Monday, July 27, 2015

याकूब तुम्हारा नाम कुरान में लिखा है.....तुम गुनहगार हो.....फांसी!


याकूब मेमन खुद को इस वक्त कितना बड़ा बेवकूफ समझ रहा होगा! और यह कितनी बड़ी विडंबना है। जिस शख्स को पुलिस ने BBC (बॉम्बे ब्लास्ट केस) से उसकी इंटेलिजेंस के आधार पर जोड़ा (पुलिस का मानना था कि ब्लास्ट की फाइनैंशल प्लानिंग को जिस समझदारी से अंजाम दिया गया, वैसा याकूब मेमन जैसा बेहद इंटेलिजेंट सीए ही कर सकता है), वही इंटेलिजेंट मेमन खुद को सबसे बड़ा बेवकूफ समझ रहा होगा।
वह उस शाम को कोस रहा होगा जब उसने दुबई में अपने दोस्त और अंडरवर्ल्ड डॉन इकबाल मिर्ची से कहा था कि वतन लौटने का मन करता है। हमने फिल्मों में देखा है कि डॉन्स की दोस्ती बहुत अच्छी होती है। मिर्ची ने भारत में अपने एक दोस्त से कहा कि याकूब भाई वतन लौटना चाहते हैं, तो उनकी तमन्ना पूरी होनी चाहिए। यह तमन्ना कैसे पूरी हुई, इसके लिए आपको एस हुसैन जैदी की किताब ब्लैक फ्राइडे पढ़नी चाहिए। किताबें सच्ची होती हैं, इतनी सच्ची कि उन पर पांव लग जाए तो हम विद्या रानी से माफी मांगते हैं।

याकूब कहता है कि वह वापस आया ताकि अपने नाम पर लगा आतंकवादी का दाग हटवा सके और एक भारतीय के तौर पर सुकून से मर सके। इसी तरह की बात रॉ के अधिकारी एस रमन भी कह गए थे।

पर पता है टाइगर मेमन ने क्या कहा था? BBC के मास्टरमाइंड अपने भाई टाइगर से जब कराची में याकूब ने कहा कि मुझे वापस जाना है, तो उसने कहा - तुम गांधीवादी बनकर जा रहे हो, वे तुम्हें गोडसे की तरह लटका देंगे।

है ना याकूब बेवकूफ? उसके भाई की बात सच साबित होने जा रही है। याकूब के हमवतनों ने उसकी बात नहीं मानी। क्षमा का प्रपंच करने वाले देश ने उसकी गलती पर माफी नहीं फांसी दी है। उसने सोचा होगा कि गांधी के देश में सचाई की जीत होगी, सच बोलूंगा। यहां गांधी खुद नहीं जीत सके, तुम कौन खेत की मूली हो बे मेमन? तुम्हें पता नहीं है कि तुम्हारा नाम याकूब है? याकूब तो एक पैगंबर था ना? यानी तुम्हारा नाम कुरान से आया है? तुम्हारा नाम कुरान में लिखा है??? हमें और सबूत नहीं चाहिए। तुम्हारा नाम कुरान में लिखा है, तुम गुनहगार हो। फांसी!

हां, तुम्हारा नाम असीमानंद होता तो हम कुछ कर सकते थे। पता नहीं याकूब मेमन ने असीमानंद का नाम सुना होगा या नहीं! असीमानंद समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट केस में है। NIA की चार्जशीट में लिखा था कि समझौता ब्लास्ट के लिए किसी संघ नेता इंद्रेश ने 50 हजार रुपये दिए थे। लेकिन यह तो NIA की पहली चार्जशीट में था। आरोपियों में इंद्रेश का नाम नहीं है। गूगल पर इंद्रेश का नाम सर्च करो तो उनके

पाकिस्तान के विरुद्ध आग उगलते बयानों वाली खबरें मिलेंगी। वैसे आप हिंदी में सर्च करें तो मेरा सुझाव है कि 'इंद्रेशजी' सर्च कीजिएगा। संघ में 'जी' पर बहुत जोर होता है। समझौता ब्लास्ट केस का क्या हुआ? इसी 17 जुलाई को एक और गवाह मुकर गया। अब तक 10 मुकर चुके हैं। कर देंगे क्लोजर रिपोर्ट फाइल NIA वाले। आजकल इसकी खासी प्रैक्टिस हो गई है उन्हें। शायद क्लोजर रिपोर्ट का ड्राफ्ट तैयार ही रखा हो। मोडासा, मालेगांव के बाद... अब ये बहस मत लेकर बैठ जाना कि इन सारे मामलों में आरोपी हिंदू हैं। हम आतंकवाद को धर्म से जोड़कर नहीं देखते (जबतक कि आतंकी मुसलमान न हो।)। बोलो, कभी किसी खबर में देखा-सुना है आतंकवादी इंद्रेशजी? आतंकवादी साध्वी प्रज्ञा? आतंकवादी असीमानंद?

अच्छा, जरा सोचिए। अक्षरधाम मंदिर पर अटैक होता है 2002 में। 2006 में अदालत 6 लोगों को सजा सुना देती है, जिनमें से तीन को फांसी होती है। 2007 में समझौता एक्सप्रेस में ब्लास्ट होता है। 2011 में पहली चार्जशीट दाखिल होती है। 2006 में मालेगांव ब्लास्ट होता है। 2013 में पहली चार्जशीट दाखिल होती है। 2008 में मोडासा ब्लास्ट होता है। 2015 में केस क्लोज़्ड। आपको यह सब संयोग और न्यायसंगत लगता है तो आपकी मासूमियत पर मुझे प्यार ही आएगा।

खैर, तो याकूब मेमन तुम्हें मर जाना चाहिए। क्षमा जैसी बातें हिंदू धार्मिक किताबों में जरूर लिखी हैं लेकिन वे तो नैतिक शिक्षा के एग्जाम पास करने के लिए पढ़ाई जाती हैं। उन पर हम अमल नहीं करते। तुम्हें क्या लगता है, अगर अब तुम्हें फांसी न भी हो तो तुम्हारे पाप धुल जाएंगे? जेल में काटे 21 साल तुम्हारे गुनाह साफ नहीं कर सकते। पाकिस्तान के खिलाफ दिए सबूत तुम्हारे गुनाह माफ नहीं कर सकते। भारत और उसके संविधान के प्रति सम्मान में लिखा लेख तुम्हारे गुनाह माफ नहीं कर सकता। तुम आतंकवादी हो। हमेशा रहोगे। तुम्हारी आने वाली नस्लें भी आतंकवादी रहेंगे। जिंदा रहे तो रोज मरोगे। हम जब भी तुम्हें कहीं देखेंगे, तो अपनी निगाहों से फांसी देंगे। तुम्हारे माथे पर आतंकवादी लिख देंगे। क्यों यह रोज-रोज की मौत देखने के लिए जीना चाहते हो? मर ही जाओ।
~विवेक आसरी

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