Wednesday, December 17, 2014

मोदी की ख़ामोशी और हाथ पर हाथ धरे बैठने की क्या वजह है..??


ऐसे शख्स के लिए जो टीवी पर दर्जनों बार भाषण देता हो, महीने में एक बार रेडियो पर बोलता हो और जब मर्जी हो ट्वीट करता हो, उसे अपनी बात रखने के लिए शब्दों की कमी नहीं होती.

भारतीय जनता पार्टी का झंडा, सैनिक
लेकिन हाल ही में पार्टी सहयोगियों की ओर से दिए जाने वाले 'सांप्रदायिक' बयानों के सवाल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी बड़ी ही रहस्यमयी लगती है.
भाजपा के प्रवक्ता बताते हैं कि मोदी ने जब कड़ी बात करनी हो तो, बंद दरवाजों के पीछे मुद्दे पर बात करते हैं और मुझे बताया गया कि वो दो बार ऐसा कर चुके हैं,

'हिंदू राष्ट्र':
आम लोगों के पास यह जानने का कोई रास्ता नहीं है कि 'लव जिहाद', धर्मांतरण, बाबरी मस्जिद विध्वंस और भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के बारे में मोदी क्या सोचते हैं.
उस भारत के बारे में जिसे उनके परिवार के लोग 'हिंदू राष्ट्र' कहते हैं.
उन ताजा रिपोर्टों को ही लें जिनमें मोदी को पार्टी सासंदों को शराफत की 'लक्ष्मण रेखा' न लांघने की सलाह देते हुए बताया गया है.
यह सलाह भी उन्होंने यह कहते हुए दी कि इससे विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका मिलता है.

विवादित बयान:
भाजपा नेताओं के अनुसार मंगलवार को संसद भवन में हुई पार्टी सासंदों की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री ने ये बात कही.
माना गया कि महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथुराम गोडसे को देशभक्त बताने वाले साक्षी महाराज के बयान से उपजे विवाद पर यह बात कही गई.
योगी आदित्यनाथ ने भी गोडसे को 'हिंदुओं का गर्व' कहा पर साक्षी महाराज बाद में इस बयान से मुकर गए.
पिछले हफ़्ते मोदी ने साध्वी निरंजन ज्योति को भी निशाने पर लिया था.

मुखर मोदी:
साध्वी पर राम को न मानने वाले भारतीयों के प्रति अपशब्द के इस्तेमाल का आरोप लगाया गया था.
अमूमन मुखर रहने वाले प्रधानमंत्री मोदी का कथित तौर पर पार्टी सांसदों को कूट संदेश था, "ऐसे मत बोले जैसे कि आप पूरे देश को संबोधित कर रहे हैं."
निश्चित रूप से ख़राब बात कहने वाले किसी व्यक्ति को झिड़कने का यह निराला तरीका था.
संयोग से मोदी ने ख़तरनाक और विभाजनकारी बयान देने वाले सांसदों की आलोचना नहीं की.
और जैसा हमें बताया गया, दिक्कत इस बात को लेकर थी कि विपक्ष इन मुद्दों के सहारे सरकार को विवाद में घसीटने की कोशिश कर रहा है.

'लव जिहाद':
15 अगस्त को मोदी ने कहा था कि सांप्रदायिकता की राजनीति पर 'दस सालों तक के लिए रोक' लगा दी जानी चाहिए.
इसके ठीक बाद संघ परिवार ने मुस्लिम विरोधी भावनाओं को हवा देनी शुरू कर दी, खासकर उन निर्वाचन क्षेत्रों में, जहां उपचुनाव होने थे.
मोदी के सहयोगी अमित शाह ने भाजपा के 'सांप्रदायिक अभियान' के नेतृत्व के लिए योगी आदित्यनाथ को चुना.
संघ ने संगठन के मुखपत्र 'पाञ्चजन्य' का एक पूरा अंक कथित 'लव जिहाद' को समझाने के लिए समर्पित कर दिया.

समर्पित सिपाही:
यह वही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है जिसकी वफादारी की कसमें मोदी से लेकर भाजपा के छोटे से छोटे नेता तक खाते रहते हैं.
इनमें से किसी को प्रधानमंत्री ने एक बार भी फटकार नहीं लगाई, एक शब्द तक नहीं कहा.
इन सब बातों से अब तक ये साफ हो जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री के बयानों की अस्पष्टता एक सोची समझी बात है.
मोदी संघ परिवार के बोलबाज़ मोहरों की सार्वजनिक तौर पर आलोचना नहीं करेंगे क्योंकि ये सभी वही समर्पित सिपाही हैं जिन्होंने मिशन 272 का वादा पूरा करने में अपनी भूमिका निभाई है.

