Monday, January 25, 2016

गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति का संदेश, ज्यों का त्यों

 गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने देश के नाम संदेश दिया। पढ़िए उनका भाषण ज्यों का त्यों...

मेरे प्यारे देशवासियो,
हमारे राष्ट्र के सड़सठवें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर, मैं भारत और विदेशों में बसे आप सभी को हार्दिक बधाई देता हूं। मैं, हमारी सशस्त्र सेनाओं, अर्ध-सैनिक बलों तथा आंतरिक सुरक्षा बल के सदस्यों को अपनी विशेष बधाई देता हूं। मैं उन वीर सैनिकों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं जिन्होंने भारत की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने और विधि शासन को कायम रखने के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया।
प्यारे देशवासियो,
2. छब्बीस जनवरी 1950 को हमारे गणतंत्र का जन्म हुआ। इस दिन हमने स्वयं को भारत का संविधान दिया। इस दिन उन नेताओं की असाधारण पीढ़ी का वीरतापूर्ण संघर्ष पराकाष्ठा पर पहुंचा था जिन्होंने दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र की स्थापना के लिए उपनिवेशवाद पर विजय प्राप्त की। उन्होंने राष्ट्रीय एकता, जो हमें यहां तक लेकर आई है, के निर्माण के लिए भारत की विस्मयकारी अनेकता को सूत्रबद्ध कर दिया। उनके द्वारा स्थापित स्थायी लोकतांत्रिक संस्थाओं ने हमें प्रगति के पथ पर अग्रसर रहने की सौगात दी है। आज भारत एक उदीयमान शक्ति है,एक ऐसा देश है जो विज्ञान, प्रौद्योगिकी,नवान्वेषण और स्टार्ट-अप में विश्व अग्रणी के रूप में तेजी से उभर रहा है और जिसकी आर्थिक सफलता विश्व के लिए एक कौतूहल है।

प्यारे देशवासियो,
3. वर्ष 2015 चुनौतियों का वर्ष रहा है। इस दौरान विश्व अर्थव्यवस्था में मंदी रही। वस्तु बाजारों पर असमंजस छाया रहा। संस्थागत कार्रवाई में अनिश्चितता आई। ऐसे कठिन माहौल में किसी भी राष्ट्र के लिए तरक्की करना आसान नहीं हो सकता। भारतीय अर्थव्यवस्था को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। निवेशकों की आशंका के कारण भारत समेत अन्य उभरते बाजारों से धन वापस लिया जाने लगा जिससे भारतीय रुपए पर दबाव पड़ा। हमारा निर्यात प्रभावित हुआ। हमारे विनिर्माण क्षेत्र का अभी पूरी तरह उभरना बाकी है।

4. 2015 में हम प्रकृति की कृपा से भी वंचित रहे। भारत के अधिकतर हिस्सों पर भीषण सूखे का असर पड़ा जबकि अन्य हिस्से विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आ गए। मौसम के असामान्य हालात ने हमारे कृषि उत्पादन को प्रभावित किया। ग्रामीण रोजगार और आमदनी के स्तर पर बुरा असर पड़ा।

प्यारे देशवासियो,
5. हम इन्हें चुनौतियां कह सकते हैं क्योंकि हम इनसे अवगत हैं। समस्या की पहचान करना और इसके समाधान पर ध्यान देना एक श्रेष्ठ गुण है। भारत इन समस्याओं को हल करने के लिए कार्यनीतियां बना रहा है और उनका कार्यान्वयन कर रहा है। इस वर्ष 7.3 प्रतिशत की अनुमानित विकास दर के साथ, भारत सबसे तेजी से बढ़ रही विशाल अर्थव्यवस्था बनने के मुकाम पर है। विश्व तेल कीमतों में गिरावट से बाह्य क्षेत्र को स्थिर बनाए रखने और घरेलू कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिली है। बीच-बीच में रुकावटों के बावजूद इस वर्ष उद्योगों का प्रदर्शन बेहतर रहा है।

6. आधार 96 करोड़ लोगों तक मौजूदा पहुंच के साथ, आर्थिक रिसाव रोकते हुए और पारदर्शिता बढ़ाते हुए लाभ के सीधे अंतरण में मदद कर रहा है। प्रधान मंत्री जन धन योजना के तहत खोले गए 19 करोड़ से ज्यादा बैंक खाते वित्तीय समावेशन के मामले में विश्व की अकेली सबसे विशाल प्रक्रिया है। सांसद आदर्श ग्राम योजना का लक्ष्य आदर्श गांवों का निर्माण करना है। डिजीटल भारत कार्यक्रम डिजीटल विभाजन को समाप्त करने का एक प्रयास है। प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना का लक्ष्य किसानों की बेहतरी है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम जैसे कार्यक्रमों पर बढ़ाए गए खर्च का उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को दोबारा सशक्त बनाने के लिए रोजगार में वृद्धि करना है।

7. भारत में निर्माण अभियान से व्यवसाय में सुगमता प्रदान करके और घरेलू उद्योग की स्पर्द्धा क्षमता बढ़ाकर विनिर्माण तेज होगा। स्टार्ट-अप इंडिया कार्यक्रम नवान्वेषण को बढ़ावा देगा और नए युग की उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करेगा। राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन में 2022तक 30 करोड़ युवाओं को कुशल बनाने का विचार किया गया है।

8. हमारे बीच अकसर संदेहवादी और आलोचक होंगे। हमें शिकायत, मांग, विरोध करते रहना चाहिए। यह भी लोकतंत्र की एक विशेषता है। परंतु हमारे लोकतंत्र ने जो हासिल किया है, हमें उसकी भी सराहना करनी चाहिए। बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, स्वास्थ्य, शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में निवेश से,हम और अधिक विकास दर प्राप्त करने की बेहतर स्थिति में हैं जिससे हमें अगले दस से पंद्रह वर्षों में गरीबी मिटाने में मदद मिलेगी।

प्यारे देशवासियो,
9. अतीत के प्रति सम्मान राष्ट्रीयता का एक आवश्यक पहलू है। हमारी उत्कृष्ट विरासत, लोकतंत्र की संस्थाएं सभी नागरिकों के लिए न्याय,समानता तथा लैंगिक और आर्थिक समता सुनिश्चित करती हैं। जब हिंसा की घृणित घटनाएं इन स्थापित आदर्शों, जो हमारी राष्ट्रीयता के मूल तत्त्व हैं, पर चोट करती हैं तो उन पर उसी समय ध्यान देना होगा। हमें हिंसा, असहिष्णुता और अविवेकपूर्ण ताकतों से स्वयं की रक्षा करनी होगी।

प्यारे देशवासियो,
10. विकास की शक्तियों को मजबूत बनाने के लिए, हमें सुधारों और प्रगतिशील विधान की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित करना विधि निर्माताओं का परम कर्तव्य है कि पूरे विचार-विमर्श और परिचर्चा के बाद ऐसा विधान लागू किया जाए। सामंजस्य, सहयोग और सर्वसम्मति बनाने की भावना निर्णय लेने का प्रमुख तरीका होना चाहिए। निर्णय और कार्यान्वयन में विलम्ब से विकास प्रक्रिया का ही नुकसान होगा।

प्यारे देशवासियो,
11. विवेकपूर्ण चेतना और हमारे नैतिक जगत का प्रमुख उद्देश्य शांति है। यह सभ्यता की बुनियाद और आर्थिक प्रगति की जरूरत है। परंतु हम कभी भी यह छोटा सा सवाल नहीं पूछ पाए हैं : शांति प्राप्त करना इतना दूर क्यों है? टकराव को समाप्त करने से अधिक शांति स्थापित करना इतना कठिन क्यों रहा है?

12. विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उल्लेखनीय क्रांति के साथ 20वीं सदी की समाप्ति पर, हमारे पास उम्मीद के कुछ कारण मौजूद थे कि 21वीं सदी एक ऐसा युग होगा जिसमें लोगों और देश की सामूहिक ऊर्जा उस बढ़ती हुई समृद्धि के लिए समर्पित होगी जो पहली बार घोर गरीबी के अभिशाप को मिटा देगी। यह उम्मीद इस शताब्दी के पहले पंद्रह वर्षों में फीकी पड़ गई है। क्षेत्रीय अस्थिरता में चिंताजनक वृद्धि के कारण व्यापक हिस्सों में अभूतपूर्व अशांति है। आतंकवाद की बुराई ने युद्ध को इसके सबसे बर्बर रूप में बदल दिया है। इस भयानक दैत्य से अब कोई भी कोना अपने आपको सुरक्षित महसूस नहीं कर सकता है।

13. आतंकवाद उन्मादी उद्देश्यों से प्रेरित है, नफरत की अथाह गहराइयों से संचालित है, यह उन कठपुतलीबाजों द्वारा भड़काया जाता है जो निर्दोष लोगों के सामूहिक संहार के जरिए विध्वंस में लगे हुए हैं। यह बिना किसी सिद्धांत की लड़ाई है,यह एक कैंसर है जिसका इलाज तीखी छुरी से करना होगा। आतंकवाद अच्छा या बुरा नहीं होता; यह केवल बुराई है।

प्यारे देशवासियो,
14. देश हर बात से कभी सहमत नहीं होगा; परंतु वर्तमान चुनौती अस्तित्व से जुड़ी है। आतंकवादी महत्त्वपूर्ण स्थायित्व की बुनियाद, मान्यता प्राप्त सीमाओं को नकारते हुए व्यवस्था को कमज़ोर करना चाहते हैं। यदि अपराधी सीमाओं को तोड़ने में सफल हो जाते हैं तो हम अराजकता के युग की ओर बढ़ जाएंगे। देशों के बीच विवाद हो सकते हैं और जैसा कि सभी जानते हैं कि जितना हम पड़ोसी के निकट होंगे, विवाद की संभावना उतनी अधिक होगी। असहमति दूर करने का एक सभ्य तरीका,संवाद है, जो सही प्रकार से कायम रहना चाहिए। परंतु हम गोलियों की बौछार के बीच शांति पर चर्चा नहीं कर सकते।

15. भयानक खतरे के दौरान हमें अपने उपमहाद्वीप में विश्व के लिए एक पथप्रदर्शक बनने का ऐतिहासिक अवसर प्राप्त हुआ है। हमें अपने पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण वार्ता के द्वारा अपनी भावनात्मक और भू-राजनीतिक धरोहर के जटिल मुद्दों को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए, और यह जानते हुए एक दूसरे की समृद्धि में विश्वास जताना चाहिए कि मानव की सर्वोत्तम परिभाषा दुर्भावनाओं से नहीं बल्कि सद्भावना से दी जाती है। मैत्री की बेहद जरूरत वाले विश्व के लिए हमारा उदाहरण अपने आप एक संदेश का कार्य कर सकता है।

प्यारे देशवासियो,
16. भारत में हर एक को एक स्वस्थ,खुशहाल और कामयाब जीवन जीने का अधिकार है। इस अधिकार का, विशेषकर हमारे शहरों में, उल्लंघन किया जा रहा है,जहां प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। जलवायु परिवर्तन अपने असली रूप में सामने आया जब 2015 सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज किया गया। विभिन्न स्तरों पर अनेक कार्यनीतियों और कार्रवाई की आवश्यकता है। शहरी योजना के नवान्वेषी समाधान, स्वच्छ ऊर्जा का प्रयोग और लोगों की मानसिकता में बदलाव के लिए सभी भागीदारों की सक्रिय हिस्सेदारी जरूरी है। लोगों द्वारा अपनाए जाने पर ही इन परिवर्तनों का स्थायित्व सुनिश्चित हो सकता है।

प्यारे देशवासियो,
17. अपनी मातृभूमि से प्रेम समग्र प्रगति का मूल है। शिक्षा, अपने ज्ञानवर्धक प्रभाव से,मानव प्रगति और समृद्धि पैदा करती है। यह भावनात्मक शक्तियां विकसित करने में सहायता करती है जिससे सोई उम्मीदें और भुला दिए गए मूल्य दोबारा जाग्रत हो जाते हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था, ''शिक्षा का अंतिम परिणाम एक उन्मुक्त रचनाशील मनुष्य है जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक विपदाओं के विरुद्ध लड़ सकता है।'' 'चौथी औद्योगिक क्रांति'पैदा करने के लिए जरूरी है कि यह उन्मुक्त और रचनाशील मनुष्य उन बदलावों को आत्मसात करने के लिए परिवर्तन गति पर नियंत्रण रखे जो व्यवस्थाओं और समाजों के भीतर स्थापित होते जा रहे हैं। एक ऐसे माहौल की आवश्यकता है जो महत्त्वपूर्ण विचारशीलता को बढ़ावा दे और अध्यापन को बौद्धिक रूप से उत्साहवर्धक बनाए। इससे विद्वता प्रेरित होगी और ज्ञान एवं शिक्षकों के प्रति गहरा सम्मान बढ़ेगा। इससे महिलाओं के प्रति आदर की भावना पैदा होगी जिससे व्यक्ति जीवन पर्यन्त सामाजिक सदाचार के मार्ग पर चलेगा। इसके द्वारा गहन विचारशीलता की संस्कृति प्रोत्साहित होगी और चिंतन एवं आंतरिक शांति का वातावरण पैदा होगा। हमारी शैक्षिक संस्थाएं मन में जाग्रत विविध विचारों के प्रति उन्मुक्त दृष्टिकोण के जरिए,विश्व स्तरीय बननी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय वरीयताओं में प्रथम दो सौ में स्थान प्राप्त करने वाले दो भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों के द्वारा यह शुरुआत पहले ही हो गई है।

प्यारे देशवासियो,
18. पीढ़ी का परिवर्तन हो चुका है। युवा बागडोर संभालने के लिए आगे आ चुके हैं। 'नूतन युगेर भोरे' के टैगोर के इन शब्दों के साथ आगे कदम बढ़ाएं : ''चोलाय चोलाय बाजबे जायेर भेरी- पायेर बेगी पॉथ केटी जाय कोरिश ने आर देरी।'' आगे बढ़ो, नगाड़ों का स्वर तुम्हारे विजयी प्रयाण की घोषणा करता है शान के साथ कदमों से अपना पथ बनाएं; देर मत करो, देर मत करो,एक नया युग आरंभ हो रहा है।

धन्यवाद,

Wednesday, January 20, 2016

एक सिलाई मशीन, स्लेटी दीवारें और हैदराबाद यूनिवर्सिटी का वह स्टूडेंट रोहित वेमूला...

