Friday, August 15, 2014

सांप्रदायिक दंगे और अखबारों की भूमिका: एक पड़ताल


सांप्रदायिकता का खबर बन जाना खरनाक नहीं है, खतरनाक है खबरों का सांप्रदायिक बन जाना। यह रिपोर्ट दंगों के दौरान अखबारों की सांप्रदायिक मन-मिजाज की पोल खोलती है।  

कांग्रेस
और दूसरी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियां हिंदुत्व की डगर पर बढ़ रही हैं तो भी उनमें एक हल्की शर्म या झिझक अक्सर दिखाई दे जाती है। लेकिन, लगता है कि हमारे 'निष्पक्ष’ मीडिया में अब ऐसी कोई शर्म या झिझक बाकी नहीं है। मुजफ्फरनगर-शामली की सांप्रदायिक हिंसा की जमीन तैयार करने, फिर अल्पसंख्यकों के सुनियोजित संहार और बलात्कार की घटनाओं पर पर्दापोशी करने, भगवा ब्रिगेड की हर कारगुजारी को जेनुइन ठहराने, सांप्रदायिक नेताओं को हीरो बनाने, उत्पीडि़तों को अपराधी ठहराने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांगों को उत्पीडऩ साबित करने में मीडिया ने कोई कसर नहीं उठा रखी है। हिंदी के प्रमुख अखबारों के मुजफ्फरनगर-शामली संस्करण देखकर लगता है कि कॉरपोरेट के हाथों संचालित और निष्पक्ष व लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाले ये अखबार अगर ऐसी भूमिका अदा कर रहे हैं तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अब ऑर्गेनाइजर और पांचजन्य की जरूरत ही क्या है? 

दैनिक जागरण इस इलाके का सबसे ज्यादा प्रसारसंख्या वाला अखबार है और इसका आरएसएस/भाजपा संबंध जगजाहिर है। संघ के दफ्तरों में इस अखबार के बाकायदा पारायण की परंपरा रही है। 27 अगस्त को मुजफ्फरनगर जिले की जानसठ तहसील के कवाल गांव में हुई तीन युवकों की हत्या की खबर लिखने में इस अखबार ने सारी सीमाएं तोड़ दी थीं। गौरतलब है कि पास ही के गांव मलिकपुर माजरा निवासी सचिन और उसके फुफेरे भाई गौरव ने कवाल में शाहनवाज की हत्या कर दी थी और फिर भीड़ ने इन दोनों जाट युवकों की भी मौके पर ही हत्या कर दी थी। पिछले कई महीनों से मुजफ्फरनगर व शामली जिलों में मुसलमानों पर एक के बाद एक हमलों के जरिये बड़े दंगे की कोशिशों में जुटी आरएसएस-बीजेपी की टीम ने इस दुर्भाग्यपूर्ण वारदात को तपाक से लपक लिया था और इसे छेडख़ानी की वारदात से जोड़कर जाटों के स्वाभिमान का सवाल बना दिया था। दैनिक जागरण के 28 अगस्त के अंक में इस बारे में छापी गई एक खबर का भड़काऊ शीर्षक था- 'सीने पर चढ़कर काटी थी सांसों की डोर’। इस बेहद आपत्तिजनक भाषा में लिखी गई खबर के बीच में बाकायदा 'लाइव’ लिखी डिब्बी भी लगाई गई थी, मानो संवाददाता मौके पर बैठकर घटनाक्रम का आखोंदेखा वर्णन कर रहा हो। 

जाटों और बाकी हिंदू जातियों के गुस्से को भड़काने में इस खबर और दोनों जाट युवकों की हत्या के नाम पर फैलाई गई एक फर्जी वीडियो क्लिप की बड़ी भूमिका रही। जाट बहुल गांवों में योजनाबद्ध ढंग से अल्पसंख्यकों को घेरकर उनकी हत्याओं, महिलाओं के साथ बलात्कार, घरों में आगजनी की वारदातों और इन गांवों से करीब एक लाख मुसलमानों के भागकर कैंपों व सुरक्षित रिश्तेदारियों में पहुंचने के बाद भी अखबार का रवैया उत्पीडि़तों को ही प्रताडि़त करने और इस भयानक हिंसा को वाजिब ठहराने का रहा। कैंपों में पड़े लुटे-पिटे मुसलमानों का मजाक बनाने और उन्हें मुआवजे के लालच में वहां पड़े होने की बातें कमोबेश सभी अखबार छाप रहे हैं लेकिन दैनिक जागरण ने 23 सितंबर को एक खबर के शीर्षक में सारी सीमाएं पार कर दीं। शीर्षक था- 'शरणार्थी शिविर में मौज मना रहे हैं दो हजार मुफ्तखोर’। 

