Wednesday, June 17, 2015

रामपुर, रामायण और रज़ा लाइब्रेरी-रवीश कुमार



रामपुर, रामायण और रज़ा लाइब्रेरीअर्से से रज़ा लाइब्रेरी की इस इमारत को देखने की हसरत थी। उत्तर प्रदेश के रामपुर से इतनी बार गुज़रा, मगर इस खूबसूरत इमारत को बाहर और भीतर से देखने का मौका नहीं मिला। लाइब्रेरी देखने का पुराना शौक है। कोलकाता की नेशनल लाइब्रेरी भी इसी तरह शाम के वक्त झांक आया था, जब वहां कोई नहीं था। 1836 में बनी थी कोलकाता पब्लिक लाइब्रेरी, 1891 में इम्पीरियल लाइब्रेरी बनी और फिर लार्ड कर्ज़न ने दोनों को मिलाकर 1903 में इम्पीरियल लाइब्रेरी बनाई। आज़ादी के बाद 1953 में यह नेशनल लाइब्रेरी के नाम से हिन्दुस्तान की जनता को समर्पित कर दी गई।

रज़ा लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए मुझे कोलकाता का ही ख़्याल आया। लाइब्रेरी के सहयोगी काफी रोचक तरीके से बता रहे थे कि देखिए सीढ़ियों, दरवाज़े और दीवारों पर वर्मा की टीक लकड़ियां लगी हैं। 1774 में रामपुर के नवाब फ़ैज़ुल्ला ख़ान ने इसकी बुनियाद रखी थी। नवाबों की अपनी एक लाइब्रेरी हुआ करती थी, जिसे कुतुबनामा कहा जाता है। एक बार 'रवीश की रिपोर्ट' के लिए रिसर्च करते वक्त पश्चिमी यूपी के इलाकों में फोन करने लगा, तो पता चला कि बहुत-सी लाइब्रेरी कब की खत्म हो चुकी हैं। बाहर के मुल्कों के ख़रीदार औने-पौने दामों पर किताबें ले जा चुके हैं। वह रिपोर्ट तो नहीं बन सकी, लेकिन रज़ा लाइब्रेरी देखने की हूक बाकी रह गई।



इटालियन मार्बल से बनी इन मूर्तियों की उम्र सौ साल से ज़्यादा हो चुकी है। काश इस गलियारे की तरह रामपुर की राजनीतिक विरासत भी शानदार और सौम्य होती। रामपुर के ही हैं आज़म ख़ान और मुख़्तार अब्बास नक़वी, लेकिन उनकी सियासी ज़ुबान पर इस लाइब्रेरी का ज़रा भी असर नहीं दिखता है। यहां आकर लगा कि शहर ने भी इस लाइब्रेरी को छोड़ दिया है। वहां जवानियां नहीं दिखीं। कुछ लोग मिले, जो लाइब्रेरी के लिए अपनी विरासत को देखने आए थे। कुछ थके हुए नौजवान अख़बार पढ़ते मिले। बताया गया कि यहां इज़राइल, अमेरिका से काफी विद्वान आते हैं, भारत से कम ही आते हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रज़ा लाइब्रेरी की ख़ूबी मालूम हैं। उन्होंने अपनी दो-दो विदेश यात्राओं के लिए यहां से विरासती किताबों के नमूने मंगवाए हैं। रज़ा लाइब्रेरी भारत सरकार के तहत एक स्वायत्त संस्था है।


अलग-अलग दौर में लाइब्रेरी के लिए कमरे से लेकर इमारतें बनती रहीं। इस तस्वीर में आप हामिद हॉल देख रहे हैं। इसकी भव्यता आपसे सवाल पूछने लगती है कि बताओ, अभी तक कहां थे। नवाब मोहम्मद सईद ख़ान ने लाइब्रेरी के लिए अलग डिपार्टमेंट ही बनवाया था। 1857 की क्रांति के समय अंग्रेज़ों ने लाइब्रेरी को काफी नुकसान पहुंचाया, फिर भी लाइब्रेरी खड़ी हो गई। इस हामिद हॉल में म्यूज़ियम है, लेकिन जब यह हॉल बना था, तब यहां नवाब हामिद अली की कोर्ट लगा करती थी। इस हाल में औरतों को ऊपर से देखने के लिए बाल्कनी बनी हुई हैं। 1905 में रज़ा लाइब्रेरी इस इमारत में आ गई और तब से यहीं है। इस हॉल में शैंडिलियर की एशिया में हस्ती है और इसमे लगा फिलिप्स बल्ब सौ साल से फ्यूज़ नहीं हुआ है।

रामपुर की राजनीति बदल रही है। आज़म ख़ान ने काफी कुछ सुधार किया है। रामपुर को चमका रहे हैं। दबी और अपुष्ट ज़ुबान में सुनने को मिला कि आज़म ख़ान को नवाबों के दौर से दुश्मनी है। वह लाइब्रेरी के कॉम्प्लेक्स के बाहर बने बुलंद दरवाज़ों को ढहा सकते हैं। अजमेरी गेट और कश्मीरी गेट जैसे बने गेट नहीं रहेंगे तो लाइब्रेरी की इस इमारत की भव्यता कंगाल हो जाएगी।


