Monday, December 23, 2013

बड़े-बड़े एनजीओ संचालकों का संगठन ‘आप’


दिल्ली के विधानसभा चुनाव में ‘आप’ की सफलता ने सभी को चैंका दिया है. लोग हतप्रभ हैं कि आखिर ये क्या हो गया. अब लोग लाल बुझक्कड़ की तरह ‘आप’ की जीत का विश्लेषण करने में लगे हैं. यहां तक कि वामपंथ की हुंकार भरने वाले कुछ लोगों को ये इंकलाब की ओर ले जाने वाली पार्टी लग रही है और वे अपनी वर्गीय लाइन और वर्ग चरित्र की राजनीति को भूल गए हैं.

ये लोग आप की जीत पर उसकी शान में कसीदे पढ़ रहे हैं. जीत का ये गुबार इतना ज्यादा है कि सही तस्वीर लोगों को दिखाई नहीं दे रही है. वास्तव में आप की दिल्ली विधानसभा की जीत भारतीय राजनीति में एनजीओ के बढ़ते हस्तक्षेप का परिचायक है. यह पार्टी न तो किसी विचारधारा पर आधारित है और न ही इसका कोई आर्थिक और सामाजिक दर्शन लोगों के सामने आया है.

आप की जीत में उच्च मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग के असंतुष्ट समूह की बड़ी भूमिका है. यह वह वर्ग है, जिसको उदारीकरण के दौर में सबसे आर्थिक लाभ हुआ है और सबसे अधिक सुविधाएं मिली हैं. जब तक इसे लगातार सुविधाएं मिल रहीं थीं तब तक इसमें कोई असंतोष नहीं था, लेकिन जैसे ही इसकी सुविधाओं में कटौती हुई जैसे गैस के सिलेंडरों की संख्या निर्धारित करना, डीजल पेट्रोल के दाम बढ़ना, सब्जियों विशेषकर प्याज के दाम आसमान पहुंचना, इसमें असंतोष फैलने लगा.

इस असंतोष को स्वर दिल्ली में आप ने दिया. भाजपा तो खैर उन्हीं आर्थिक नीतियों पर चलेगी, जिस पर कांग्रेस चल रही है, वामपंथ भी इस मुद्दे पर ठोस पहलकदमी लेने में नाकाम रहा. इस राजनीतिक रिक्तता को भरा है आप ने. आप की जीत का दूसरा बड़ा कारण उसका बेहतर चुनाव प्रबंधन है. कई ऐसे कामों को उसने किया, जिसे आज राजनीतिक पार्टियां नहीं कर रही हैं.

लेकिन आप खुद में क्या है. बड़े-बड़े एनजीओ संचालकों का संगठन. ये एनजीओ घनघोर मुनाफाखोर पूंजीवाद का मानवीय चेहरा हैं, जहां पूंजीपति अपने बेतहाशा मुनाफाखोरी में से एक छोटा सा हिस्सा परोपकार के कामों में लगाकर वाहवाही लूटता है. वह इस परोपकार के काम को करने के लिए एनजीओ को जन्म देता है.

एनजीओ का काम सरकार को बेकार साबित कर अपने दानदाता की ‘जय जयकार...’ करवाना होता है. इसके साथ ही असमानता के खिलाफ होने वाली लड़ाई को भटकाने का काम भी करते हैं. इन एनजीओ के कारण ही आज समाज में राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता खत्म हो गए हैं.

वे युवा जो राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में परिवर्तन के लिए काम करने की इच्छा रखते थे, एनजीओ के साथ जुड़ रहे हैं और इस भ्रम में हैं कि हम समाज में परिवर्तन तो ला नहीं सकते, तो क्यों न समाज के कमजोर वर्ग का ही भला कर दें. यह भी कि परिवर्तन जैसा कष्टसाध्य काम करने से बेहतर है कि एक सरल रास्ता अपनाया जाए.