 
रोहित वेमूला ने 13 मार्च 2014 को फेसबुक पर एक तस्वीर पोस्ट की। यह तस्वीर सिलाई मशीन की थी जिसके लिए उसने लिखा था- यह 'हमारे घर की रोजी रोटी का प्रमुख साधन' है। यूनिवर्सिटी से 25 हजार रुपए की जूनियर रिसर्च फेलोशिप मिलने की शुरुआत होने से पहले की बात है। रोहित इसी 30 जनवरी को 27 साल का होने वाला था।
कुछ बिखरे बर्तन, स्लेटी दीवारें और पीली कुर्सी...
26 वर्षीय रोहित ने लिखा था- यह मेरी मां का पसंदीदा पेशा है... वह कहती थीं 'मशीन' एक औरत को ताकतवर बना सकती है... वह अब एक टीचर हैं, वह आसपास की महिलाओं को सिलाई-बुनाई करना सिखाती हैं...'
ये तस्वीरें जो इस खबर में हमने लगाई हैं, ऐसी ही कई तस्वीरें मिलकर गुंटूर में रोहित की जिन्दगी की सचाई पेश करती हैं जिन्हें उसने अपने फेसबुक प्रोफाइल पर पोस्ट किया है। रोहित यहीं पला बढ़ा। बिना सफेदी/डिस्टम्बर की स्लेटी दीवारें, एक सिलाई मशीन जिसके आसपास प्लास्टिक के बैग रखे हैं जिनमें ठुंसे हुए हैं कपड़े। बिखरे हुए कुछ बर्तन, कपड़ों के ही यहां वहां इकट्ठा हुए ढेर, एक पीले रंग की प्लास्टिक की कुर्सी जिसके पास एक टीवी भी रखा है। इनके अलावा भी कुछ तस्वीरें हैं जो उसके जीवन का चलचित्र पेश करती हैं, एक यूनिफॉर्म टंगी दिखती है जिसकी तस्वीर के नीचे कैप्शन लिखा है- पापा की यूनिफॉर्म, जो एक हॉस्पिटल में सिक्यॉरिटी गार्ड हैं।

'चीजें जितना करीब दिखती हैं, उससे ज्यादा करीब (कभी नहीं) होती'
एक खस्ताहाल रेफ्रिजरेटर भी है, जिसके बारे में उसने लिखा है, इसके भीतर पड़ोसियों के लिए पानी की कुछ बोतलें रखी हैं। उसका फेसबुक प्रोफाइल दलित मसलों पर सक्रियता की पोस्ट्स से अटा पड़ा है लेकिन हाल के दिनों में वह इन मसलों से थोड़ा कट गया लगता है। अपनी आखिरी पोस्ट्स में से एक पोस्ट में वह लिखता है- Objects in the mirror are (never) closer than they appear. यानी, आईने में दिख रही चीजें जितना करीब दिखती हैं, उससे ज्यादा करीब (कभी नहीं) होती हैं।
'उन्होंने हमें बताया क्यों नहीं कि उसे क्यों निलंबित किया गया?'
रोहित के दोस्तों का कहना है कि उसका 'दिल टूट गया था'। उन्हें 21 दिसंबर को यूनिवर्सिटी के हॉस्टल से बाहर 'फेंक' दिए जाने के बाद रोहित समेत पांच स्टूडेंट्स कैंपस गेट के बाहर तंबू लगाकर रह रहे थे। उन्हें मेस और दूसरी सुविधाओं से वंचित कर दिया गया था। एबीवीपी कार्यकर्ता से कथित झड़प के मसले पर यूनिवर्सिटी ने रोहित समेत सभी को प्राथमिक जांच में निर्दोष करार दिया था। लेकिन बाद में यूनिवर्सिटी ने अपना फैसला पलट लिया था। स्टूडेंट्स का कहना है कि आरोप लगा रहे हैं कि रोहित का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया था।
रोहित की दादी का कहना है- मेरा बेटा कोमल दिल का था, उसे निलंबित कर दिया गया जिसके बाद वह तंबू में रहने को मजबूर था। उन्होंने हमें बताया क्यों नहीं कि उसे क्यों निलंबित किया गया? रोहित की दादी हैदराबाद यूनिवर्सिटी के परिसर में अपने परिवार के साथ मौजूद आई हुई थीं।

सात महीनों से फेलोशिप की रकम नहीं मिली थी...
पिछले सात महीनों से उसे फेलोशिप के पैसे नहीं मिले थे और जीना मुहाल हो चुका था। रविवार को जब उसके साथी प्रदर्शन को और कड़ा करने को लेकर चर्चा कर रहे थे, तब रोहित चुपचाप अपने हॉस्टल में चला गया था। कुछ घंटो बाद, रोहित ने कमरे में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली।

सूइसाइड नोट में रोहित ने लिखा है कि 'मेरी आत्मा और मेरे शरीर के बीच की खाई बढ़ती जा रही है' उसने लिखा- मेरा पैदा होना भयंकर दुर्घटना थी। मैं अपने बचपन के अकेलेपन से कभी नहीं उबर सकता। एक ऐसा बच्चा जिसे अतीत में किसी का प्यार नहीं मिला।

इस खत (सूइसाइड नोट) में प्रोटेस्ट का जिक्र नहीं किया है लेकिन लिखा है कि उसे महीने से फेलोशिप के पैसे नहीं मिले जोकि करीब 1.75 हजार रुपए के करीब बनते थे। ये पैसे जब मिल जाएं तो परिवार को सौंप दिए जाएं। उसने लिखा कि इसमें से 40 हजार रुपए की रकम उसके दोस्त रामजी को दे दी जाए।