अखबारों का यह रवैया आकस्मिक नहीं था। लगता था कि आरएसएस ने गांवों में लंबी तैयारियों के साथ ही अखबारों को भी पहले ही पूरी तरह पटा लिया था। अव्वल तो रामजन्मभूमि के नाम पर चले आंदोलन में ही संघ मीडिया को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने में कामयाब रहा था। तब हिंदी पट्टी के शहरों-कस्बों के बहुत सारे पत्रकार बाकायदा रामजन्मभूमि आंदोलन समिति का हिस्सा थे और खबरों में ही नहीं बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों व राज्य की खुफिया एजेंसियों से संघ की योजनाओं को मदद दिलाने में भी भूमिका निभा रहे थे। बाद में, संघ शावकों के लिए सरकारी दफ्तरों की तरह ही अखबारी दफ्तरों में भी लुकाछिपी के बजाय खुलकर खेलने का दौर आया और वे मीडिया हाउसों के संपादक व महाप्रबंधक जैसे पदों पर छा गए। और अंतत: रिपोर्टिंग का रुख ऐसा बदला कि संघ और भाजपा नेताओं की हिंसक व राष्ट्रविरोधी कारगुजारियां लोगों और संघ से ताल्लुक न रखने वाले नए पत्रकारों को भी राष्ट्रवादी व सहज लगने लगीं। मुजफ्फरनगर-शामली की सांप्रदायिक हिंसा में यही हुआ। मोदी की गुजरात सरकार के पूर्व गृहमंत्री अमित शाह को जेल से जमानत दिलाकर मिशन यूपी पर भेजा गया तो पूरे प्रदेश में सांप्रदायिक वारदातों की बाढ़-सी आ गई। मुजफ्फरनगर-शामली जिलों में पिछले कई महीनों से जगह-जगह मुसलमान युवकों की पिटाई, रेलों व बसों में उन पर हमलों, मस्जिदों, मदरसों में तोडफ़ोड़, जमातियों व देवबंद मदरसे के छात्रों के साथ दुव्र्यवहार की वारदातें लगातार अंजाम दी जा रही थीं और संघ व भाजपा के नेता-कार्यकर्ता ऐसी किसी भी घटना को दंगे में तब्दील करने के लिए खुलेआम कोशिश करते दिखाई दे रहे थे तो भी मीडिया ने कभी उनकी भूमिका को प्रश्नांकित करने की कोशिश नहीं की। उलटे जब भी हमलावरों पर कार्रवाई की नौबत आई तो अखबार भगवा ब्रिगेड की 'एकतरफा कार्रवाई’ के सुर में सुर मिलाते नजर आए। 

शामली के एसपी (अब पूर्व) अब्दुल हमीद के मुसलमान होने को निशाना बनाकर माहौल गरमाए रखने और मामूली बातों को लेकर शामली को दो बार आग में झोंक दिए जाने की भाजपा विधायकों हुकुम सिंह और सुरेश राणा की ओछी हरकतों को अखबारों ने पूरा-पूरा सहयोग दिया। ऐसे अखबारों से यह उम्मीद की ही नहीं जा सकती थी कि वे गांवों में त्रिशूल-तलवारें बांटे जाने और एक बड़ी हिंसा की पटकथा तैयार कर लिए जाने की पोल खोलते। 

आखिर, सभी अखबारों ने आंखें मूंदकर संघ के पहले से तैयार इस सिद्धांत पर मुहर लगाई कि दंगे की वजह कवाल कांड को लेकर एकतरफा कार्रवाई के विरोध में उपजा गुस्सा था। प्रदेश सरकार और उसके मंत्री खासकर आजम खां और पूर्व मंत्री अमीर आलम खान पर सरकारी मशीनरी के हाथ-पांव बांध देने और सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव बनाने को दंगों का कारण बताया गया। बेशक, सपा सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में होनी ही चाहिए लेकिन अखबारों ने यह जानना-बताना जरूरी नहीं समझा कि कवाल कांड से पहले की तमाम वारदातें और कवाल कांड से लेकर सात सितंबर की महापंचायत के बाद व्यापक पैमाने पर शुरू हुई हिंसा के बीच संघ व भाजपा के नेता क्या कर रहे थे। क्या पंचायतों-महापंचायतों के मंच उनके हाथों में नहीं आ गए थे? क्या शांति की बात भी करने वाले किसी भी नेता को वे सरेआम बेइज्जत नहीं करा रहे थे? क्या जगह-जगह मुसलमानों पर हुए हमलों में उनके नेटवर्क की कोई भूमिका नहीं थी? क्या महापंचायत में पहुंच रहे युवक खुलेआम हथियार लहराते हुए और मुसलमानों के खिलाफ अश्लील-आक्रामक नारेबाजी नहीं कर रहे थे? क्या बीजेपी और संघ परिवार के नेताओं के संचालन में हुई इन पंचायतों में मुसलमानों को सबक सिखाने के आह्वान नहीं किए गए? अखबारों ने बीजेपी नेताओं या खापों-पंचायतों के मुखियाओं से नहीं पूछा कि जाटों के गांवों की गरीब आबादियों जो हर हाल में उनकी जी-हुजूरी में थे, के खिलाफ इतने बड़े पैमाने पर सामूहिक हिंसा, बलात्कार और आगजनी के लिए आजम खां कैसे जिम्मेदार हो गए। अगर उस चैनल के प्रायोजित और हास्यास्पद स्टिंग को सच मान लें कि पुलिस को कार्रवाई न करने के लिए कहा गया था तो गांवों के इतने 'इंसाफपसंद’ चौधरी क्या कर रहे थे? लेकिन अखबारों ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ किसी भी हिंसा की आड़ के तौर पर एकतरफा कार्रवाई के जुमले को रट लिया था।

