Friday, February 05, 2016

गंगाजल, साधू यादव, लोकतंत्र की हत्या, संघ व उच्चतम न्यायालय का मूकदर्शक बना रहना

फिल्म "गंगाजल" में तेजपुर के एसपी अमित कुमार अपने इंस्पेक्टर बच्चा यादव से तमाम केस को दिखाते हुए कहते हैं कि "यह ऐसे तमाम केस जो तुम्हें दिये गये तुमने अपनी इमानदारी और दिन रात की मेहनत और लगन से काम करके इन पर फाइनल रिपोर्ट लगाई और मुजरिमों को अदालत से सज़ा दिलवाई पर जैसे ही "साधू यादव" से संबंधित इन फाईलों की ओर मैं देखता हूँ तो सोचता हूँ कि तुम्हारी इमानदारी और मेहनत को क्या हो जाता है"।

यही सवाल कल मेरे दिमाग में तब गूँजा जब उच्चतम न्यायालय ने अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन के विरुद्ध सुनवाई पर टिप्पणी करते हुए कही कि "लोकतंत्र की हत्या हो रही है तो हम मूक दर्शक बन कर नहीं रह सकते" उच्चतम न्यायालय का यह व्यवहार बिल्कुल इंस्पेक्टर बच्चा यादव की तरह था। क्युँकि जब मुसलमानों से संबंधित विषयों पर इसी तरह "लोकतंत्र की हत्या" होती है तो उच्चतम न्यायालय "मूक दर्शक" बन कर सदैव रहा है । आजादी से आजतक कोई एक मामले पर ऐसा फैसला जो देश के मुसलमानों के हक में उच्चतम न्यायालय ने दिया हो मुझे याद नहीं आता, फैसला तो छोड़िए एक टिप्पणी भी हक में आई हो मुझे याद नहीं पड़ती ।

इसी उच्चतम न्यायालय ने "बाबरी मस्जिद" के मामले में यथास्थिति रखने के अपने आदेश, 6 दिसम्बर के पूर्व बाबरी मस्जिद की सुरक्षा के लिए कल्याण सिंह से लिए "शपथपत्र", संसद को विश्वास में लेने कि "बाबरी मस्जिद" की सुरक्षा की जाएगी, जैसे तमाम संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रयासों को ध्वस्त करते हुए "बाबरी मस्जिद" उसी कल्याण सिंह ने ध्वस्त करा दी और लोकतंत्र की हत्या कर दी तब "उच्चतम न्यायालय" अपने ही आदेश की अवमानना पर "मूकदर्शक" बना रहा और बहुत किया तो लोकतंत्र के उस हत्यारे को मात्र "24 घंटे" की पिकनिक मनाने के लिए जेल भेजती है जो 6 दिसम्बर की घटना पर गर्व करता रहा है बार बार करता रहा है। 

गर्व किस बात का ? उच्चतम न्यायालय के आदेश, शपथपत्र, संसद और संविधान की हत्या पर गर्व, और उच्चतम न्यायालय मूक दर्शक बनकर बैठा रहता है, बिलकुल इंस्पेक्टर बच्चा यादव की तरह जो साधू यादव और उसके पुत्र से संबंधित अपराधों पर चुप्पी साध लेता है ।

मुसलमानों से संबंधित तमाम विषयों पर तमाम न्यायिक जाँच आयोग भारत की ही सरकारों ने बनाए जिसके मुखिया मुसलमान नहीं थे, जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग, जस्टिस सच्चर आयोग, जस्टिस  काटजू आयोग, जस्टिस श्रीकृष्णा आयोग तथा जस्टिस लिब्राहन आयोग इत्यादि इत्यादि आयोग जो कि मुसलमानों से संबंधित मामले और उनके हक, बर्बादी, तबाही, खूनखराबे तथा हक माँगते इन आयोग की रिपोर्ट की वही सरकारें चिता जला देती हैं जिनका उन्होंने ही गठन किया होता है पर उच्चतम न्यायालय सरकार से यह नहीं पूछती कि जब कार्यवाही करना नहीं तो ऐसे ईमानदार पूर्व न्यायाधीशों को आयोग का प्रमुख बनाकर उनका अपमान क्यों किया जाता है ? 
परन्तु यही उच्चतम न्यायालय क्रिकेट के सुधार के लिए बनी जस्टिस लोढ़ा कमेटी की आज से एक महीने पहले आई रिपोर्ट को लागू करने के लिए आदेश पर आदेश सुनाती है तो हैरानी होती है कि उपरोक्त आयोग की रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय को क्यूँ नहीं दिखते ? या देख कर भी उच्चतम न्यायालय "मूकदर्शक" बनी रहती है ?