Sunday, January 17, 2016

राम मंदिर मुद्दा पैसा कमाने की मशीन है


“मैं अयोध्या के बाराबंकी कस्बे का रहने वाला हूं। मैंने अपने इलाके और उसके आसपास कभी राम मंदिर और बाबरी मस्जिद को लेकर नफरत का माहौल नहीं देखा। इस माहौल की शुरूआत दिल्ली से हुई। सन 1947 में हमारी जमीन बंटी और 1992 में हमारे दिल बंट गए। जिस दिन हमारे दिल बंटे, वह दिन हमारे लिए सबसे बदनसीब दिन था। चुनाव जीतने के चक्कर में हमारी नस्लें बरबाद हो गईं। हैरान हूं कि यह लोग अभी भी चैन से नहीं बैठ रहे हैं। आखिर यह इस मुद्दे को कहां ले जाकर छोड़ना चाहते हैं?”
इसमें न्यायालय की भूमिका अहम है। मुझे भारत की न्याय व्यवस्था पर नाज है, फख्र है। मुझे लगता है कि बजाय इसके कि कोई बोले कि हम मंदिर बनाएंगे, इस मुद्दे को न्यायालय के फैसले पर छोड़ देना चाहिए। आखिर लड़ाई किस बात की है? असल लड़ाई जमीन की है कि जमीन किसकी है। अदालत में इसी का झगड़ा है। यहां सवाल आस्था का नहीं है। मैं तहेदिल से कह रहा हूं कि मुसलमानों को कोई गलतफहमी नहीं है कि राम अयोध्या में पैदा नहीं हुए थे। हम भी राम को मानते हैं लेकिन मशहूर इतिहासकार बिश्बरनाथ पांडे ने अपनी किताब में कहा है कि भारत में राम का 400 साल पुराना कोई मंदिर नहीं है। जब देश में भगवान राम का 400 साल मंदिर नहीं है तो राम भक्तों को रामजन्म स्थान का पता कैसे लगा लिया? आखिर यह कैसे साबित हुआ कि यह ही रामजन्म भूमि है। अगर ये लोग राम को सच में प्यार करते हैं तो मासूमों के खून से सींचे हाथों से मंदिर की ईंटे न ढोएं। अगर सच में राम हैं तो उनपर क्या गुजरेगी?  आखिरकार राम के नाम पर क्या कर रहे हैं ये लोग।

हिंदू समाज को राम मंदिर आंदोलन चलाने वालों से सवाल करना चाहिए कि राम मंदिर के नाम पर जो खरबों रुपये का चंदा इक्ट्ठा हुआ था उसका क्या हुआ?  मेरे खयाल से हिंदू समाज बहुत भोला है, नेक है। आडवाणी की रथ यात्रा के वक्त हिंदू औरतों ने राम मंदिर बनवाने के लिए अपने गहनें तक उतार कर दे दिए थे। जनता को राम मंदिर आंदोलन चलाने वालों से सवाल करना चाहिए। मेरे ख्याल से तो इस आंदोलन को दोबारा इसलिए शुरू किया गया है क्योंकि पहले का चंदा सब खा-पी गए होंगे अब दोबारा पैसे की जरूरत होगी। राम मंदिर मुद्दा पैसा कमाने की मशीन है। मेरी गुजारिश है सबसे पहले हिंदू भाई 15-20 सालों के उन खरबों रुपये का हिसाब लें, जो राम मंदिर के नाम पर इक्ट्ठा किए गए हैं। अरे भई, अदालत के फैसले का इंतजार करें। हिंदू नेताओं को चाहिए कि उग्र लोगों को समझाएं कि इस मसले पर लड़ाई न करें। अन्यथा देश खतरे में पड़ जाएगा। 

मुस्लिम समुदाय से मेरा कहना है कि किसी के भी कहने पर उकसावे में न आएं। यह देश धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं का देश है। हमेशा रहेगा। कट्टरपंथियों और सांप्रदायिक लोगों का देश नहीं है। यहां की मासूम जनता नहीं जानती कि ऐसे लोग जनता के बहुत छोटे से प्रतिशत को वरगला लेते हैं। इसलिए कम से कम उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक सतर्क रहें। मौजूदा सरकार हर कदम पर असफल रही है। राम मंदिर मुद्दा उसका आखिरी हथियार होगा। इसलिए किसी के भी बहकावे में नहीं आएं।

Friday, January 15, 2016

सभ्य समाज व जंगली समाज का राँची से आँखों देखा हाल

पागल,
जी हाँ पागल ही जिसका जन्म ही राँची में हुआ हो वो पागलों की तरह ही सोचेगा, पापा का जॉब था Heavy Engineering Corporation Ltd., Ranchi में और हमारा जन्म भी उसी शहर में हुआ, जब होश संभाला तो देखा आदिवासियों से ऐसा बर्ताव किया जा रहा है जैसे वो जंगली जानवर हों, गाड़ियों में भर भर के जंगल में छोड़ दिया जाता था हमारे सभ्य समाज द्वारा, अब ऐसे माहौल में पला-बढ़ा व्यक्ति पागल के जैसा ही न सोचेगा ?

जब मासूमियत के साथ वो बच्चा पूछता था के ये कौन हैं ?? इनकी भाषा हमारी भाषा से क्यों नहीं मिलती नहीं है, तो बड़ों का जवाब मिलता था जंगली लोग हैं इसलिए हमसे अलग हैं। 

उसी शहरी सभ्य समाज के ऑटो से हर रोज ऐलान होता हुआ दिखाई पड़ता था रंग गोरा, सावंला, गेरुआ, उम्र 5-10 वर्ष पिछले 2-10 दिनों से ग़ायब है जिस किसी बंधू को दिखाई दे सूचित करें, अर्थात हर रोज बच्चे चोरी होते थे कौन करता था ?? पता नहीं पर यकीन के साथ कह सकता हूँ आदिवासी तो नहीं करते थे अपने ही सभ्य समाजी लोग होंगे। 

अधिकतर आदिवासी भी हमारे सभ्य समाज को अपना दुश्मन ही मानते थे और मानते भी क्यों नहीं दुश्मनों वाला ही व्यवहार तो करता था हमारा सभ्य समाज, वो अगल बात है कि आदिवासी केवल दुश्मन ही मानते थे कभी दुश्मनी निभाई नहीं क्योंके अधिकतर समय भात से बने शराब (शायद उसे हांड़ी बोलते थे) पी कर मस्त सोये रहते थे, कुछ हमारे सभ्य समाजी लोग तो यहाँ तक कहते थे ये आदिवासी आदमखोर भी होते हैं। 

खैर जो भी हो हमने देखा ऐसे विकट परिस्थित में भी इसाई मिसिनारियों ने गावं गावं, जंगल जंगल जा कर इन आदिवासियों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया था, मिसिनरी के सेवक, सेविका वर्षों वर्षों तक जंगल में पड़े रहते थे, आप कह सकतें हैं उनका उद्देश्य इसाई को फैलाना था और हो भी सकता है पर उन्होंने जो योगदान दिया और दे रहें हैं शिक्षा के क्षेत्र में आपके सभ्य समाज द्वारा ही घोषित जंगली लोगों के मेरी नज़र में केवल इसाई धर्म का प्रचार नहीं था, समाज सेवा भी था। 

अगर थोड़े देर के लिए मान भी लिया जाए कि आपका आरोप सत्य है कि उनका उदेश्य मात्र इसाई धर्म का प्रचार-प्रसार था तो आप क्यों नहीं गए उस विकट समय में अपने धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए ?? 