धुर उत्तराखंड तक पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसी जमाने में एकतरफा धाक रखने वाले अमर उजाला को मेरठ-मुजफ्फरनगर के खेतों की डोल तक पर बैठकर पढ़े जाने का घमंड था। अमर उजाला की मेरठ यूनिट और भारतीय किसान यूनियन के मरहूम नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के सितारे एक साथ और एक-दूसरे के सहारे बुलंदी की तरफ बढ़े थे। इस सांप्रदायिक हिंसा को अमर उजाला ने शायद इन गांवों में अपना खोया रुतबा दोबारा हासिल करने का मौका समझा हो या फिर यह संघ की नेटवर्किंग और इस इलाके में ताकतवर जाटों के दबाव का नतीजा हो कि उसने भी गांवों में हुई भयानक हिंसा की तथ्यपरक रिपोर्टिंग करने के बजाय इसे जेनुइन और स्वाभाविक प्रतिक्रिया साबित करने की कोशिशों को ही प्रमुखता दी। सात सितंबर को महापंचायत से लौटते लोगों के साथ जौली नहर के पास मुसलमानों से टकराव को किसी जमाने में सरयू नदी का पानी कारसेवकों के खून से लाल हो जाने जैसे मिथ की तरह पेश किया जा रहा था। अफवाहें फैला दी गईं कि कई सौ जाटों को मारकर नहर में फेंक दिया गया है। ऐसे में इस अखबार ने पहले पेज पर एक समाचार प्रमुखता के साथ छापा कि जौली नहर पर पंचायत से लौटते लोगों पर हमला नक्सली हमले जैसा था। लेकिन, यह नहीं बताया कि आखिर कुल कितने लोगों की मौत हुई और कितने लोग लापता हैं। किसी भी अखबार ने इस तथ्य पर प्रकाश डालने की जरूरत नहीं समझी कि इस इलाके में भी जो लोग मारे गए, उनमें दोनों ही संप्रदायों के लोग थे। लांक गांव की भयंकर हिंसा से किसी तरह जान बचाकर आए अल्पसंख्यक जिस प्रधान सुधीर कुमार उर्फ बिल्लू पर दंगाइयों के नेतृत्व करने का आरोप लगा रहे थे, अमर उजाला 12 सितंबर के अंक में उसे राहत कार्य तेज कर देने वाले मसीहा की तरह पेश कर रहा था। दंगों के शिकार गरीब अल्पसंख्यकों के प्रति संवेदनहीनता का आलम यह था कि 15 सितंबर को एक खबर का शीर्षक था- 'अस्पतालों में तीमारदारों ने हंगामा काटा’। इसी अखबार ने 19 सितंबर को पहले पेज पर 'पुलिस पर हमलों तक के मुकदमे नहीं’ शीर्षक से स्टोरी प्रकाशित की जिसका लब्बोलुआब यह था कि आजम खां के दबाव में पुलिस इतनी बेबस थी कि सिपाही को गोली लगने और हिंसक भीड़ से घिरे अफसरों के मुकदमे भी दर्ज नहीं हो सके। मतलब, मुसलमानों को कुछ नहीं कहा जा रहा है लेकिन, ऐसी किसी खबर के लिए कोई जगह नहीं थी कि कई गांवों में आगजनी, हत्याओं और बलात्कार के समय पुलिस चौधरियों के घर पर चाय पीती रही थी, उत्पीडि़तों के मुकदमे दर्ज करने के बजाय पुलिस उन्हें धमकाकर एफिडेविट ले रही थी और पुलिस के आला अफसरों के बयान और गतिविधियां इतनी संदेहास्पद थीं कि जांच की मांग करती थीं।