लिब्राहन आयोग ने अपनी जाँच में 68 लोगों को दोषी पाया जिन्होंने "बाबरी मस्जिद" को ध्वस्त करने की साजिश रची और ध्वस्त करके "लोकतंत्र" की हत्या की परन्तु 24 वर्ष बाद भी यही उच्चतम न्यायालय "बच्चा यादव" की तरह मूक दर्शक आजतक बना हुआ है जबकि उन 68 दोषियों में कितने तो बिना सज़ा पाए तिरंगे में लपेट कर राजकीय सम्मान के साथ दुनिया से विदा हो गये और उनकी मृत्यु पर "राजकीय शोक" तक मनाया गया ।

क्यों "मूकदर्शक" बन जाती है "उच्चतम न्यायालय" गुजरात के 3000 बेगुनाह लोगों की हत्या पर और उस समय के राज्य के मुखिया जिन पर नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी और 3000 हत्याएँ बताती हैं कि वह अपनी जिम्मेदारी में विफल हुए, उनके अनेकों अनेक अप्रत्यक्ष और सांकेतिक बयान बताते हैं कि 3000 हत्याएँ उनके ही अप्रत्यक्ष आदेश पर हुईं, तो क्यों "उच्चतम न्यायालय" मूकदर्शक बनकर "क्लीनचिट" पर "क्लीनचिट" देता चला जाता है ? राज्य के मुखिया के रूप में क्या वह इन हत्याओं के जिम्मेदार नहीं ?

गर्भवती महिलाओं के पेट चीरकर अजन्मे शिशु निकाल लिए जाते हैं, उस शिशु को त्रिशूल में गोद कर झंडे की तरह लहराया जाता है तो उच्चतम न्यायालय "मूकदर्शक" बनकर चुप अजन्मे रहा ? गोधरा कांड हो या गुजरात दंगे के लगभग सभी सजायाफ्ता मुजरिमों को जिनको फाँसी पर लटका कर एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए था उनमें गुजरात दंगों के लगभग सभी दोषी "माया कोडनानी तथा बाबू बजरंगी" समेत सबके सब किसी ना किसी आधार पर बाहर घूम रहे हैं, क्यों ? 
और गोधरा के दोषी ऐसी ही घटनाओं के कारण जेल में सड़ रहे हैं क्यों ? उच्चतम न्यायालय क्यों "मूकदर्शक" बनकर बैठ जाती है ? 

हाशिमपुरा में 40 मुसलमानों को पीएसी के जवान भूनकर नहर में फेक देते हैं और लगभग 30 वर्ष मुकदमा चलने के बाद उनको बाईज्जत बरी कर दिया जाता है, हाशिमपुरा हत्याकांड की फाईलों को गायब कर दिया जाता है और "उच्चतम न्यायालय" मूकदर्शक बनी रहती है तो यह भी सवाल नहीं करती कि यदि आरोपी निर्दोष हैं तो 40 लोगों की हत्या करने वाले कौन थे कहाँ हैं ?

कभी "सिमी" तो कभी "इंडियन मुजाहिदीन" जैसे छद्म संगठन जिसका कोई आस्तित्व ही नहीं तो कभी अलकायदा और अब "आइएस" के नाम पर सरकार जब चाहे मुसलमानों को उठाकर आतंकवादी बता देती है और जेलों में ठूसकर देश को अपनी चाकचौबंद व्यवस्था होने का एहसास दिलाती है, 10-10 वर्ष 15-15 वर्ष बाद यह जेल में ज़िन्दगी बर्बाद करके यही "सिमी" "इंडियन मुजाहिदीन" "अलकायदा" और अब "आइएस" के आतंकवादी बिना सबूतों के आधार पर बाईज्जत रिहा हो जाते हैं तो भी "उच्चतम न्यायालय" मूकदर्शक बन कर बैठी रहती है और एक सवाल नहीं पूछती कि सबके सब आतंकवादियों के विरुद्ध सबूत क्यों नहीं हैं और सबूत नहीं है तो किस आधार पर 10-15 वर्ष जेलों में बंद किये जाते रहे हैं, किस आधार पर उनपर आतंकवादी का टैग गिरफ्तार करते ही लगा दिया जाता है।

महाराष्ट्र के हेमंत करकरे ने संघ के लोगों को 12 आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने के सबूत इकट्ठा करके लोगों को गिरफ्तार किया और "सिमी" पर ऐसे ही आरोपों से प्रतिबंध तो लग गया पर "संघ" देश पर शासन कर रहा है और उच्चतम न्यायालय उसी इंस्पेक्टर "बच्चा यादव" की तरह चुप है तो क्यों चुप है ? उच्चतम न्यायालय तो इस देश के लोकतंत्र और न्याय का प्रहरी है ? तो देश के एक वर्ग के साथ ही होता अन्याय उस प्रहरी को क्यों नहीं दिखता ? और दिखता है तो देखकर भी "मूकदर्शक" क्यों बना बैठा रहता है ? बच्चा यादव की तरह।

उसी "गंगाजल" फिल्म में आगे इंस्पेक्टर बच्चा यादव "साधू यादव" के विरुद्ध कार्यवाही करता है तो उसकी आँख फोड़कर हत्या कर दी जाती है । कहीं उच्चतम न्यायालय को यही डर तो नहीं ? जो साधू यादव ( संघ ) के विरुद्ध कार्यवाही से रोक तो नहीं रहा ? कहीं साधू यादव का डर उच्चतम न्यायालय को मुसलमानों से संबंधित मामलों में मूकदर्शक बनने को बाध्य तो नहीं कर रहा है ? या उच्चतम न्यायालय में सब साधु यादव के लोग ही बैठे हैं ?

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