आप कुछ भी कहिये आज जो भी आदिवासी अपने हक़ की लड़ाई के लिए दिल्ली तक पहुँच रहे हैं, इनको दिल्ली तक तक रास्ता समझाने में इसाई मिसिनारियों का बहुत बड़ा योगदान था। 

#काकावाणी

Sunday, January 10, 2016

देश सोया है, चलो इतिहास लिखें

‘बाजीराव-मस्तानी’ में इतिहास के साथ बलात्कार और मंत्र-मुग्ध दर्शक! समझ नहीं आ रहा कि देश में डंके की चोट पर इतिहास को कैसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है? बिल्कुल समझ नहीं आ रहा। ग़लती संजय लीला भंसाली की नहीं है। अंधेर नगरी है, कोई पूछने वाला तो है नहीं। जिसका जो जी चाहे लिखे, जैसी श्रद्धा और जैसी स्वार्थी ज़रुरत हो, वैसे इतिहास लिख दो। देश सोया है, सेंसर बोर्ड जाहिल है, इतिहासविद और जो कोई भी सरकारी, ग़ैर-सरकारी संस्थान हैं वे अपने एहसास-ए-कमतरी में इस क़दर डूबे हैं कि चूं भी नहीं कर सकते।
बाजीराव को नाचता देख कर कहीं शायद कुछ लोगों ने सिर धुना हो पर वो भाड़ में जाएं। कॉलेज की लड़कियां तो पागल हो गयी होंगी और ये पहली बार थोड़े ही हो रहा है। बाजीराव की जो भी असल बहादुरी रही होगी उसे दो संवादों में में दिखा दो। बाक़ी तो देवदास ही बनाना है। पैसा कमाना है। बड़े फ़िल्मकार की तरह नाम पैदा करना है। जो जी में आये करो अभी बताया था न कि देश सोया है, सेंसर बोर्ड जेम्स बॉन्ड को हिंदुस्तानी तहज़ीब सिखाने का देशभक्तिपूर्ण कारनामा अंजाम देने में मग्न है। शिवसेना ग़ुलाम अली को मुंबई आने से रोकने का सामाजिक कर्तव्य निभा कर थकी हुई होगी। बाक़ी ठहरे भक्त और भक्त-सुधारक, तो  वो अपनी सवाली-जवाबी क़व्वाली गाने में इतने व्यस्त हैं कि कहां दीगर मुद्दों पर ध्यान दे पायेंगे। तो फ़िल्म निर्माताओं रास्ता बिल्कुल खाली है। किसी तरह की पुलिस नहीं है, अपनी व्यापारिक गाड़ी जैसी चलानी है, चलायें। दो-चार ऐतिहासिक व्यक्तित्व इस गाड़ी के नीचे कुचल गए तो किसकी मां का क्या जाता है साहब? जनता तो वैसे भी साड़ियां और सेट्स देखने आती है!

‘जोधा-अकबर’ के ज़ख्म अभी तक नहीं भरे हैं। गज़ब की कल्पनाशीलता थी फ़िल्म में भई। हिंदुस्तान के एक अज़ीम शहंशाह को एक उल्लू का पट्ठा दिखाया गया है। वह उद्दात व्यक्तित्व जिसके साम्राज्य की सीमायें अभूतपूर्व दूरियों तक फैली थीं। उसे कितना लीचड़, छोटा बताया गया था। पर ऐश्वर्या के कपड़े क्या खूब थे, ऋतिक की मसल्स क्या चमक रही थीं। जनता फिर कितनी खुश थी। पूरा पैसा वसूल फ़िल्म थी।

और वह शाहरुख़ की ‘अशोका, द ग्रेट’ याद है? पहली बात तो नाम, ‘अशोक’ का नाम अशोका जिस भी बेवकूफ़ी के नाते किया गया हो उसे तो नज़रअंदाज़ हम कर ही देते हैं। ‘संतोषा सिवना’ ने फ़िल्म बनाई। उन्हें सिनेमेटोग्रफी करनी थी सो की। ‘शाहरुखा खाना’ को नाचना था तो वे नाचे। पर फिर वही बात। लेखक को तिलमिलाने की आदत है शायद फिल्मकार होने के नाते बड़े दिग्दर्शकों से ईर्ष्यावश बुरा-भला कह रहे होंगे। इस फिल्म पर भी जनता ने खूब वाह-वाहियां बरसाई थीं। अगर आप यू-ट्यूब पर सम्राट अशोक पर बनी फ़िल्म के अंश देखें तो किसी स्पूफ़ की तरह लगेंगे। इसे कॉमिडी-क्लिप की तरह ही देखा जाना चाहिए। ये बिज़नस आईडिया मैं उन्हें मुफ़्त में दे रहा हूं कि किसी हास्य कलाकार को सूत्रधार बना कर फिर से फिल्म एडिट की जाए और अब इसे एक स्पूफ़ / कॉमिडी की तरह रिलीज़ किया जाए तो देखना कितनी कमाई होती है।

अब कल्पना की नदी जब बह ही निकली है तो मैं सोचता हूं कि क्यों न लगे हाथों रानी लक्ष्मी बाई के बाल-प्रेम पर एक फ़िल्म बनाई जाए और अगर पटकथा कमज़ोर पड़ती है तो लॉर्ड डलहौज़ी की एक गोरी बहन बना दी जाए जो शादीशुदा होते हुए भी अकेलेपन की शिकार है, जिसे रानी झांसी के एक सिपहसालार से प्यार हो जाता है। इस सिपहसालार को रानी अपने भाई की तरह मानती है और अंत में जब रण में रानी का घोड़ा फंसता है तो उसी गोरी का पति अपनी टुकड़ी के साथ रानी को घेरता है। रानी घायल होने के बाद भी उस अंग्रेज़ को मौत के घाट उतारती है और मरने के पहले अपने भाई के हाथ में उसकी गोरी प्रेमिका का हाथ रखती है। जय हिन्द कहती है और इस मृत्युलोक से कूच कर जाती है।

ओफ़्फ़ो क्या क़िस्मत है मेरी। क्या प्लॉट हाथ लगा है, बस भई ये बेमानी लेख लिखना बंद करता हूं और भंसाली के पास जाता हूं। पारखी हैं, समझेंगे। वही मार्गदर्शन देंगे कि दरबार में एक 250 नर्तकों के साथ गाना कैसे डालना है। कैसे रानी की जलकुकड़ी चचेरी बहन का किरदार उकेरना है। कैसे लॉर्ड डलहौज़ी की (गैर-मौजूद) सीक्रेट सेक्स-लाइफ का भांडा फोड़ना है। हां, आप लोग मेरी फ़िल्म देखने ज़रूर आइयेगा!

Thursday, January 07, 2016

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के 'अहम' से हुआ 'नाकाम' पठानकोट ऑपरेशन!


