Thursday, September 17, 2015

क्या फल और सब्ज़ियाँ खाने वाले पुण्य बटोरते हैं, वे हत्याएं नहीं करते?


शरीर के लिए माँसाहार उत्तम है या शाकाहार? भारतीय परिवेश की ये अन्तहीन बहस है. बहुतों की नज़र में ये फालतू की बहस है. लेकिन कुछ दिनों से छिड़ी भी तो हुई है. हाईकोर्ट तक इसमें कूद चुका है. कोई नहीं जानता कि भारतीय संस्कृति में शाकाहार और माँसाहार को पहली बार कब परिभाषित किया गया? सदियों से पशु-वध, संहार-शिकार और बलि को लेकर सामाजिक चेतना को जगाने की कोशिश होती रही है. लेकिन ज़रा सोचिए कि हमारे पुरखों की दृष्टि भी कितनी संकुचित रही होगी. क्योंकि सारी दुनिया को पहली बार भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस ने बताया था कि वनस्पतियों में भी वैसा ही जीवन और संवेदनाएँ होती हैं, जैसी जन्तु जगत में हैं. बोस ने 10 मई 1901 को वैज्ञानिकों से खचाखच भरे लन्दन स्थित रायल सोसाइटी के सेंट्रल हॉल में ये सिद्ध किया था कि पौधों में भी जीवन के वही लक्षण होते हैं जैसे जन्तुओं में हैं.

इससे पहले वेदान्त संस्कृति ये बता चुकी थी कि ब्रह्मांड की रचना जड़ (Non living) और चेतन (Living) से हुई है. बाद में वैज्ञानिकों ने इसकी आधुनिक परिभाषा तय की. जो साँस नहीं लेते और जिनमें वंश-वृद्धि की प्रक्रिया नहीं है वो जड़ हैं. जैसे पत्थर, मिट्टी, धातु वगैरह. जबकि पूरा प्राणिजगत जन्म-मृत्यु के बाहुपाश में है. इसका अध्ययन जीव विज्ञान (Biology) कहलाया. जन्तु विज्ञान (Zoology) और वनस्पति विज्ञान (Botany) इसकी शीर्ष शाखाएँ हैं. लिहाज़ा, माँसाहार हो या शाकाहार, मनुष्य को अपना पेट भरना है तो उसे जीव ‘हत्या’ तो करनी ही होगी. क्या सब्ज़ियों, फलों और दूध-घी में जीवन नहीं है? क्या जीवन सिर्फ़ माँस-मछली में ही है? क्या जीव-हत्या का पाप सिर्फ़ मुर्गा, बकरा, भेड़, सुअर और भैंसा वग़ैरह खाने वालों को ही लगेगा? क्या सब्ज़ियाँ, फल और दूध के सेवन से ज़िन्दगी गुज़ारने वाले पुण्य बटोरते हैं?

धार्मिक दृष्टि से देखें तो सभी धर्म और उपासना पद्धतियाँ बुनियादी तौर पर मनुष्य को प्रेम (Love), दया (Kindness), करूणा (Compassion), सहिष्णुता (Tolerance) और बन्धुत्व (Brotherhood) का सन्देश देती हैं. कालान्तर में अलग-अलग मतावलम्बियों (Followers) ने अपने-अपने सम्प्रदाय के लिए तरह-तरह के मिथक (Assumptions) गढ़ लिये. बदलते तौर में हरेक बात को धार्मिकता से जोड़ने का चलन आया. देखते-देखते सभी आचार-व्यवहार धार्मिक साँचे में ढाल दिये गये. इससे अन्धविश्वास का जन्म हुआ. जिसे सभी धर्मों के स्वार्थी तत्वों ने जमकर भुनाया. लेकिन जब वैज्ञानिक अविष्कारों ने पाखंडियों को आड़े हाथ लिया तो ‘धर्म’ की दुकान चला रहे लोग तिलमिला पड़े. ऐसा पूरी दुनिया में हुआ. हमेशा हुआ. आगे भी होता रहेगा.

