Tuesday, September 01, 2015

दाभोलकर, गोविंद पानसरे और अब एमएम कलबुर्गी


कन्नड़ भाषा के मशहूर साहित्यकार और कर्नाटक विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति एमएम कलबुर्गी की हत्या ने एक बार फिर वैज्ञानिक सोच-समझ रखने वाले लोगों और लोकतांत्रिक व्यवस्था को गहरी चोट पहुंचाई है। रविवार को सुबह करीब साढ़े आठ बजे हमलावरों में से एक युवक खुद को कलबुर्गी का छात्र बता कर उनके घर में दाखिल हुआ और गोली मार कर फरार हो गया। 

यह समझना मुश्किल नहीं है कि अंधविश्वासों और धार्मिक ठगी के खिलाफ कलबुर्गी की गतिविधियों से किन लोगों या समूहों के हितों को चोट पहुंच रही थी और उनकी हत्या किस मकसद से की या कराई गई होगी। अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ने और मूर्ति-पूजा पर सवाल उठाने वाले साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त लेखक और शोधकर्ता कलबुर्गी को दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों की ओर से लगातार धमकियां मिल रही थीं। पिछले साल ऐसे ही कुछ लोगों ने हिंदुओं की आस्था को आहत करने का आरोप लगा कर कलबुर्गी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी और उपद्रवी तत्त्वों ने उनके घर पर कई बार पत्थरबाजी भी की। इसके बावजूद कलबुर्गी ने इस तरह की हरकतों के बारे में किसी से जिक्र नहीं किया। हालांकि आशंकाओं को भांपते हुए छह महीने पहले उनके दोस्तों ने पुलिस सुरक्षा का इंतजाम करा दिया था। लेकिन एक पखवाड़े पहले ही कलबुर्गी ने पुलिस सुरक्षा हटवा दी। 

वे जिन विचारों के वाहक थे, उसमें शायद उन्हें किसी सुरक्षा या हथियार की जरूरत नहीं लगी होगी। ट्वीट के जरिए हत्या की धमकी देने वाले बजरंग दल के एक कार्यकर्ता को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। हाल के वर्षों में वैज्ञानिक चेतना और प्रगतिशील मूल्यों के वाहकों पर हमले या उनकी हत्या के मामले तेजी से बढ़े हैं। भारत में पिछले दो साल के भीतर यह तीसरी घटना है, जिसमें ऐसे व्यक्ति की हत्या कर दी गई जो अपने स्तर पर समाज में फैले अंधविश्वास पर आधारित धार्मिक मान्यताओं के प्रति लोगों की आंखें खोलने में लगा हुआ था। 

करीब दो साल पहले महाराष्ट्र में अंधविश्वासों और सांप्रदायिकता के खिलाफ लगातार सक्रिय रहे नरेंद्र दाभोलकर और फिर इसी साल फरवरी में गोविंद पानसरे की भी हत्या हो गई। इन हत्याओं के पीछे कौन है, सरकार और उसके संबंधित महकमे आज तक पता नहीं लगा सके। इसके अलावा, बांग्लादेश में अंध-आस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाले कई ब्लॉगरों को सरेआम मार डाला गया। जाहिर है, हत्या करने या कराने वाले लोगों या संगठनों को हमेशा इस बात का डर सताता रहता है कि अगर समाज में तार्किकता और वैज्ञानिक सोच का माहौल बन गया तो न सिर्फ पाखंड और धोखाधड़ी के उनके धंधे बंद हो जाएंगे, बल्कि इससे समूचे समाज के सोचने-समझने का ढांचा भी बदल जा सकता है। 

एड्स व कैंसर से भी खतरनाक है ... अंधविश्वास
जनसत्ता

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