आधिकारिक सूचनाओं के मुताबिक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के पास पहले से ही एक जनवरी के सुनियोजित हमले के प्लान की खुफ़िया जानकारी थी.
सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि पठानकोट हमले पर भारत की प्रतिक्रिया बिल्कुल नौसिखिया थी- आक्रमण अपर्याप्त था, कई फोर्स एक साथ ऑपरेशन में शामिल थीं, इसके बाद उपयुक्त हथियारों की कमी ने पूरे ऑपरेशन को करीब-करीब नाकाम कर दिया.
जब हमले शुरू हुए तब अजित डोभाल ने 150 एनएसजी कमांडोज़ को माणेसर से एयरलिफ्ट कराकर अनजान इलाके में लड़ने के लिए भेज दिया.
मिशन का नेतृत्व एनएसजी, डिफेंस सर्विस कॉर्प्स और वायु सेना के गरुड़ स्पेशल फोर्सेस को सौंप दिया गया.
डिफेंस सर्विस कॉर्प्स, सेवानिवृत और प्रेरणाविहीन सैनिकों का समूह है तो वहीं गरुड़ भारत की बढ़ते स्पेशल फोर्सेस के भीड़ के बीच अपने लिए औचित्य तलाश रहा है.
ऐसा प्रतीत होता है कि पूरे ऑपरेशन पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए डोभाल ने पठानकोट में पहले से तैनात 50 हज़ार सैनिकों को नज़रअंदाज़ कर दिया जो संभवतः पूरे देश में सबसे बड़ा सैन्य जमावड़ा है.
रिपोर्टों की मानें तो डोभाल ने सेना प्रमुख से महज़ 50 से 60 फौजियों की टुकड़ी ऑपरेशन के बैक-अप के लिए मांगी थी.
सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक सेना के पास कश्मीरी घुसपैठियों से लड़ने का ज्यादा अनुभव है.
एनएसजी इलाके से वाकिफ़ नहीं थी जिससे उसे नुकसान का सामना करना पड़ा जिससे बड़ी आसानी से बचा जा सकता था. इ
समें एनएसजी के लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन कुमार भी शामिल हैं जिनकी मौत एक फंसे हुए चरमपंथी के शरीर में लगे ग्रेनेड फटने से हुई थी.
इस विस्फोट में चार अन्य एनएसजी कमांडोज़ घायल हो गए.
माना जा रहा है कि अगर सेना उनकी जगह होती तो चरमपंथियों के इस फंदे में कभी न फंसती क्योंकि वो इस तरफ के हमले से वाकिफ़ है.
सैन्य सूत्रों के मुताबिक एनएसजी के पास पठानकोट जैसे ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए नाइट विज़न डिवाइस और दूसरे ज़रूरी साजो-सामान तक नहीं थे.
चार दिन तक चले ऑपरेशन में सेना की भूमिका सीमित थी.
हालांकि ऑपरेशन के 48 घंटे बीत जाने के बाद और मोदी, राजनाथ, पर्रिकर के ऑपरेशन के सफलतापूर्वक समाप्त होने की घोषणा के बाद करीब 200 सैनिकों को तैनात किया गया.
चार चरमपंथियों को मार गिराने के बाद प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और रक्षा मंत्री के बधाई संदेश आए. लेकिन इसके तुरंत बाद दोबारा गोलीबारी शुरू हो गई.
इससे इस बात पर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई कि 1,200 हेक्टेयर में फैले एयरबेस में कितने बंदूकधारी छुपे हुए थे.
सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक सोमवार रात तक रुक-रुककर गोलीबारी और ग्रेनेड धमाके एयरबेस के अंदर से सुनाई पड़ रहे थे. हालांकि कोई भी ज़मीनी हक़ीक़त से पूरी तरह वाकिफ़ नहीं था.
सोमवार दोपहर को उप एनएसजी कमांडो मेजर जेनरल दुष्यंत सिंह ने कहा कि ऑपरेशन अपने आखिरी चरम पर था.
जबकि मंगलवार को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने प्रेस वार्ता में कहा कि 6 चरमपंथियों को मार गिराया गया है. लेकिन पूरे एयरबेस को खाली कराने में अभी समय लगेगा.
पर्रिकर ने उस वक्त कहा था कि ऑपरेशन में कुछ खामियां हैं. हालांकि सुरक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं किया गया है.
समीक्षकों के मुताबिक 2008 मुंबई हमलों में हुए 166 लोगों की मौत के वक्त भारतीय सुरक्षा अधिकारियों ने जो गलतियां की थीं वे पठानकोट में भी दोहराई गईं क्योंकि किसी तय नीति के तहत ऑपरेशन को अंजाम नहीं दिया गया.
मुंबई हमलों के वक्त शुरू में 10 बंदूकधारियों के विरुद्ध स्थानीय पुलिस बल को तैनात किया गया था. बाद में उनकी जगह मार्कोस स्पेशल कमांडोज़ को लड़ने के लिए भेजा गया.
इसके बाद सैन्य कमांडोज़ ने मुंबई के तीनों हमले वाले इलाकों, दो होटल और एक यहूदी सांस्कृतिक केंद्र में मार्कोस की जगह ले ली.
बाद में एनएसजी ने सेना की जगह ली जिन्हें मुंबई पहुंचने में 12 घंटे का वक्त लगा.
सैन्य समीक्षक, सेवानिवृत मेजर जेनरल शेरू थपलियाल के मुताबिक पठानकोट ऑपरेशन में सुरक्षा एजेंसियों के क्रम और किसी एक के हाथों में कंट्रोल न होने से लड़ाई के नतीजे पर बुरा असर पड़ा.
उनके मुताबिक चार दिनों का वक्त पांच से छह चरमपंथियों को मार गिराने, वो भी एक सीमित जगह पर समझ के परे और अस्वीकार्य है.
लेकिन इस ऑपरेशन की एक सबसे महत्वपूर्ण बात रही कि चरमपंथी वायु सेना की संपत्ति, जैसे मिग-21 हेलीकॉप्टर का नुकसान नहीं कर पाए.
पठानकोट एयरफोर्स बेस पर चरमपंथी हमले पर काबू पाने में भारतीय अधिकारियों को चार दिन लग गए.
पाकिस्तानी सीमा के नज़दीक स्थित इस बेस पर हुए हमले में सात भारतीय सैनिक मारे गए जबकि 22 अन्य घायल हो गए.
मेरे हिसाब से सुरक्षा ऑपरेशन का संचालन पूरी तरह विफल रहा.

Wednesday, January 06, 2016

पठानकोट ने संदेह की इतनी मोटी लकीर खिंच दी है कि बातचीत की प्रक्रिया चलती रहे अपने आप में सवाल है