सन् 1514 में जब कॉपरनिकस (Nicolaus Copernicus) ने सिद्ध किया कि ब्रह्मांड का केन्द्र पृथ्वी नहीं है. सूर्य, पृथ्वी के चारों ओर नहीं घूमता बल्कि पृथ्वी, सूर्य के चारों ओर घूमती है. इस बात से उस दौर के धर्माचार्य बौखला गये. उन्होंने पादरियों के परिवार से जुड़े कॉपरनिकस को विधर्मी बताकर सज़ाएँ दीं. इसीलिए दुनिया को उनके ज़्यादातर शोधों का पता उनकी मौत के बाद चला. कॉपरनिकस की दिखायी राह पर चलकर वैज्ञानिक ब्रुनो (Giordano Bruno) ने सन् 1600 में बताया कि ब्रह्मांड में सूर्य जैसे कई सौरमंडल हैं. सूर्य इकलौता नहीं है. इसी तरह दूरबीन के जनक गैलिलियो (Galileo Galilei) ने सन् 1610 में बताया कि बृहस्पति के चार चन्द्रमा हैं. लेकिन कैथोलिक धारणाओं को चुनौती देती ऐसी जानकारियों को वो 1633 तक छिपाये रहे. उनके शोधों की भनक पाकर उन्हें सज़ा मिली कि वो कॉपरनिकस की राह पर नहीं चलेंगे. लेकिन गैलिलियो चोरी-छिपे अपने शोध में लगे रहे. इसकी पोल खुली तो उन्हें क़रीब दस साल की नज़रबन्दी झेलनी पड़ी जो उनकी मौत से ही ख़त्म हुई.
  

साफ़ है कि दुनिया के हरेक समाज का एक तबका कभी नहीं चाहता कि उसके मिथकों को कोई चुनौती दे. ऐसा पाँच सौ साल पहले भी था. आज भी है. हालाँकि, इस दौरान दुनिया कहाँ से कहाँ आ पहुँची! शाकाहार और माँसाहार का द्वन्द तो उससे भी पुराना है. जीव विज्ञान हमें बखूबी समझा चुका है कि प्रकृति ने प्राणिजगत के लिए ऐसी भोजन-शृंखला (Food Chain) बनायी है जिसमें कोई किसी का भोजन है तो कोई किसी और का. किसी को हरियाली चाहिए तो किसी को तरह-तरह के जीव-जन्तु. शिकारी जानवर भूखे मर जाएँगे लेकिन घास नहीं खा सकते. गाय चाहे जितनी भूखी हो ख़रगोश नहीं खा सकती. जो प्राणी दूसरों का भोजन हैं, क़ुदरत ने उनकी वंश-वृद्धि की रफ़्तार ऐसी रखी है, जिससे नस्ल भी बची रहे और भोजन-शृंखला भी क़ायम रहे. कल्पना कीजिए कि आम के एक पेड़ पर जितने फल लगते हैं अगर वो सारे उसकी सन्तान की तरह आम के पेड़ बनने लगे तो कितने आम के पेड़ हो जाएँगे? ऐसा होता तो धरती पर सिर्फ़ आम ही आम के पेड़ होते. ऐसे ही फूलों के परागण का विधान है. कीट-पतंगे न हो तो उनकी वंश-वृद्धि कैसे होगी?

इन्सान गेहूँ इसलिए पैदा करता करता है कि उसे रोटी चाहिए. गाय-भैंस इसलिए पालता है कि उसे दूध चाहिए. इसी तरह से बकरी इसलिए पाली जाती है कि बकरे चाहिए. सूअर इसलिए पाला जाता है कि गोश्त चाहिए. मनुष्य ने न जाने कितने वर्षों के शोध के बाद ये तय किया होगा कि कौन-कौन से जानवर क्यों पालने हैं? किसकी क्या उपयोगिता होगी? गोश्त तो सभी में है. लेकिन पक्षियों में भी मुर्गे को ही क्यों नियमित भोजन के लिए चुना गया होगा? अंडा तो लाखों तरह के प्राणी देते हैं लेकिन सबको अंडों के लिए क्यों नहीं पाला जाता? दूध तो हरेक स्तनधारी में है, लेकिन दूध के लिए गाय-भैंस या ऊँट-याक वगैरह को ही क्यों पाला जाता है? ये सारी बातें तरह-तरह के समाजशास्त्रीय अध्ययन से सदियों में तय हुई होंगी.