एक मुस्लिम बहुल गांव से पलायन कर कमालपुर गांव में शरण लेने वाले दलितों को बीजेपी ने लगातार कवच की तरह इस्तेमाल किया। मानो, सांप्रदायिक दंगों में हिंदुओं के शिकार होने के लिए संघ-बीजेपी के सांप्रदायिक अभियान जिम्मेदार न हों। सच्चाई तो यह है कि संघ-भाजपा को अपने हिमायती के तौर पर देख रहे जाटों को हिंसा के लिए उकसाने, उनके गांवों का तानाबाना झुलसा देने, उन्हें मुकदमों में फंसा देने और उन्हें आसान मोहरा बना लेने के लिए इन्हीं ताकतों की साजिशें जिम्मेदार थीं। कमालपुर में शरणार्थी दलितों को ईख के खेत में झुकाकर दौड़ाते हुए एक फोटो खींचा गया जिसका अमर उजाला में कैप्शन लगाया गया कि जंगलों में मारे-मारे घूमते दलित। थोड़ा-सा भी विवेक रखने वाला आदमी ऐसे फोटो की असलियत समझ सकता है। बाद में 19 सितंबर को ऐसा ही एक फोटो खेतों की तरफ भागते लोगों का छापा गया कि किस तरह जाटों के गांवों के लोग पुलिस के डर से खेतों में भागे फिर रहे हैं। सवाल उठता है जो पत्रकार किसी तरह जंगलों में जाकर ऐसी कवरेज कर रहे थे, वे कस्बों में शिविरों में पड़े लोगों का दर्द क्यों नहीं सुन पा रहे थे। सामूहिक बलात्कार की खबरों को क्यों दबाया जा रहा था जबकि सोशल साइट्स और फैक्ट फाइंडिंग कमेटियों के दस्तावेजों में पीडि़त युवतियों की दास्तान दर्ज हो रही थी? काफी दिनों बाद किसी तरह पुलिस ने बलात्कार के छह मुकदमे दर्ज किए तो इन शिकायतों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करने वाली खबरें छापी गईं।

अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान आदि सभी अखबार एक ही लाइन पर चलते रहे। हिंदुस्तान के मेरठ इकाई के संपादक ने 15 सितंबर को इंटेलीजेंस की रिपोर्ट के बहाने से मुख्य खबर का शीर्षक लगाया, 'पुलिस की एकतरफा कार्रवाई से हुई हिंसा’। 18 सितंबर को इसी अखबार ने मुखपृष्ठ की बॉटम स्टोरी छापी- 'हिंदुस्तान ने किया था खुलासा, क्यों भड़का दंगा’। इस खुलासे में वही रटे-रटाए जुमले 'एकतरफा कार्रवाई’ और 'नेताओं की सियासत’ उठाए गए थे। एकतरफा कार्रवाई मतलब मुसलमानों की तरफदारी और नेताओं की सियासत मतलब आजम खां? बीजेपी-संघ की भी कोई सियासत रही होगी या ये संगठन भजन-कीर्तन में जुटे थे? बाद में बीजेपी के दो विधायक सुरेश राणा और संगीत सोम गिरफ्तार हुए तो ये अखबार इन विधायकों के पम्फलेट में बदल गए। प्रदेश सरकार ने इन दोनों को हीरो बनने का पूरा मौका दिया। 20 सितंबर को सुरेश राणा ने गिरफ्तारी दी तो अमर उजाला ने किसी नेता के मंत्री, राज्यपाल आदि बनने पर छापे जाने वाले विस्तृत जीवनचरित के अंदाज में खबर छापी- 'आंदोलन से सुर्खियों में आए थे राणा’। इसमें बताया गया कि 1997-98 में जलालाबाद (शामली जिले का एक कस्बा) में प्रतिमा क्षतिग्रस्त करने के मामले से राणा सुर्खियों में आए थे। कायदे से खबर का शीर्षक होना चाहिए था- 'धार्मिक मुद्दों पर सांप्रदायिक खेल की उपज हैं राणा’। इसी अखबार ने उनकी पत्नी नीता सिंह का बयान छापा - 'मुझे गिरफ्तारी पर गर्व है’। सांप्रदायिक दंगों के आरोपी विधायक के समर्थन में पत्नी के फोटो और बयानों के बहाने भावुक माहौल बनाने का अखबारों का अभियान लगातार जारी है। करवा चौथ पर हिंदुस्तान ने राणा की पत्नी नीता सिंह का पीले बाने में फोटो छापा और किसी राजपूतानी वीरांगना के अंदाज वाला उनका बयान छापा कि उन्हें देश की सुरक्षा की सरहद पर जाने वाले सैनिक की पत्नी जैसा महसूस हो रहा है। इन दोनों में से एक विधायक को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा गया तो एक अखबार ने उसकी पत्नी का बयान छापा कि मर्यादा पुरुषोत्तम भी 14 साल के लिए वनवास पर गए थे। संगीत सोम ने 21 सितंबर को गिरफ्तारी से पहले सभा की जिसकी खबरें और तस्वीरें अखबारों ने किसी महान रणबांकुरे की गाथा की तरह पेश की। इस बारे में 22 सितंबर के दैनिक जागरण के कुछ शीर्षक देखिए- 'जनसैलाब के बीच सोम गिरफ्तार’, 'खून की नदी पर नाव चलाना चाहती है सरकार’’, 'कोई जेल ज्यादा दिन नहीं रोक सकती मुझे’। आलम यह है कि दोनों विधायकों की हीरो छवि बनाने के लिए इन बड़े अखबारों में प्रतिद्वंद्विता चल रही है। उनकी हर तारीख, हर पेशी अखबारों में उनकी वंदना में तब्दील हो जाती है। इन दोनों के आजम खां पर हमले और अपनी कारगुजारियों पर गर्व भरे वही बयान पांच-पांच, सात-सात कॉलम में दोहराने की रस्म इन अखबारों ने तय कर ली है। साथ में समर्थकों के बहाने भी कई-कई फोटो छापे जाते हैं। उनसे पूछे जाने वाले सवाल भी किसी पत्रकार के बजाय किसी संघ कार्यकर्ता के प्रायोजित सवालों जैसे होते हैं।