तो पठानकोट हमला अपने आप में दो सवाल है। पहला, टैरर अटैक है या फिर पाकिस्तानी सेना की मदद से किया गया आतंकियों का सैनिक ऑपरेशन। और दूसरा भारतीय सुरक्षा एजेंसियों में आपसी तालमेल नहीं है या फिर सैनिक ट्रैनिंग के साथ आये आंतकवादियों के हमले को रोकने की कोई तैयारी नहीं है। दोनों हालात 67 घंटों के दौर में ही उभरे। और इन दोनों हालातों से आगे सबसे खतरनाक हालात यह भी रहे कि पहली बार एनएसजी के जवान आपरेशन शुरु होने से पहले ग्राउंड जीरो पर पहुंच चुके थे। यानी ऑपरेशन रात दो से तीन के बीच शुरु हुआ। जबकि एनएसजी के जवान एक जनवरी को रात ग्यारह बजे तक पठानकोट एयरबेस के भीतर पहुंच चुके थे। बावजूद इसके 7 सुरक्षाकर्मियों की शहादत हुई। 21 गंभीर रुप घायल हुये। और जिस तरह तीन दिन तक पठानकोट के भीतर बाहर आतंक के दायरे में देश बंधक सरीखा लग रहा था वह पहली बार इसके संकेत देता है कि हमलावर आंतकी जरुर थे लेकिन उनकी ट्रेनिग सेना के ऑपरेशन की तरह थी। क्योंकि एयरबेस के भीतर एनएसजी ने भी अपना आपरेशन क्लीन तरीके से किया। लेकिन डिफेन्स सिक्यूरटी कोर की ट्रेनिग की कमी, पुलिस, खुफिया एजेंसी और सेना के बीच तालमेल की कमी, जल्दबाजी में आरपेशन खत्म करने की सोच ने ही सात जवानो को शहीद कर दिया। 
क्योंकि आतंकवादियो ने एयरबेस में घुसते ही निशाने पर सबसे पहले यूनिफार्म में मौजूद चौकीदार जो कि डिफेन्स सिक्यूरटी कोर कहलाते है उसे लिया। जिन्हें कोई ट्रेनिग नहीं होती है कि ट्रेन्ड आतंकवादियो से कैसे लड़ना है। चार सुरक्षाकर्मी तुरंत मारे गये। एक सुरक्षा कर्मी एक आतंकी को मारने के बाद मारा गया। एयरफोर्स का एक जवान मुठभेड़ के दौरान मारा गया। और एमएसजी के लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन की शहादत तब हुई जब जल्दबाजी में ऑपरेशन खत्म कर आतंकियों के बॉडी हटाने की प्रक्रिया शुरु हुई। और आखरी सवाल आईबी का काम भी क्या सिर्फ अलर्ट के साथ खत्म हो गया और जब पठानकोट जैसी महत्वपूर्ण जगह पर सेना की टुकड़ी तक मौजूद रहती है तो उसे तत्काल सक्रिय क्यों नहीं किया गया। और समूचा आपरेशन दिल्ली से ही एनएसजी के आपरेशन को क्यों जा टिका। यानी शुक्रवार को पहले अलर्ट के बाद 36 घंटे तक जो पठानकोट पूरी तरह सेना के जरीये सीज किया जा सकता था वह क्यों नहीं हुआ।

तो क्या देश के सबसे सुरक्षित और सबसे महत्वपूर्ण एयरबेस की सुरक्षा को लेकर हमारे सामने सवाल ही ज्यादा है । खासकर तब जब 18 किलोमीटर में फैले पठानकोट एयरबेस के भीतर सैनिको के परिवारो का एक शहर भी है। जिसके भीतर अस्पताल से लेकर स्कूल और बाजार से लेकर पार्क तक है। यानी छह किलोमीटर में शहर तो बाकि एयरबेस। और आतंकी यहा तक पहुंचे और तीन दिन बाद भी आपरेशन जारी है तो पांच बड़े सवाल हैं। पहला, हार्ड इनपुट होते हुये भी सिक्यूर्टी ग्रिड अलर्ट क्यों नहीं हुआ। दूसरा. आतंकवादी जब कश्मीर छोड़ मैदानी इलाको को चुन रही है तो हम कितने तैयार है। तीसरा, क्या सभी राज्यों के पास आंतकवाद से निपटने का इन्फ्रास्ट्रक्चर है। चौथा, आतंक को लेकर एनसीटीसी पर बहस फिर होगी या सहमति का कोई रास्ता बनेगा। और पांचवां अगर आंतकवादी मल्टी सिटी-मल्टी टारगेट को लेकर चले तब हमारा क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप क्या करेगा। यानी इन सवालों का जबाब देने की तैयारी से पहले यह जरुर सोचना होगा कि पठानकोट एयरबेस वह जगह है जहां से दुशमनों के दांत खट्टे करने की लिए सेना मौजूद रहती है और वही जगह पहली बार आ तंकवादियो के निशाने पर आ गई। इससे पहले गुरुदासपुर में भी निशाने पर सुरक्षाकर्मी ही थे। और सीमापार से घुसपैठ की जगह भी कमोवेश वही थी जो गुरुदासपुर के वक्त थी। यानी सवाल सिर्फ देश के भीतर आतंकवाद से लड़ने की तैयारी भर का नहीं है बल्कि पठानकोट का संदेश साफ है कि सीमा पार की नीति ही भारत को लेकर आतंकवाद के जरीये सौदेबाजी की है तो फिर पाकिस्तान को लेकर क्यो करना होगा इसकी रणनीति भी नयी बनानी होगी।

क्योंकि भारत- पाकिसातन के प्रधानमंत्रियों की आपसी मुलाकात हो या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारो की आपसी मुलाकात। पदो के लिहाज दोनों मुलाकात दो बराबर पदों के व्यक्तियों की मुलाकात कही जा सकती है। लेकिन सवाल जब पाकिस्तान का होगा तो समझना होगा कि आखिर जनरल राहिल शरीफ को भरोसे में लिये बगैर कोई मुलाकात किसी अंजाम तक पहुंच नहीं सकती और पठानकोट हमले के बाद तो यह सवाल कहीं ज्यादा गहरा गया है कि आखिर अब दोनों देशों का रुख होगा क्या। क्योंकि आतंकवादियों के पीछे पाकिस्तानी सेना थी इसे भारत में माना जा रहा है। और आतंकवादियो के खिलाफ पूरा आपरेशन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल की निगरानी में चल रहा है। इसे हर कोई मान रहा है। और भारत में यह माना जा रहा है कि पाकिस्तानी सेना के नुमाइन्दे के तौर पर नवाज शरीफ के साथ बतौर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नासीर खान जांजुआ की नियुक्ति के पीछे राहिल शरीफ ही है। यानी प्रधानमंत्री मोदी चाहे मुलाकातों का सिलसिला बढाये और बातचीत के अलावे पाकिस्तान के साथ संबंधों की डोर मजबूत करने की दिशा में अपने कदम दिखाये। लेकिन पठानकोट ने संदेह की इतनी मोटी लकीर खिंच दी है कि इसके बाद बातचीत किस जमीन पर खड़े होकर किया जाये यह अपने आप में सवाल है । यानी विदेश सचिवो की मुलाकात में बात क्या होगी । डोभाल और जांजुआ की मुलाकात से निकलेगा क्या । यानी सवाल अब मुलाकात से आगे पाकिस्तान में इसी बरस होने वाले सार्क सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी के जाने या ना जाने का भी होगा। क्योकि अर्से बाद भारत के साथ रिश्तो की डोर पाकिस्तान में दो अलग अलग छोरों पर खिंची जाती दिखायी दे रही है। क्योंकि भारत के रुख को लेकर एक तरफ नवाज शरीफ हो तो दूसरी तरफ राहिल शरीफ। और इन दोनो के बीच प्रधानमंत्री मोदी संबंधों को पटरी पर लाने के लिये इतिहास रचने को बेताब हैं। जबकि पाकिस्तान पहली बार भारत को लेकर उस मोड़ पर जा खड़ा है जहां सेना और चुनी हुई सत्ता में ही खुली तकरार है। इसीलिये पहली बार आतंकवादी संगठनों को कैसे कब उपयोग में लाना है यह भी पठानकोट हमलो के बाद नजर आने लगा है।