तरक्की और समृद्धि:
आज उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में पार्टी को सत्ता तक पहुँचाने और भाजपा की स्थिति मज़बूत करने के लिए इनकी जरूरत है.
लेकिन इसके साथ ही मोदी को यह भी पता है कि ख़ामोश रहना कोई बहुत अच्छा विकल्प नहीं है.
उनके 'विकास' के नारे ने क़रीब 12 फ़ीसदी मतों को पार्टी के पक्ष में किया था और अगर मतदाताओं को ये अहसास हुआ कि उन्हें ठगा गया है तो फिर चुनावी तस्वीर बदल सकती है.
देश के लाखों लोगों ने मोदी पर भरोसा जताया है क्योंकि वे नौकरी, तरक्की और समृद्धि लाने के उनके वादे पर यकीन करते हैं.
यही कारण है कि भाजपा वक़्त-वक़्त पर यह जताती रहती है कि पार्टी नेता जो कुछ भी कह रहे हैं, मोदी उससे नाखुश हैं.

एक कारगर औजार:
सच तो यह है कि ज़मीन पर ज्यादा कुछ नहीं बदला है. सत्ता में बैठे नेताओं के लिए सांप्रदायिकता एक कारगर औजार रही है.
सत्ता में बैठे लोगों को जिस मक़सद के लिए चुना जाता है, उसे पूरा न कर पाने की सूरत में मिली नाकामी से लोगों का ध्यान हटाने में सांप्रदायिकता से मदद मिलती है.
जैसा कि मोदी ने वादा किया था और अगर 2018 तक अच्छे दिन नहीं आ पाए तो वे आदित्यनाथ की मेहनत के शुक्रगुजार होंगे.
लेकिन फिलहाल सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाले लोगों की बयानबाज़ी से प्रधानमंत्री के हित इतनी जल्दी नहीं सधने वाले हैं.

'सांस्कृतिक' एजेंडा:
अगर नौकरी और तरक्की चाहने वाले वोटर आखिरकार राजनीतिक हिंदुओं में बदल जाएं तो आदित्यनाथ की पीठ ठोंकने और शिक्षा समेत अन्य क्षेत्रों में संघ के 'सांस्कृतिक' एजेंडे को जगह देने की रणनीति लंबे समय में कारगर हो सकती है.
लेकिन मौजूदा हालात के मद्देनज़र देखें तो इस उबाल के हमेशा ही ख़तरे रहेंगे.
इसलिए सवाल उठता है कि मोदी सामाजिक समरसता के ताने-बाने में छेड़छाड़ के लिए क्यों ख़तरा उठाने को तैयार हैं.
ख़ासकर तब जब कि अर्थव्यवस्था के सुधार की दिशा में उनका काम बमुश्किल शुरू ही हुआ है.

संघ परिवार:
कहीं नरेंद्र मोदी को यह अहसास तो नहीं हो गया कि जो जिम्मेदारी उन्होंने ले ली है, उसे पूरा करना आसाना काम नहीं है.
सवाल यह भी है कि क्या वे अपने चुनावी वायदों को पूरा कर पाने की अपनी काबिलियत पर भरोसा खोने लगे हैं?
या, संघ परिवार को अनुशासित करने के लिए जिस तरह के प्रभाव की जरूरत है, वो उनके पास नहीं है?
शायद मोदी उतने अच्छे 'प्रशासक' नहीं है जितना उनके समर्थकों ने उन्हें मान लिया था. या शायद वे उत्तर प्रदेश या फिर किसी और जगह उभर रहे ख़तरे के संकेतों को पहचान नहीं पा रहे हैं.
साफ लफ़्ज़ों में कहूं तो मैं यह समझ नहीं पा रहा हूं कि उनकी ख़ामोशी और हाथ पर हाथ धरे बैठने की क्या वजह है.
लेकिन अगर वो अपनी चुप्पी नहीं तोड़ते हैं और नफ़रत की ज़बान बोलने वालों की सार्वजनिक आलोचना नहीं करते तो भारत के लिए आने वाले दिन मुश्किल भरे हो सकते हैं.