मुजफ्फरनगर-शामली पहुंच रहे इन अखबारों की इन दिनों की दैनिक सुर्खियों में हिंसा के आरोपियों को बचाने के लिए जाटों की लामबंदी भी जोरशोर से शामिल है। इतने बड़े पैमाने पर हिंसा, बलात्कार और अल्पसंख्यकों के पलायन का कोई दोषी है या बस यही सच्चाई है कि निर्दोषों को फंसाकर जाटों का उत्पीडऩ किया जा रहा है? अखबार इन चौधरियों और आंदोलकारी जाट महिलाओं से नहीं पूछते कि चलिए निर्दोषों को फंसा दिया गया है तो असली हत्यारे, बलात्कारी कौन हैं, आप बताइए? उलटे आलम यह है कि आंदोलन जाटों से ज्यादा इन अखबारों के कंधों पर है। हिंदुस्तान ने 18 सितंबर को पूरे पेज पर फैलाकर शीर्षक लगाया- 'दो-दो सरकारें आईं पर जाटों का दर्द किसी ने न जाना’। इस शीर्षक के नीचे खरड़, लिसाढ़, सिसौली, फुगाना, मुंडभर, लांक, डुंगर, बहावडी, काकडा, कुटबा, भाज्जु आदि जाट बहुल गांवों के चौधरियों के फोटो व बयान सजाए गए कि जाटों के साथ एकतरफा कार्रवाई की जा रही है। संघ-बीजेपी को अपनी इस हिंसक इंजीनियरिंग में गठवाला खाप के मुखिया हरकिशन की खुली मदद मिली है। लिसाढ़ गांव में बलात्कार की शिकार हुई युवतियां इस मुखिया के बेटे का नाम भी ले रही हैं। हरिकिशन पर मुकदमे कायम किए गए हैं तो अखबार उसकी उम्र और सामाजिक हैसियत का गुणगान कर रहे हैं। हिंदुस्तान ने 18 सितंबर को ही गब्बरनुमा शीर्षक दिया- 'सो जा...नहीं तो पुलिस आ जाएगी’। गांव-गांव की महिलाओं के 'आंदोलन’ की खबरें एकत्रित करने के बजाय अलग-अलग पन्नों पर फैलाई जा रही हैं। कई-कई फोटो छापे जा रहे हैं जिनमें महिलाओं के हाथों में तमंचे, लाठी, डंडे लहरा रहे होते हैं। तीन अक्टूबर के दैनिक जागरण में एक ऐसे ही फोटो के साथ शीर्षक छापा गया- 'महिलाओं व बच्चों ने थामे लाठी और तमंचे’। साथ में मोटे-मोटे अक्षरों में पूरा हुनर उडेल दिया गया- 'अपने सुहाग और बेटों की फर्जी नामजदगी को लेकर मुजफ्फरनगर और मेरठ की महिलाएं देहरी लांघ सड़कों पर उतर आई हैं। उनका आक्रोश चंडी का रूप धारण करता जा रहा है। मीठे बोल झरने वाली जुबान मुर्दाबाद रूपी आग उगल रही है। चुनरी के बोझ से झुक जाने वाले कंधे सरकार के नुमाइंदों के पुतले ढो रहे हैं। चूडिय़ों की खनखनाहट नारेबाजी के शोरोगुल में खो गई है। मेहंदी रचे हाथों में लाठी, डंडे और तमंचे तक लहरा रहे हैं।’ 