पाकिस्तान के पन्नों को ही पलटे तो जनरल मशर्रफ से लेकर जनरल राहिल शरीफ। और हाफिज सईद से लेकर अजहर मसूद। बीच में सैय्यद सलाउद्दीन। पाकिस्तान में भारत के खिलाफ कश्मीर का सवाल हो या आतंक की चौसर पर डिप्लोमैसी का सवाल। बीते 19 बरस के दौर में इन्ही किरदारो के आसरे आंतक को स्टेट पालेसी बनाकर जो चाल चली गई भारत उसी में उलझ कर संबंधो की डोर कभी पड़ोसी के नाते तो कभी अंतराष्ट्रीय दबाव में उलझता रहा । सत्ता पलट के बाद जनरल मुशर्रफ ने वक्त के लिहाज से सैयद सलाउद्दीन को सबसे पहले कश्मीर का स्वतंत्रता सैनानी बताकर सियासत साधनी शुरु की । तो जनरल राहिल शरीफ ने अब सैय्यद सलाउ्द्दीन को उस मोड़ पर सामने ला खड़े किया जब आंतक पर नकेल कसने के लिये मोदी नवाज शरीफ एक रास्ते को पकड़ने निकल रहे है । क्योकि पठानकोट हमले की पहली जिम्मेदारी उस यूनाइटेड जेहाद काउंसिल ने ली जिसका चेयरमैन सैयद सलाउद्दीन है । काउसिंल में तमाम वही संगठन है जो कश्मीर की लड़ाई पाकिस्तान में बैठकर लड़ रहे है । यानी हाफिजद सईद भी सक्रिय है और अजहर मसूद भी । लेकिन जेहादी काउंसिल को कटघरे में खडा किया जाये तो पाकिस्तान के आंतक की जमीन पहली बार अलग दिखायी देने लगे । क्योंकि सैय्यद सलाउद्दीन कश्मीर से पाकिस्तान की जमीन पर पनाह लिये हुये आंतकवादी है । तो हाफिज सईद और अजहर मसूद पाकिस्तान के ही नागरिक है । यानी पठानकोट का रास्ता कश्मीर के जेहाद से कैसे जोड़ा जाये और आंतक के इल्जाम से कैसे बचा जाये इसकी बिसात पर पहला पांसा यूनाइटेड जेहाद काउसिंल का नाम लेकर फेंका गया है । यानी यह चाल जैश-ए-मोहम्मद को कटघरे से बाहर देखने के है । क्योकि जैश पर आरोप लगते है तो सवाल पाकिस्तान की सत्ता और सेना पर उठेगें । फिर हाफिज सईद के बाद अजहर मसूद ही पाकिस्तान में सत्ता के लिये सबसे अनुकुल शख्स है जिसकी तकरीर पर गरीब-मुफलिस तबका फिदायिन बनने को तैयार हो जाता है ।

याद किजिये रिहाई के तुरंत बाद कराची में हथियारो के साये में जैश के अजहर मसूद की जो तस्वीर सामने आयी थी वह आंतक की तस्वीर थी । लेकिन लश्कर के आंतकी चेहरे के सामने धीरे धीरे् जैश कमजोर दिखायी देने लगा । और उसके बाद लगातार यही माना जाता रहा कि अजहर मसूद खुद कभी सामने नहीं आया लेकिन उन संगठनो को मदद देता रहा है जो इस्लाम के नाम पर आंतक का खुला खेल खेल रहे है । लेकिन पठानकोट हमले के बाद जिस तरह सारे तार जैश से जुडे उसमें पाकिस्तान के लिये भी मुसिबत पैदा हुई कि आंतक की डोर अगर कश्मीर से इतर पंजाब जा रही है तो फिर उसकी अपनी जमीन खिसकेगी इसलिये पठानकोट हमला भी कश्मीर के दायरे में ही दिखाने के लिये यूनाइटेड जेहादी काउसिंल ने श्रीनगर के एक समाचार एंजेसी सीएमएस को फोन कर पठानकोट हमले की जिम्मेदारी ले ली ।

ऐसे में आखरी सवाल यही है कि आखिर भारत करे तो क्या करें । क्योंकि पठानकोट एयरबेस पर हुये हमले ने प्रधानमंत्री मोदी के 19 महीने की उस कवायद को पूरी तरह से खारिज कर दिया जिस आसरे एक दो नहीं बल्कि पांच मुलाकात पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ से की । पांचों मुलाकात कुछ इस तरह की गई जिसने बार बार देश को चौकाया । पीएम बनते ही शपथ के वक्त नवाज शरीफ को बुलाना हो या फिर अचानक काबुल से लाहौर पहुंचकर नवाज शरीफ को जन्मदिन की बधाई देना । नेपाल में हाथ मिलाना हो या पेरिस में गुफ्तगु करना । हर मुलाकात में मोदजी ने देश कौ चौकाया । तो क्या देश को चौकाते वक्त प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान के साथ भारत के जटिल रिश्तो की डोर को समझ नहीं पाये । जिसपर से वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह गुजर चुके है । याद कीजिये 2001 में संसद पर हुआ हमला हो या 2008 में मुंबई पर हुआ हमला। तब की सरकारों ने पाकिस्तान को क्या संदेश दिया। संसद पर लशकर के हमले के बाद तब के पीएम अटलबिहारी वाजपेयी ने तो आर पार की लड़ाई का एलान कर दिया था। और मुंबई हमलों के बाद तो मनमोहन सरकार ने पाकिस्तान से बातचीत के ना सिर्फ हर रास्ते को बंद किया बल्कि पीओके में आंतकी कैपो पर हमले तक का जिक्र कर दिया । यानी यह बोली नरेन्द्र मोदी के उस एलान से भी कई कदम आगे की रही जिसका जिक्र मोदी पीएम बनने से पहले पाकिस्तान को लेकर करते रहे।

तो क्या इतिहास को पढ़ने-समझने के बदले मोदी सरकार इतिहास रचने की बेताबी में जा फंसी। इसीलिये कभी हा कभी ना की सोच इस तरह खुलकर कहती रही जिससे कभी लगा कि मोदी सरकार वाकई पाकिस्तान को पाठ पढ़ाना चाहती है तो कभी लगा मोदी सरकार पाकिस्तान को ना बदलने वाले पड़ोसी की तर्ज पर देख रही है । क्योंकि एक सिर के बदले दस सिर का जिक्र करने वाली सुषमा स्वराज भी मुंबई हमलो के दोषी लखवी के जेल से छूटने पर पाकिस्तान से कोई बातचीत ना करने को कहती है। और इसके बाद इस्लामाबाद जाकर कैंडल लाइट डिनर करने से नहीं चुकती। तो रक्षा मंत्री पारिकर भी साल भर पहले पाकिस्तान को चेताते नजर आते है। लेकिन मोदी लाहौर जाकर नवाज शरीफ को जन्मदिन की बधाई देते है तो पर्रिकर भी बदलते है और मोदी सरकार का हर मंत्री ही नहीं बीजेपी से लेकर संघ परिवार भी पाकिस्तान को लेकर संबंधो की आस बनाता नजर आता है। क्योंकि मोदी की नवाज से दोस्ती में ही रिश्तो की नई डोर खोजी जाती है । लेकिन महज हफ्ते भर के भीतर ही रिश्तो की इस डोर में पहली गांठ पठानकोट में अगर लगती है तो सवाल फिर वहीं आ अटकता है कि अब आगे क्या ?
पुण्य प्रसून बाजपेयी
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