-प्रेम पुनेठा

Wednesday, December 04, 2013

बाबरी मस्जिद कि शहादत और अयोध्या में भगवान राम का आगमन


राम आये नगर में तो हलचल दिखी/
जिस शकल को पढ़ा उसपे ख़ुशियाँ लिखी/
जैसे लगता था आबो हवा है बिकी/
जिससे भगवान कि साँसे ख़ुद है रुकी/
शोर नारे हवाओं में सुनते रहे/
हर घड़ी कुछ सवालों को बुनते रहे/

क्या हुआ है मेरे घर में मजमा है क्यूँ/
नज़रें जैसे पड़ी भीड़ पर उनकी ज्यूँ/
देखा कुछ नौजवानों का शोरो फ़ुग़ाँ/
थोड़ा आगे बढ़े जल रही थी दुकाँ/
मुफ़लिसों और बेचारों के जलते मकाँ/
उनकी प्यारी अयोध्या में हर सू धुआँ/

तेज़ क़दमों से जब वो महल को चले/
रास्ते में लगे जैसे वहशत पले/
हर सिमत में वहाँ पे थे मजमें लगे/
उनके अपने महल में थे झंडे सजे/
सबकी शक्लों पे ख़ुशियों कि वहशत रजे/
जैसे हर एक डगर पर थे बाजे बजे/

सोचकर जैसे क़दमों से आगे बढ़े/
कुछ अवाज़ें थी कानों में कैसे लड़े/
फिर दुबारा महल कि थे सीधी चढ़े/
जिससे मजमें कि शक्लों को फिर से पढ़ें/
दूर नज़रों ने देखा कहीं पर धुआँ/
जल्दी जल्दी क़दम से वो पहुंचे वहाँ/

एक मजमा था उनकी सदा दे रहा/
और कहता गिरा दो ये ढाँचा यहाँ/
नामे बाबर मिटा दो सदा के लिए/
कह दो तैय्यार हैं वो सज़ा के लिए/
माँ के माथे का कालिख गिराएंगे हम/
राम के नाम को फिर सजायेंगे हम/

नामे भगवन का डंका बजायेंगे हम/
ए अयोध्या तेरे गीत गायेंगे हम/
इतना कहके वो मस्जिद गिराने लगे/
उनके क़ायद भी जल्दी से आने लगे/
नाम भगवन के सब गीत गाने लगे/
उसकी मिट्टी तिलक से सजाने लगे/

ज़ोर से शोर उट्ठा फ़लक गिर गया/
शर्म से सारे इन्सां का झुक सिर गया/
राम कहते रहे किसने क्या कर दिया/
मेरी आँखों को आंसू से क्यूँ भर दिया/
कौन है ये वहाँ पर जो सब कर रहे/
जिससे हर सिम्त इन्सां फ़क़त डर रहे/

पाक मेरी ज़मीं पर लहू बह गया/
क्यूँ सियासत में इन्सां ज़हर सह गया/
सदियों पहले ज़माने से मैं कह गया/
देखना था जो कलयुग में ये रह गया/
देखते देखते सारी धरती जली/
और सियासत कि गोदी में साज़िश पली/

मुल्क जलता रहा लोग बढ़ते रहे/
सीढ़ियां सब सियासत कि चढ़ते रहे/
ख़ौफ़ सारी नज़र में वो गढ़ते रहे/
सारे इंसान आपस में लड़ते रहे/
सदियों सदियों का रिश्ता कहाँ खो गया/
बोले लक्ष्मण से भाई ये क्या हो गया/

कौन रंजिश दिलों में यहाँ बो गया/
सारे दिल से मुहब्बत को ख़ुद धो गया/
पलमें ख़ुशियों का अम्बर कहाँ सो गया/
कुछ न बोले लबों से था दिल रो गया/
कौन थे मुझसे ही साज़िशें कर गए/
मेरी अपनी अयोध्या में लड़ मर गए/....
-सलमान रिज़वी
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