Sunday, July 19, 2015

फांसी पर लटकाए जाने वाले मुसलमानों के पास राजनीतिक समर्थन की कमी है


इब्राहिम टाइगर मेमन के भाई याक़ूब मेमन को इस महीने के अंत में फांसी दिए जाने की ख़बरें आजकल भारतीय मीडिया में चल रही हैं.

याक़ूब मेमन को जिस जज पीके कोडे ने सज़ा सुनाई थी, उन्हें मैं पिछले दो दशकों से जानता हूँ. चरमपंथ के मामलों के लिए बनी उनकी कोर्ट की मैं रिपोर्टिंग किया करता था.
कोडे ने जब याक़ूब मेमन को साज़िश रचने के लिए सज़ाए मौत दी थी तो उनके फ़ैसले ने याक़ूब के वकील सतीश कांसे समेत कई लोगों को हैरान कर दिया था.
कुछ साल पहले कांसे ने रेडिफ़ डॉट कॉम की शीला भट्ट को बताया था, “याक़ूब ने कभी पाकिस्तान में सैन्य प्रशिक्षण नहीं लिया. उन्होंने कोई बम या आरडीएक्स नहीं लगाया था, ना ही हथियार लाने में कोई हिस्सेदारी की थी. जिन लोगों को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी, वो इन ख़तरनाक़ गतिविधियों में से किसी न किसी तरह से शामिल थे. याक़ूब के ख़िलाफ़ इनमें से किसी भी मामले में आरोप नहीं थे.”
लेकिन, अब चाहे जो हो, वो फांसी देंगे और इस मामले में ऐसा पहली बार होगा.

याक़ूब पर मुकदमा चलाने वाले उज्ज्वल निकम ने कहा था, “मुझे याद है कि मुझे वो एक शांत और चुप व्यक्ति लगे थे. वो एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं इसलिए सबूतों के बारे में उन्होंने विस्तार से नोट लिए. वो शांत थे और दूसरों से दूर ही रहते थे. केवल अपने वकील से ही बाते करते थे. वो बुद्धिमान आदमी थे और वे पूरी सुनवाई बारीकी से देख रहे थे.”
उज्ज्वल निकम वही वकील हैं, जिन्होंने अज़मल कसाब के बिरयानी मांगने के बारे में चर्चित झूठ बोला था.
उस समय कोर्ट में मैंने भी कुछ ऐसा ही महसूस किया था.
मेमन चुप थे और कार्रवाई पर नज़र रखे हुए थे. मैंने सिर्फ एक बार उन्हें भावुक होते हुए देखा. यह बात साल 1995 के अंत या 1996 के शुरुआत की रही होगी.
उस समय मामले की सुनवाई कर रहे जज जेएन पटेल ने कई अभियुक्तों को ज़मानत दे दी थी.
एक उम्मीद थी, लेकिन यह मेमन बंधुओं के लिए नहीं थी. याक़ूब को चिल्लाते और बिना किसी को नुकसान पहुंचाए आक्रामक होते हुए मैंने पहली बार देखा था. उन्होंने कहा था, “टाइगर सही था. हमें वापस नहीं लौटना चाहिए था.”
मुझे ताज्जुब होगा अगर वो इन सालों में बदल गए हों. मीडिया की ख़बरों के अनुसार, वो आज नागपुर के जेल की एक एकांत कालकोठरी में फांसी का इंतज़ार कर रहे हैं.
ये अलग बात है कि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, एकांत कोठरी में रखना ग़ैरक़ानूनी है.

उनके लिए कोर्ट से राहत की एक आखिरी कोशिश बाकी है.
मेरे दोस्त आर जगन्नाथन ने 'फ़र्स्टपोस्ट डॉट कॉम' में अपने एक लेख में दमदार तर्क दिया है कि क्यों सरकार को याक़ूब मेनन को फांसी नहीं देनी चाहिए.
वो तर्क देते हैं कि राजीव गांधी और पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामलों में जिन्हें फांसी दी जानी थी, उन्हें अभी तक फांसी पर नहीं लटकाया गया है.
तमिलनाडु विधानसभा की दया अपील के बाद राजीव की हत्या करने वाले संथन, मुरुगन और पेरारीवलन की फांसी की सज़ा कम कर दी गई थी. बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह राजाओना ने बड़े गर्व से अपना अपराध स्वीकार किया था और उन्होंने खुद को फांसी दिए जाने की मांग की थी.
लेकिन उन्हें अभी तक ज़िंदा रखा गया है. शायद इसका कारण पंजाब विधानसभा की कोशिशें हैं.

जगन्नाथन ने लिखा है, “एक चीज़ सबको साफ़ दिखती है. जहां एक सज़ायाफ़्ता हत्यारे या चरमपंथी के पास मज़बूत राजनीतिक समर्थन होता है वहां न तो सरकार और ना ही अदालत निष्पक्ष न्याय देने की हिम्मत जुटा पाती है.”
अब देखिए, जब हत्यारों की अलग किस्म का मामला आता है जैसे अज़मल कसाब, अफ़जल गुरु और अब याक़ूब मेमन, तो कैसे वही केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और अदालतें ‘क़ानून का सम्मान’ करने में दिलचस्पी लेने लगती हैं.
जगन्नाथन के मुताबिक़,“फांसी पर लटकाए जाने वाले मुसलमानों में और एक बात है. इन सबके पास राजनीतिक समर्थन की कमी है.’’
मैं सहमत हूँ और इस कारण मैं सोचता हूँ कि मेमन को फांसी दे दी जाएगी.
इस फांसी के साथ ही धमाके मामले में अदालती सुनवाई से मेरा जुड़ाव भी ख़त्म हो जाएगा.

एक रिपोर्टर के रूप में अपने पहले दिन, मैं अभियुक्तों से मिला था. उस दिन मैं मुंबई के आर्थर रोड ज़ेल देर शाम को पहुंचा था.
ज़ेल के बंद दरवाज़ों के सामने बुरक़ा पहने दर्जन भर महिलाएं ख़डी थीं. ये औरतें अपने पतियों, बेटों या भाइयों को घर का खाना देने के लिए आवेदन करना चाहती थीं.
इन महिलाओं को अंग्रेज़ी लिखना नहीं आता था और उनमें से एक ने मुझसे लिखने को कहा था. मैंने उन सबके लिए आवेदन लिखे थे.
जैसे ही मैंने लिखना ख़त्म किया, एक गॉर्ड जेल के गेट से बाहर आया और जेल के सबसे ऊपरी सिरे पर एक अंधेरी खिड़की की ओर इशारा करते हुए बोला कि जेलर मुझसे मिलना चाहते हैं.
मुझे जेलर हीरेमठ के पास पहुंचाया गया. उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं क्या कर रहा था.

मैंने उन्हें बताया तो वो नरम पड़े.
हीरेमठ ने मुझे ज़ेल दिखाने का प्रस्ताव किया और पूछा, “क्या आप संजय दत्त से मिलना चाहते हैं?”
मैंने हां कहा और इस तरह से मैं धमाके के अभियुक्त लोगों को जान पाया और उनसे नियमित रूप से कोर्ट और जेल में मिलने लगा.
दत्त की तरह कुछ लोग फिर से जेल में हैं.
जबकि शांत और मध्यवर्ग से आने वाले मोहम्मद जिंद्रान जैसे लोग मार दिए गए हैं.
और अब, फांसी दिए जाने के लिए याक़ूब की बारी है.

(आकार पटेल एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक हैं.)
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

No comments:

Post a Comment

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...