की इन दंगों में खुली भूमिका के चलते तत्काल प्रभाव से बर्खास्त करते हुए दंगे की सीबीआई जांच करानी चाहिए। मोहम्मद शुएब ने कहा कि जिस तरीके से सैकड़ों दंगे कराने वाली सपा सरकार इंसान की कीमत मुआवजों से लगा रही है, वो उससे बाज आए क्योंकि जिसका बेटा, जिसका पति मरा होगा, जिसके बच्चे अनाथ हुए हैं उनके आंसुओं को पैसों से नहीं तोला जा सकता।

ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (आईपीएफ) ने भी इस घटना की भर्त्सना करते हुए कहा कि मुजफ्फरनगर में हुआ दंगा सपा की सोची-समझी रणनीति का परिणाम है. आइपीएफ के राष्ट्रीय प्रवक्ता व पूर्व आईजीएसआर दारापुरी ने इस घटना पर गहरा दुःख प्रकट करते हुए मांग की है कि इस दंगे की न्यायिक जांच करायी जानी चाहिए और जो अधिकारी इसके लिए दोषी है उन्हें दण्डि़त किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा यह जानते हुए भी कि मुजफ्फरनगर में पहले से ही साम्प्रदायिक तनाव चल रहा था और इसके पूर्व भी लोगों की हत्याएं तक हो चुकी थी, वहां कड़ाई से माहौल को सामान्य बनाने की जगह सपा सरकार ने महापंचायत करने की अनुमति प्रदान की और सोची समझी रणनीति के तहत दंगा कराया.

इंडियन नेशनल लीग के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोहम्मद सुलेमान ने कहा कि मुलायम सिंह का सांप्रदायिक ताकतों को मजबूत करने का खेल बहुत पुराना है और पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए अखिलेश यादव भी यही कर रहे हैं। आज जिस तरह पहली बार मुख्यमंत्री बनते ही अखिलेश यादव ने प्रदेश को दंगों की आग में झोक दिया, ठीक इसी तरह मुलायम ने भी सन् 1990-91 में यूपी को दंगाइयों के हवाले कर दिया था। आज भी उस मंजर याद करके दिल दहल जाता है कि एक साथ प्रदेश के 45 जिलों में कर्फ्यू लगा था।

ठीक आज जिस तरह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव मोदी और उसके गुर्गे अमित शाह के लिए प्रदेश में 100 से ज्यादा सांप्रदायिक दंगे करवा कर जमीन तैयार कर रहे हैं, यही काम उनके पिता मुलायम ने भी 1990-91 में लालकृष्ण आडवाणी के लिए किया था. पर मुलायम को यह समझ लेना चाहिए कि जिस सांप्रदायिक राजनीति ने आडवाणी को जीवन पर्यन्त वेटिंग में रख दिया, उस राजनीति से वो दिल्ली का रास्ता नहीं तय कर सकते। दंगे झेलते-झेलते जनता परिपक्व हो गई और और वो देख रही है कि किस तरीके से सांप्रदायिकता के नाम पर 2014 के चुनावों की तैयारी हो रही है।

उन्होंने आगे कहा कि आज उत्तर प्रदेश की कानू व्यवस्था ही उस सांप्रदायिक अरुण कुमार के हाथों में है, जिसकी करतूतें मालेगांव मामले में बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों का जीवन को बर्बाद करने के मामले में जगजाहिर है. 2001 में कानपुर में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पद पर रहते हुए अरुण कुमार के निर्देश पर 13 अल्पसंख्यक पुलिस की गोली से मारे गए तथा मारे गए लोगों के मां-बाप से इस बात का शपथ पत्र भी ले लिया था कि अब वे यह कहीं नहीं कहेंगे कि उनका पुलिसिया उत्पीड़न हुआ है. इसी शर्त पर उन्हें 2 लाख की सरकारी मदद दी गयी थी। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कानून और व्यवस्था लागू करने वाले अफसरों पर कोई नियंत्रण नही है। दंगों के शिकार परिवारों के प्रति मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आंसू केवल घडि़याली हैं। अगर अखिलेश यादव इस दंगे पर संजीदा हैं, तो एडीजी कानून व्यवस्था अरुण कुमार को तत्काल बर्खास्त करें।

रिहाई मंच के प्रवक्ता राजीव यादव और हरे राम मिश्र ने कहा कि मुजफ्फरनगर में बहू बेटी बचाओ अभियान के नाम पर सामंती सांप्रदायिक ताकतें ध्रुवीकरण का गंदा खूनी खेल खेल रही थीं. सरकार को सबकुछ मालूम होते हुए भी जिस तरह से इनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया गया, उससे यह बात साफ है कि सरकार इन दंगों में ही अपना फायदा देख रही थी। जिस प्रायोजित तरीके से अफवाहें फैलाई गयी और पुलिस द्वारा दंगाइयों को माहौल को विषाक्त करने का पूरा मौका दिया गया, उससे यह साफ है कि दंगे सरकार की मंशा के मुताबिक ही हुए हैं।