इस कॉलम को ग़ौर से देखिए। सबसे नीचे मस्जिद है, फिर चर्च, उसके ऊपर गुरुद्वारे का झरोखा और सबसे ऊपर मंदिर। फ्रांसीसी वास्तुकार राइट ने इस कॉलम की कल्पना की थी। ज़ाहिर है नवाबों की सहमति भी रही होगी। यह इमारत हिन्दुस्तान के सेकुलर होने के तसव्वुर की एक अच्छी मिसाल हो सकती है। कितने झगड़े बंद करवा सकती है। इन सब छोटे-छोटे किस्सों से सेकुलर हिन्दुस्तान बनने की प्रक्रिया आज भी जारी है। मज़हबी तकरारों के अनगिनत ख़ूनी क़िस्सों के बीच ये छोटे-छोटे किस्से सुकून देने वाले हैं।


रज़ा लाइब्रेरी में अनेक भाषाओं और लिपियों की 17,000 पांडुलिपियां हैं। मक्का की लाइब्रेरी की भी पांडुलिपि है, तो सत्रहवीं सदी की रामायण की पांडुलिपि है। सातवीं सदी का लिखा हुआ क़ुरान है। स्वर्ण जड़ित क़ुरान और रामायण हैं यहां। सत्रहवीं सदी की वाल्मीकि रामायण तो देखने लायक है। रज़ा लाइब्रेरी ने इस रामायण को ऐसे संभालकर रखा है, जैसे राम ही इस लाइब्रेरी के देवता हों। इमारत में घुसते ही पहली बात यही बताई जाती है कि हमारे पास एक खास वाल्मीकि रामायण है।


अकबर के समय रामायण का फारसी में अनुवाद कराया गया था। एक रामायण जयपुर में है। रज़ा लाइब्रेरी में भी फारसी में एक रामायण है। प्रो. शाह अब्दुस्सलाम और डाक्टर वकारुल हसल सिद्दीकी ने फारसी से हिन्दी में अनुवाद किया है। इस रामायण को देखना ख़ुद को तीन सदी पीछे ले जाने जैसा था। मुग़ल शैली में 258 प्रसंगों के चित्र बनाए गए हैं। उन तस्वीरों में राम, सीता और रावण आज के ज़माने से बिल्कुल अलग दिखते हैं। इस तस्वीर में रामायण के दस सिरों के ऊपर एक गधा भी है।


रज़ा लाइब्रेरी के पास जो रामायण है, उसका अनुवाद 1713 में सुमेर चन्द ने संस्कृत से फारसी में किया था। सुमेर चन्द ने मुगल शासक फ़र्रुखसियर के शासनकाल में लिखा था। इसे सोने के पानी तथा कीमती पत्थरों के रंगो से गुलबूटे और नक्शो-निगार से लौह (पन्ने का ऊपरी भाग) सजाई गई है। अब देखिए, संस्कृत से फ़ारसी में अनुवाद एक हिन्दू करता है और फ़ारसी से हिन्दी में अनुवाद दो मुस्लिम करते हैं। वक़ारुल हसन अपने अनुवाद को पुस्तक के रूप में देख भी नहीं सके। उनका देहांत हो गया। संसार की किसी भी भाषा में लिखित रामायण में इतनी बड़ी संख्या में रंगीन तस्वीरें नहीं हैं।

"बिस्मिल्लाह-अर्रहमान-अर्रहीम - सारी प्रशंसा उस ईश्वर के लिए ही है, जो मेरा पथप्रदर्शक है और कृपापात्र होना भी उसी को शोभनीय है... उस वहदूद लाशरीक (अद्वितीय, ईश्वर) के उपकार के बाद मैं यह रामायण लिख रहा हूं... यद्यपि पृथ्वी पर तीन रामायण पाई जाती हैं, परन्तु श्रीराम की मनोनुकूल रामायण यही है..."

रामायण की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है। चार हज़ार रुपये में आप इस रामायण को ख़रीद सकते हैं। काफी भारी है वैसे। इसकी तस्वीरों पर ही अलग से किताब हो सकती है। राम-लक्ष्मण और सीता मुग़ल शैली के राजसी परिधानों में नज़र आते हैं। खासकर पगड़ी या टोपी बिल्कुल ही मुग़लिया दौर की हैं। कुछ तस्वीरों में हाथ में धनुष की जगह तलवार है। ऋषि-मुनियों के बीच के श्रीराम धोती और जनेऊ में नज़र आते हैं। विश्वामित्र, श्रीराम और राजा दशरथ का एक चित्र है, जिसमें बर्तनों में हीरे जड़े हैं। यह रामायण बेहद संग्रहणीय है। रामपुर के पास एक ऐसा रामायण है, जिसकी कथा अभी ठीक से नहीं कही गई है... कही जानी चाहिए।

हमारी सरकारें पर्यटन के विज्ञापनों में धार्मिक स्थलों और महलों को ही दिखाती हैं। लाइब्रेरी और म्यूज़ियम का ज़िक्र तक नहीं आता। बाहर के मुल्कों में म्यूज़ियम का दर्शन करना सबसे महत्वपूर्ण पर्यटन माना जाता है। लाइब्रेरी के सहयोगी काफी मददगार हैं। शुक्रवार को छोड़ रज़ा लाइब्रेरी सभी दिन खुली रहती है।

मुझे उम्मीद है कि पर्यटन पर ज़ोर देने वाले हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पर भी विचार करेंगे। कम से कम अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश की इस विरासत का प्रचार तो कर ही सकते हैं। किसने रोका है कि वह केंद्र की लाइब्रेरी का प्रचार नहीं कर सकते। इतिहास तो उनके राज्य का ही है। रामपुर की छुरी और आज़म ख़ान के तंज बयानों को सब जानते हैं, रज़ा लाइब्रेरी का रामायण कहा जाएगा तो समाज को कहीं ज्यादा लाभ होगा।

1 comment:

  1. एक बार इस पुस्तकालय को देखने जाना पड़ेगा।

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