-सिद्धार्थ वरदराजन वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

Tuesday, December 09, 2014

कर्नाटक के राजस्व मंत्री सतीश जर्कीहोली ने अंधविश्वास के विरुद्ध साथियों सहित श्मशान में गुजारी एक रात


आजादी के 67 वर्ष बाद आज भी देश में बड़ी संख्या में लोग अंधविश्वासों के शिकार होकर भूत-प्रेत तथा जादू-टोने के चक्कर में उलझे हुए हैं। इसी कारण बहुत से लोग रात को कब्रिस्तानों अथवा श्मशानघाट में जाना या उनके निकट से गुजरना अच्छा नहीं समझते।

एक अंधविश्वास यह भी है कि नदियों में बहाए जाने वाले दीपक आत्माओं को श्मशान तक आने का रास्ता दिखाते हैं। जादू-टोना करने वाले वहां तरह-तरह के अनुष्ठान करते रहते हैं। अंधविश्वासी लोग बुरी शक्तियों से बचाव के नाम पर या गड़ा धन आदि प्राप्त करने के लिए भी तरह-तरह के अनुष्ठान ऐसे लोगों से श्मशानघाटों आदि में करवाते रहते हैं।

आम लोग तो अंधविश्वासों के कारण दिन के समय भी श्मशानघाट पर जाने से संकोच करते हैं लेकिन ये लोग रात के समय भी वहां चैन की बांसुरी बजाते हैं। इन तथाकथित जादू-टोना करने वालों की ‘साधनाओं’ में काले मुर्गे की बलि चढ़ाकर मांस-मदिरा का प्रसाद चढ़ाना और निर्वस्त्र होकर ‘शव साधना’ करना आदि शामिल होता है।

लोगों के मन से इसी अंधविश्वास के विरुद्ध जागरूकता पैदा करने के लिए कर्नाटक के राजस्व मंत्री सतीश जर्कीहोली ने 6 दिसम्बर की रात अपने सैंकड़ों साथियों के साथ बेलगावी के श्मशान ‘वैकुंठ धाम’ में बिताई। यहां 24 शवदाह स्थल हैं। यहां उन सब लोगों ने रात का खाना भी खाया।

कर्नाटक विधानसभा में अंधविश्वास निरोधक विधेयक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सतीश जर्कीहोली ने कहा ‘‘यहां रात बिता कर पहले तो मैं इस गलतफहमी को तोडऩा चाहता था कि श्मशान जैसी जगहों पर भूत रहते हैं और दूसरी बात यह कि मैं इससे जुड़ा भय समाप्त करना चाहता हूं क्योंकि वास्तव में श्मशानघाट पवित्र स्थान होता है। सत्ता में न रहने के बाद भी मैं अंधविश्वासों के विरुद्ध अपना मिशन जारी रखूंगा।’’

सतीश जर्कीहोली ने यह भी कहा ‘‘यदि लोग अंधविश्वासों का मुकाबला नहीं करेंगे तो तथाकथित पिछड़े वर्गों तथा अनपढ़ लोगों को कभी भी न्याय नहीं मिल पाएगा। बिल गेट्स विश्व के सर्वाधिक  अमीर व्यक्तियों में से एक हैं परंतु वह पूजा नहीं करते और मैं भी नहीं करता, हालांकि मेरा 600 करोड़ रुपए वार्षिक का व्यवसाय है।’’

जादू-टोने के संबंध में विडम्बना यह है कि सिर्फ अनपढ़ और आम लोग ही नहीं बल्कि स्वयं को पढ़े-लिखे और बुुद्धिजीवी कहने वाले तथा राजनीतिज्ञ और फिल्म जगत से जुड़े लोग भी अंधविश्वासों को मानने वालों में शामिल हैं।

अंधविश्वासी राजनीतिज्ञों में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येद्दियुरप्पा का नाम उल्लेखनीय है जो अपनी ‘शत्रु दुष्टआत्माओं के नाश’ के लिए फर्श पर कई-कई रात निर्वस्त्र सोने के अलावा गधे आदि की बलि भी देते रहे हैं।

बड़ी संख्या में लोगों की भावनाएं इतनी मजबूत है कि अंधविश्वासों के विरुद्ध अभियान चलाने वाले महाराष्ट्र के समाजसेवी नरेंद्र दाभोलकर की अगस्त 2013 में उनके विरोधियों ने पुणे में गोली मारकर हत्या कर दी थी जिसके बाद महाराष्ट्र सरकार अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली परम्पराओं पर रोक लगाने संबंधी विधेयक पारित करने के लिए मजबूर हुई है जो नरेंद्र दाभोलकर के 25 वर्षों के अनथक प्रयासों का ही परिणाम है।

सतीश जर्कीहोली का यह प्रयास भूत-प्रेतों के अस्तित्व के संबंध में व्याप्त जनभ्रांतियां दूर करने की दिशा में एक अच्छा पग है। जिस तरह महाराष्ट्र सरकार ने ‘अंधविश्वास निरोधक विधेयक’ पारित किया है उसी प्रकार कर्नाटक व अन्य राज्यों की सरकारों को भी ऐसे विधेयक पारित करने चाहिएं ताकि भोले-भाले लोगों को ऐसे ढोंगी लोगों के छल-प्रपंच में फंसने और अपना शोषण कराने से बचाया जा सके।