उन्होंने कहा कि आज जिस तरह से फैजाबाद से लेकर मुजफ्फरनगर तक दलितों व पिछडों को अल्पसंख्यकों के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है, वह अखिलेश सरकार की सांप्रदायिकता का नया प्रयोग है। सुल्तानपुर का सांप्रदायिक तनाव इस बात की पुष्टि करता है कि सपा सरकार प्रदेश में अपने जातिगत चुनावी समीकरण को तेजी से मजबूत करने में जुटी हुई है।

सामाजिक कार्यकता गुफरान सिद्द्की और पत्रकार शिवदास ने कहा कि अखिलेश यादव अपने पिता मुलायम सिंह के सांप्रदायिक करतूतों की फोटोकापी करते नजर आ रहे हैं। जिस तरीके से बहू-बेटी बचाओ अभियान के नाम पर सांप्रदायिक तत्वों को मुजफ्फर नगर में बढ़ावा दिया गया, ठीक इसी तरह पिछली मुलायम सरकार ने गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ को हिंदू चेतना रैलियों के नाम पर सांप्रदायिकता फैलाने की खुली छूट दे रखी थी। जिसका खामियाजा मऊ,पडरौना, कुशीनगर, गोरखपुर समेत पूर्वांचल के कइ्र्र शहरों में भीषण सांप्रदायिक दंगों के रूप में जनता को भुगतना पड़ा।

मऊ में तो कहीं जिंदा काटकर जलाया गया, तो कहीं मां-बेटी के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। जिस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश देते हुए टिप्पणी की थी कि यह घटना गुजरात की जाहिरा शेख से मिलती जुलती है। आज मुजफ्फरनगर में भी यही किस्सा दोहराया गया और 31 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।

पिछड़ा समाज महासभा के एहसानुल हक मलिक और भागीदारी आंदोलन के पीसी कुरील और भारतीय एकता पार्टी के सैयद मोइद अहमद ने कहा कि सपा सरकार के डेढ़ वर्षों के शासनकाल में जिस तरह से दंगे दर दंगे उत्तर प्रदेश में लगातार हो रहे हैं और सरकार जिस तरह से इन दंगों को रोक पाने में लगातार विफल साबित हो रही है, इस बात की ओर इशारा है कि सपा सरकार प्रदेश की सांप्रदायिक ताकतों के आगे न केवल नतमस्तक हो चुकी है, बल्कि इन दंगों की आड़ में हो रहे धार्मिक और जातीय धु्रवीकरण को अपने चुनावी लाभ के बतौर देख रही है। इन दंगों ने यह साबित कर दिया है कि प्रदेश की कानून और व्यवस्था चलाने वाले पुलिस अफसरों पर से सरकार का नियंत्रण एकदम खत्म हो गया है और कानून व्यवस्था के मामले में सरकार पूरी तरह से सांप्रदायिक जेहेनियत के पुलिस अधिकारियों के रहमो करम पर आश्रित हो चुकी है। मुजफ्फरनगर में जो भी हो रहा है उसकी पृष्ठभूमि अचानक नहीं बनी, लिहाजा इतने बड़े पैमाने पर हुए इस जन संघार को प्रायोजित करने में किन किन की भूमिका है इसकी सीबीआई जांच कराई जाए।

यूपी की कचहरियों में 2007 में हुए धमाकों में पुलिस तथा आईबी के अधिकारियों द्वारा फर्जी तरीके से फंसाए गये मौलाना खालिद मुजाहिद की न्यायिक हिरासत में की गयी हत्या तथा आरडी निमेष कमीशन रिपोर्ट पर कार्रवाई रिपोर्ट के साथ सत्र बुलाकर सदन में रखने और आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को छोड़ने की मांग को लेकर रिहाई मंच का धरना रविवार को 110 वें दिन भी लखनऊ विधानसभा धरना स्थल पर जारी रहा।

धरने में इंडियन नेशलन लीग के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोहम्मद सुलेमान, अब्दुल हलीम सिद्दीकी, रेशमा, कानपुर से हफीज अहमद, शबनम बानो, भारतीय एकता पार्टी के सैयद मोईद अहमद, हरे राम मिश्र, गुफरान सिद्दीकी, पीसी कुरील, शिवदास, एहसानुल हक मलिक, राजीव यादव सहित कई अन्य लोग शामिल थे.

~जनज्वार.कॉम 
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