राहत शिविरों के 15-17 युवाओं के आइएसआइ के संपर्क में होने के राहुल गांधी के बयान पर नरेंद्र मोदी सवाल खड़ा कर रहे हैं लेकिन उनकी पार्टी के नेता तो आए दिन ऐसे बयान दे रहे हैं। काली वर्दी के कमांडो जैसे लोगों के बार-बार गांवों में दिखाई देने के प्रचार को जिस तरह मीडिया की मदद से खड़ा किया गया है, उसके पीछे संघ का दिमाग ही लगता है। हिंदुस्तान ने राहुल का बयान आते ही सीना ठोकने में देरी नहीं लगाई कि वह तो पहले ही ऐसा कह रहा था। दैनिक जागरण ने 23 सितंबर को 'जाटलैंड पर जमी नागपुर की नजर’ शीर्षक से लिखा कि संघ ने पूरे रिसर्च के साथ गांव-गांव में सामाजिक व जाति संगठनों की मदद से अपने कार्यकर्ता उतार रखे हैं। उधर, बीजेपी नेताओं को आक्रामक बने रहने के लिए कहा गया है। बीजेपी के सतपाल मलिक जैसे नेता धमकी के अंदाज में बोल रहे हैं कि सुरक्षा सेना नहीं पड़ोसी दे सकते हैं। राह चलते लोगों की हत्याओं का सिलसिला जारी है जिसे अखबार 'साइलेंट वार’ करार दे रहा है। खौफ का आलम तारी है लेकिन मुख्यमंत्री के मंत्री चाचा शिवपाल सिंह यादव उत्पीडि़तों के शिविरों में बने रहने पर सवाल खड़े कर रहे हैं और मीडिया तो लगातार ही इन राहत शिविरों को लेकर आक्रामक है ही। 

सवाल यह उठता है कि दंगों की रिपोर्टिंग करने के लिए जरूरी मानकों तक का पालन नहीं कर पाए अखबारों का यही रवैया चलता रहा तो शांति और इंसाफ की कल्पना भी कैसे की जा सकती है? तथ्यों की तलाश में यहां पहुंची कई टीमों ने अखबारों के इस रवैये पर चिंता भी जाहिर की है। सवाल है प्रेस परिषद शायद इस ओर कब ध्यान देगी और कोई ठोस कदम उठाएगी? अधिकांश मामलों में प्रेस परिषद के निर्देशों को ठेंगा दिखाने के आदी मीडिया घरानों को इस मामले में अदालत तक ले जाया जाए तो शायद ज्यादा बेहतर हो।

और तहलका ... 

हथियारों की खरीद में दलाली को लेकर किए गए स्टिंग के जरिए एनडीए सरकार को हिलाकर रख देने वाले तरुण तेजपाल का तहलका भी मोदी युग तक आते-आते फुस्स हो चला लगता है? इस समूह की हिंदी पत्रिका पाक्षिक तहलका ने 30 सितंबर 2013 को निकाले अपने अंक में मुजफ्फरनगर-शामली दंगों को लेकर जो रिपोर्टिंग की, वह तथ्यों के अन्वेषण के बजाय संघ-बीजेपी द्वारा पहले ही फैला दिए गए फॉर्मूले को पुख्ता करने की हास्यास्पद कोशिश ही साबित हुई। 'फूट डालो राज करो’ शीर्षक से प्रकाशित आवरण कथा के दूसरे पैरे में कवाल में 27 अगस्त को तीन युवकों शाहनवाज, सचिन और गौरव की हत्या का उल्लेख करते हुए लिखा गया, 'इससे पैदा हुई चिंगारी ने हफ्ता बीतते-बीतते प्रचंड सांप्रदायिक ज्वाला का रूप ले लिया।’ यहां हम उम्मीद करते हैं कि शायद आगे जाकर यह साफ होगा कि इतनी बड़ी हिंसा कवाल से उठी चिंगारी के देखते-देखते ज्वाला में बदल जाना नहीं था बल्कि पिछले कई महीनों से संघ-बीजेपी और उनके दूसरे संगठन अमित शाह के नेतृत्व में इसकी तैयारी में जुटे थे। लेकिन कुछ नेताओं और अफसरों के बयानों के जरिये यह तो समझाने की कोशिश की गई कि सूबे की सरकार और उसका मुख्यमंत्री निकम्मे हो गए थे लेकिन संघ-बीजेपी के लिए छठे पैरे में मासूमियत से दो दिलचस्प प्रश्नवाचक वाक्य लिखे गए- 'क्या लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने राजनीतिक रूप से सबसे अहम सूबे में हिंसा भड़काने की साजिश रची? या फिर उसने केवल मौके का फायदा उठाया?’ इस आवरण कथा के लिए जुटे तहलका के तीन-तीन रिपोर्टर (दिवाकर आनंद, वीरेन्द्र नाथ भट्ट और साथ में अशहर खान) इसका जवाब नहीं देते। काश कि वे पिछले कुछ महीनों के अखबारों के स्थानीय पन्ने ही पढ़ डालते जो जगह-जगह मुसलमानों पर हमलों, धर्मस्थलों में तोडफ़ोड़ और भाजपा नेताओं की मुहिमों से रंगे पड़े थे। लेकिन, उन्होंने इसके बजाय जाटों की भावना पर जोर देते हुए लिखा- 'बातें दोनों ही तरह की हो रही हैं, लेकिन कई लोग इस बात से हैरान हैं कि राज्य सरकार जाट समुदाय की भावनाएं समझने में नाकाम रही, वह भी तब जब भाजपा पांच सितंबर को ही जाटों की हत्याओं के विरोध में मुजफ्फरनगर बंद का सफल आयोजन करा चुकी थी।’