बैक्टीरिया-वायरस जैसे अतिसूक्ष्म जीवों का पता क्या हमारे पुरखों को था? साफ़ है कि जब तक वैज्ञानिक तथ्य हमारी आँखों पर पड़ी धुन्ध को साफ़ नहीं कर देते, तब तक हम दकियानूसी भँवर में ही फँसे रहेंगे. इसके लिए किसी इंसान या धर्म में कमी-बेसी ढूँढने से कुछ होगा. फ़र्क़ पड़ेगा तो सिर्फ़ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से. वर्ना ढकोसले की बीमारी अनुवांशिक (Hereditary) ढंग से एक से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती रहेगी. काफ़ी समय से भारतीय समाज में अलग-अलग ढंग का तुष्टिकरण (Appeasement) दिखायी देता है. तुष्टिकरण का प्रचलित चेहरा सिर्फ़ हज या कैलाश मानसरोवर यात्रा पर मिलने वाली घोषित या अघोषित सब्सिडी ही नहीं है. किसी ख़ास वर्ग को लुभाने के लिए किसी ख़ास दिन सरकारी छुट्टी का एलान कर देना या किसी को रिझाने के लिए किसी पर्व विशेष पर माँस-बिक्री पर रोक लगा देना या सड़कों को तरह-तरह के जुलूसों, शोभायात्राओं वग़ैरह के लिए हर तरह की छूट दे देना – ये सारा भी तुष्टिकरण ही है. कोई भी सियासी या धार्मिक संगठन इससे अछूता नहीं है. सब एक जैसे हैं. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि कभी किसी एक तरह के लोगों का ज़ोर चलता है तो कभी दूसरे का.
  
भारत में धार्मिक आस्थाओं के नाम पर बलि देने की हिन्दू परम्परा कितनी पुरानी है, कोई नहीं जानता. यहाँ तो एक राजा इसलिए अमर हो गया कि उसने शरणागत कबूतर की रक्षा के लिए उसके शिकारी बाज़ को अपने शरीर का माँस देने का रास्ता चुना. क़िस्सों की भरमार है. आप जैसे क़िस्से ढूँढ़ना चाहेंगे, वैसे ही आपको मिलने लगेंगे. हमारे शहरों की किस प्रमुख सड़क पर आपको भटकता हुआ गौवंश नहीं दिखाई देगा? गाय को हमारी धार्मिक आस्थाओं से जोड़कर पूज्यनीय भले ही बना दिया गया हो, लेकिन उस जैसी बेक़द्री शायद ही भारतीय समाज में किसी और पशु की होती हो. सड़क पर दिखने वाली हरेक गाय कहने को तो बाक़ायदा पालतू है, लेकिन उसके पालनहार उसके साथ कितनी क्रूरता से पेश आते हैं, ये ज़रा सड़कों पर भटक रही उन ‘माताओं’ से पूछिए. उन्हें कूड़े-कचरों में मुँह मारकर पॉलीथीन की थैलियों समेत सड़े-गले को खाकर अपना पेट पालना पड़ता है. गायों का बुढ़ापा जितना कष्टकारी जीवन शायद ही किसी और प्राणी का होता हो. पता नहीं, हमारे धार्मिक ठेकेदारों को दुनिया के इस सबसे निरीह प्राणी पर कब तरस आएगा?

हमारे धार्मिक और सियासी नेता, चिन्तक, विचारक और विद्वान सामाजिक चेतना को लेकर किस सीमा तक ढोंग कर सकते हैं, इसका क़यास तक कोई नहीं लगा सकता. आज माँसाहार, पशु-वध जैसे विषयों को लेकर ऐसी बेचैनी दिखायी जा रही है, मानो यही देश की सबसे बड़ी चुनौती है. अफ़सोस की बात ये है कि सारी बहस से वैज्ञानिक और प्रगतिशील दृष्टिकोण नदारद है. ख़्वाहिश ये नहीं है कि हम अपनी विकृतियों को दूर करें. तमन्ना तो ये है कि कैसे हम दस-बीस सदी पीछे चले जाएँ! जीवन्त समाज में तार्किक बहस ज़रूर होनी चाहिए. लेकिन इस नज़रिये के साथ कि हम उनकी बातों को भी समझें-बूझें जो हमसे अलग सोचते हैं. बहस का मक़सद विषय को गहराई से समझने का होना चाहिए, न कि कटुता बढ़ने का.
मुकेश कुमार सिंह

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