Monday, December 08, 2014

लाख रुपए की बात कही है साध्वी जी ने


जब अमरीकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट से पूछा गया कि वो निकारागुआ के तानाशाह अनास्तासियो समोज़ा की इतनी खुलकर हिमायत क्यों करते हैं तो उन्होंने कहा, "हाँ, वे हरामज़ादे हैं पर वो हमारे हरामज़ादे हैं."
साध्वी निरंजन ज्योति, भारत, केंद्रीय राज्य मंत्री

अब अगर साध्वी निरंजन ज्योति रूज़वेल्ट नहीं हैं तो इसमें उनका क्या कसूर. रूज़वेल्ट ने तो माफ़ी भी नहीं माँगी थी.
साध्वी जी ने तो यह कहने पर माफ़ी भी माँग ली कि "अब आपको यह तय करना है कि रामज़ादों को चुनेंगे कि......को."
मगर क्षमा चाहने के बाद भी पढ़े-लिखे लोग बेचारी साध्वी के पीछे लठ लिए घूम रहे हैं, ये कैसा अन्याय है?
अगर फूड प्रोसेसिंग का मंत्री भी फूड फॉर थॉट नहीं उगल सकता तो फिर कद्दू का मंत्री.
बयान का इनाम:

वैसे सलाम है आप सबकी बुद्धि को. अगर गुजरात का कोई शहरवासी 2002 के दंगों पर अफ़सोस करते हुए ये कहे कि अगर कार के पहिए के नीचे कोई पिल्ला भी आ जाए तो दुख तो होता है तो आप उसे प्रधानमंत्री चुन लेते हो.
अगर मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों के संदर्भ में अमित शाह जैसा पढ़ा-लिखा शहरी बाबू ये कहे कि ये सम्मान और बदले की भावना का मामला है तो नफ़रत फैलाने के जुर्म में चुनाव आयोग की तरफ़ से चुनावी भाषणों पर पाबंदी के बाद भी सत्ता चलाने वाली पार्टी अमित जी को अपना प्रधान बना लेती है.
अगर कोई आदरणीय गिरिराज सिंह ये कहे कि जो मोदी का विरोधी है वो गद्दार है उसे भारत छोड़ के पाकिस्तान में बस जाना चाहिए तो इनाम में उसे कोई केंद्रीय मंत्रालय थमा दिया जाता है.
साध्वी पर ग़ुस्सा:
आप शहरवासियों का ग़ुस्सा बस गाँव की एक बेचारी साध्वी निरंजन ज्योति पर ही क्यों निकलता है?
जिन लोगों में वो दिन-रात उठती-बैठती हैं, उन्हें जो कुछ जितना भी सिखाया-पढ़ाया गया है और जो नज़रिया बताया गया है उसी का तो वो पालन कर रही हैं.
अगर आप लोगों का कुम्हार पर वश नहीं चल रहा है तो गदहे के कान क्यों मरोड़ते हैं?
पाकिस्तानियों का दिल

आपसे ज़्यादा खुले दिल के लोग तो पाकिस्तान में हैं.
इमरान ख़ान भरे जलसे में नवाज़ शरीफ़ को चोर और जरदारी को लुटेरा कहते हैं. मौलाना फ़जलुर्रहमान इमरान ख़ान को यहूदी एजेंट और जरदारी इमरान ख़ान को एजेंसियों का आदमी कहते हैं.
यहाँ कोई भी खुलकर किसी को गद्दार और देशद्रोही कह सकता है, उसे मुसलमान मानने से इनकार कर सकता है. पर मजाल है किसी के माथे पर शिकन आ जाए.
और आप हैं कि ख़ुद को विश्व की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी कहते हैं लेकिन लोकतंत्र के इस बुनियादी नियम को भी नहीं समझते कि जो आदमी के मन में है वही ज़बान पर भी होना चाहिए. अगर इतनी भी आज़ादी न हो तो कैसा लोकतंत्र.
प्रार्थना:
भाइयों मेरी इतनी सी प्रार्थना है कि निरंजन ज्योति के मामले में ऐसे उतावले न बनिए.
अगले चुनाव तक वो भी शहरी नियमों से परिचित हो जाएंगी और जब वो ये कहेंगी कि आपको बिना ह के रामज़ादों और ह वाले रामज़ादों में से किसी एक का चुनाव करना है तो फिर आप समेत हर कोई ताली बजाकर कहेगा कि वाह! क्या लाख रुपए की बात कही है साध्वी जी ने...
-वुसतुल्लाह ख़ान
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