बहरहाल, तहलका की पूरी कथा जरूर इस भावना पर केंद्रित रही। यह जिक्र देखिए- 'शाहनवाज वही युवक है जिस पर लड़की का पीछा करने का आरोप था और जिसकी हत्या लड़की के भाइयों ने की थी। इसके बाद लड़की के भाइयों की भी हत्या हो गई थी।’ कवाल कांड में छेडख़ानी के सिद्धांत को लेकर सवाल उठते रहे हैं। शुरू में इसे साइकिल की टक्कर से उपजा विवाद बताया गया था, जैसी बातों पर गौर फरमाना या इसका जिक्र करना तहलका टीम जरूरी नहीं समझती। क्या इसलिए कि इससे 'बहु-बेटी बचाओ’ जिसमें संघ के कारकुनों ने हिंदू शब्द भी जोड़ दिया था, नारा सवालों में आ जाता और सांप्रदायिक हिंसा के स्वत:स्फूर्त और स्वाभिवक गुस्सा होने के फॉर्मुले को खतरा होता? पूरी कथा को चतुराई से उसी तरह लिखा गया है, जिस तरह की मुजफ्फरनगर-शामली के संघ कार्यकर्ता और स्थानीय अखबार बोलते रहे कि पहले मुसलमान ने ये किया, फिर सरकार ने तरफदारी की और फिर ये सब हो गया। 'राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बसपा के मुजफ्फरनगर से मुस्लिम सांसद कादिर राणा ने 30 अगस्त को कथित रूप से एक भड़काऊ भाषण दिया और उसके बाद जिले के उच्च अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा। बाद में पुलिस ने उन पर आपराधिक मुकदमा दर्ज किया।’ वैसे तो यह एक साधारण तथ्य का उल्लेख लगता है लेकिन तथ्य की ही बात करें तो उस दिन मुजफ्फरनगर के खालापार में जुमे की नमाज के बाद हजारों की भीड़ जमा थी। जगह-जगह हमलों, जाटों की 31 अगस्त की पंचायत के ऐलान और बीजेपी नेताओं के तेवरों से पैदा अराजकता के माहौल में बुरी तरह डरे मुसलमानों को कादिर समेत कई मुस्लिम नेताओं ने संबोधित किया था। इसे बीजेपी और उसके इशारों पर नाच रहे जाट नेताओं ने यह कहकर मुद्दा बनाया कि प्रशासन ने धारा 144 का उल्लंघन व भड़काऊ भाषण होने दिए और खुद अफसरों ने वहां पहुंचकर ज्ञापन लिए तो 31 अगस्त की पंचायत को कैसे रोका जा सकता था। लेकिन, इससे पहले ही प्रशासन के साथ भाकियू नेता राकेश टिकैत व कई बीजेपी नेताओं ने वार्ता के बाद पंचायत को स्थगित करने का ऐलान किया था और फिर बीजेपी और उसके जाट नेता इससे मुकर चुके थे। इस सबका जिक्र करने के बजाय तहलका टीम मासूमियत से लिखती है- ''1 अगस्त को क्षेत्र के जाटों ने मिलकर उन मुस्लिम लड़कों के खिलाफ तुरंत पुलिस कार्रवाई करने की मांग की थी जो दो जाट युवकों की हत्या के दोषी थे। जब कुछ नहीं हुआ तो उन्होंने सात सितंबर को एक विशाल बहु-बेटी बचाओ जाट महासभा का आयोजन किया।’’ बेचारे तहलका को पता ही नहीं चला कि 31 अगस्त को नगंला मंदौड में बड़ी पंचायत हुई थी जिसमें जगह-जगह से हथियार लहराते युवकों के जत्थे नारेबाजी करते पहुंचे थे और बीजेपी व संघ नेताओं ने मंच पर कब्जा कर रखा था जिन्होंने भड़काऊ भाषण दिए थे? उसे यह भी पता नहीं चला कि शांति की बात कर सकने वाले गैर भाजपाई जाट नेताओं को मंच से बोलने ही नहीं दिया गया था और यह भी कि पुलिस की उपस्थिति में ही पंचायत में शामिल युवकों ने एक कार सवार दंपति की हत्या की कोशिश की थी और कार को फूंक दिया था? सात सितंबर की महापंचायत तक क्या-क्या हो चुका था, पांच सितंबर को बीजेपी के बंद के अलावा लिसाढ़ में गठवाला खाप के मुखिया हरिकिशन जो संघ के हाथों की कठपुतली बन चुके थे, भी पंचायत कर अगले घटनाक्रम पर मुहर लगा चुके थे, तहलका को पता नहीं चल सका? 

सात सितंबर की महापंचायत का जिक्र करते हुए तहलका ने फिर से शाहनवाज के 'लड़की छेडऩे’ की बात को दोहराया- ''उस दिन कवाल के पास इंटरमीडिएट कॉलेज के मैदान पर एक लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ इकट्ठाहुई। इसी स्कूल में मृतक गौरव की बहन पढ़ती है जिसे कथित तौर पर शाहनवाज छेड़ता था।’’ आगे देखिए, ''बताया जाता है कि शाम पांच बजे के करीब इस महापंचायत से लौट रहे लोगों की ट्रैक्टर-ट्रोलियों पर मुसलमानों ने हमला कर दिया। इस घटना के चश्मदीदों के मुताबिक हमलावरों ने गंग नहर के पास उन पर देसी तमंचे और धारदार हथियारों से हमला किया था।’’ यह नहीं बताया गया कि हथियारबंद युवकों के जत्थे रास्ते भर मुसलमानों को ललकारते-पीटते महापंचायत में पहुंच रहे थे। कई गांवों में टकराव हो चुका था और एक मुसलमान युवक को अगवा कर पंचायतस्थल पर ही उसकी हत्या कर दी गई थी।

लेकिन तहलका की कल्पनाशक्ति और 'गॉशिप जर्नलिज़्म’ के नमूने अभी बाकी हैं। गांवों में हुए कत्लेआम के बारे में यह पत्रिका लिखती है- ''हालात ऐसे हो गए कि हजारों की संख्या में मुसलमानों और जाटों को अपना घर छोड़कर पलायन करना पड़ा।’’ हजारों जाटों ने किन-किन गांवों से पलायन किया, उनके राहत शिविर कहां हैं, यह या तो खुदा जाने या यह पत्रिका। 

इस कथा के अलावा एक स्टोरी 'आपराधिक गड़बड़ी के बारह दिन!’ भी कम दिलचस्प नहीं है। इसमें भी दंगों की जो वजहें गिनाई गईं, उनमें संघ-बीजेपी बरी ही रहे और महीनों से मुसलमानों के खिलाफ चल रही सिलसिलेवार वारदातों का जिक्र तक नहीं आया। महापंचायत से लौट रहे जाटों पर हमलों का जिक्र करते हुए जो लिखा गया, गौरतलब है- ''अगले दिन डेढ़-दो लाख लोगों का जत्था हमले से बच-बचाकर अपने गांवों में पहुंचा तो हालात काबू में रहने की हर संभावना खत्म हो गई।’’ पहली स्टोरी में पत्रिका ने लिखा है कि महापंचायत में ''एक लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ इकट्ठा हुई।’’ लेकिन अगली ही स्टोरी में मुसलमानों के हमले से किसी तरह बच-बचाकर अपने गांवों में पहुंचने वाला जत्था ही डेढ़-दो लाख लोगों का हो गया। तो क्या महापंचायत में पांच-दस लाख लोग थे या सारे के सारे लोग ही जत्था बनाकर जंगलों में मारे-मारे फिरे थे और सात सितंबर को अपने घर नहीं पहुंच पाए थे? फेसबुक पर अफवाहें फैला रहे संघी भी पांच-छह सौ जाटों के गायब हो जाने की बात कर रहे थे। डेढ़-दो लाख जाटों का जत्था एक रात इधर-उधर मारे फिरकर अगले दिन गांवों में पहुंच पाने की अफवाह तो संघी भी जानते हैं, किसी के गले नहीं उतरेगी पर तहलका के अतुल चौरसिया को यह लिखने में कोई कठिनाई नहीं हुई।

1 comment:

  1. शायद अभी डिजिटल मीडिया वर्सेज प्रिंट मीडिया में होड़ मची है की कौन कितना गिर सकता है? पहले ख़बरों की लीपापोती होती थी और बढ़ा-चढ़ा के पेश किया जाता था मगर अब 'काल्पनिक' कहानियां आने लगी हैं..गिरो..गिरो..जितना गिर सकते हो बेशर्मों! 'भांड' शब्द इन्ही जैसे कथित पत्रकारों के लिए ही बना है..

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